वृंदावन। राष्ट्रीय संग्रहालय के पूर्व महानिदेशक पद्मश्री बुद्धरश्मि मणि ने कहा कि प्राचीन काल में तक्षशिला एवं नालंदा पांडुलिपियों के महत्वपूर्ण केंद्र थे। पांडुलिपियों के संरक्षण के लिए पांच प्रमुख बातों पर ध्यान देने की जरुरत है। इसमें सर्वे एंड कैटलॉगिगं, कंजर्वेशन एंड कैपिसिटी बिल्डिंग, टेक्नोलॉजी एंड डिजिटलाइजेशन, लिग्विंस्टिक्स, ट्रांसलेशन, रिसर्च, पब्लिकेशन एवं आउटरीच हैं। अपनी पांडुलिपि संपदा की रक्षा करके ही हम आगे बढ़ सकते हैं।
यह विचार उन्होंने वृंदावन शोध संस्थान में मंगलवार को ज्ञान भारतम् के संयुक्त तत्वावधान में पांच दिवसीय संरक्षण कार्यशाला के शुभारंभ अवसर पर व्यक्त किए। संस्कृति विश्वविद्यालय के रघुराम भट्ट ने बताया कि विश्वविद्यालय वृंदावन शोध संस्थान के साथ कार्य करने के लिए तैयार है। इसमें पांडुलिपियों पर शोध एवं संरक्षण का क्षेत्र महत्वपूर्ण रूप से उल्लेखनीय है। बीके वर्मा ने बताया कि संस्कृति विश्वविद्यालय के इंडियन नॉलेज सिस्टम के तहत वृंदावन शोध संस्थान के साथ मिलकर ब्रज संस्कृति के क्षेत्र में शोध कार्य कर सकते है। संस्थान के निदेशक राजीव द्विवेदी ने बताया कि संस्थान में प्रारंभ से ही रामदास गुप्त ने पांडुलिपि संरक्षण का कार्य प्रारंभ किया था। कार्यशाला में जीएलए विश्वविद्यालय सहित विभिन्न संस्थानों से लगभग 40 प्रतिभागियो ने सहभागिता की। संचालन डॉ. ब्रजभूषण चतुर्वेदी ने किया।