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Mathura News: बरसाना की होली, जहां रंग नहीं रस बरसता है और देवता भी हो जाते हैं सहभागी

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 14 Feb 2026 01:33 AM IST
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The Holi of Barsana, where not just colors but essence is showered, and even the gods participate.
बरसाना। फाल्गुन पूरे प्रवाह में है और ब्रज की धरती इन दिनों केवल रंगों से नहीं, रस और अनुराग से सराबोर है। ऐसे समय में बरसाना की लठामार होली पर्व भर का नाम नहीं रहती, वह ब्रजभाव की ऊंची अवस्था बन जाती है, जहां भक्ति, हास और लीला एक दूसरे में विलीन हो जाते हैं। यही कारण है कि यहां की होली देखने की नहीं, अनुभव करने की परंपरा है, जहां मानव ही नहीं, देवत्व भी सहभागी हो उठता है।
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ब्रज परंपरा के अनुसार फाल्गुन मास में छलिया कान्हा बाघंबर ओढ़े छद्म रूप में रंगीली गली पहुंचे थे। उद्देश्य था राधा और सखियों की होली की तैयारियों को निकट से देखना और ब्रज की चंचलता को परखना। गोपियां इस भेष को पहचान न सकीं, लेकिन महादेव से यह रहस्य छिपा न रह सका। उन्होंने तुरंत गोपी का रूप धारण किया और राधा के साथ खड़े होकर कान्हा से होली खेलने लगे। रंगीली गली में रंग और हास से भरी उस लीला में गोपी बने शंकर ब्रजगोपियों के पूर्ण हिमायती बन गए। उन्होंने कान्हा और उनके सखाओं को ब्रजभाव में ऐसा उलझाया कि उन्हें पीछे हटना पड़ा। उस क्षण ब्रज की गलियों में केवल गुलाल नहीं उड़ा बल्कि वह रस बरसा जिसने देव और मानव के बीच का भेद मिटा दिया। इसी दिव्य प्रसंग के कारण रंगीली गली में महादेव रंगेश्वर कहलाए और यह गली बरसाना की होली परंपरा का केंद्र बन गई।
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आज भी यह लीला केवल कथा नहीं, जीवंत परंपरा के रूप में निभाई जाती है। लठामार होली से पहले लाडली जी महल से होली की प्रथम और दूसरी चौपाई निकाली जाती है। यह चौपाई नागाजी कुंज, दादी-बाबा मंदिर, वृषभानु जी मंदिर और अष्टसखी मंदिर से होती हुई रंगीली गली स्थित रंगेश्वर महादेव तक पहुंचती है। यह यात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि उस ब्रजकथा का सार्वजनिक स्मरण है, जिसने बरसाना को विश्व पटल पर विशिष्ट पहचान दी है। फाल्गुन में जब चौपाई रंगीली गली में प्रवेश करती है, तो लगता है मानो समय ठहर गया हो। देश-विदेश से आए श्रद्धालु और शोधार्थी इस होली को देखने नहीं, उसे आत्मसात करने आते हैं। उनके लिए यह उत्सव नहीं, ब्रजभाव में डूबने का अवसर होता है, जहां रंग से पहले रस उतरता है और लीला इतिहास नहीं, वर्तमान बन जाती है।
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फाल्गुन में रंगीली गली की होली ब्रजभाव की जीवंत परंपरा है। यही वह लीला है, जहां शंकर गोपी बने और कान्हा ब्रजगोपियों के सामने छक गए।- संजय गोस्वामी

रंगीली गली स्थित रंगेश्वर महादेव मंदिर सदियों से इस लीला का साक्षी है। हर फाल्गुन में निकलने वाली चौपाई इस ब्रजकथा को वर्तमान से जोड़ देती है। -सत्यनारायण श्रोत्रिय
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