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‘जन्म को सुधारो, मृत्यु सुधर जाएगी’
ब्यूरो, अमर उजाला कोसीकलां
Updated Mon, 14 Dec 2015 10:56 PM IST
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राष्ट्र संत तरुण सागर महाराज ने कहा है कि सांसारिक वस्तुएं टेढ़ी हो सकती हैं लेकिन संसार बनाने वाला टेढ़ा नहीं हो सकता। इंसान टेढ़ा है लेकिन उसका मन टेढ़ा नहीं है। जीवन का गणित बहुत उल्टा है। जन्म को सुधारो, मृत्यु सुधरती है।
सोमवार की शाम जैन धर्मशाला में आनंद यात्रा कार्यक्रम के दौरान मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य वर्तमान सुधारे तो भविष्य सुधरता है। आज को सुधारे तो कल सुधरता है। संसारी और संन्यासी में इतना फर्क है कि गृहस्थ के पैर टिकते हैं, संन्यासी के पैर नहीं टिकते। गृहस्थ आज को और संन्यासी कल को सुधारता है। मन को जीतना बहुत महत्वपूर्ण है। विश्वामित्र की साधना में दोष मेनका का नहीं, मन का था।
उन्होंने कहा कि जीवन में कुछ बनना चाहते हो, तो चार चीजों को त्यागना पड़ेगा, जिसमें पहली चीज ये है कि किसी काम को करने से पहले यह भावना मन से निकाल दो कि कोई क्या कहेगा? दूसरी बात यह कि मन में यह भावना कभी न आने दो कि यह मुझसे नहीं होगा? तीसरा भाग्य को कभी मत कोसो कि भाग्य खराब है? चौथा किसी भी काम को करने से पहले यह मत बोलो कि मन नहीं है? मुनिश्री ने कहा कि यदि मनुष्य को यदि ऊंचाई को हासिल करना है, तो मन पर विजय पाना बहुत जरूरी है।
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भागवताचार्य देवकी नंदन महाराज ने मुनि जी से भेंट कर 8 फरवरी 16 को वृंदावन में मंदिर की आधारशिला कार्यक्रम में हिस्सा लेने का अनुरोध किया। प्रेमचंद जैन, अशोक कामियां, तेजवंत जैन, प्रवीन जैन, नवीन जैन, विनोद जैन ने मुनिश्री की आरती उतारी। कार्यक्रम में डा. अशोक जैन, अशोक आचार्य, दीपक जैन, मुकेश जैन, सुभाष जैन, नितिन जैन, विजय सर्राफ, अरुण जैन आदि उपस्थित रहे।
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सोमवार की शाम जैन धर्मशाला में आनंद यात्रा कार्यक्रम के दौरान मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य वर्तमान सुधारे तो भविष्य सुधरता है। आज को सुधारे तो कल सुधरता है। संसारी और संन्यासी में इतना फर्क है कि गृहस्थ के पैर टिकते हैं, संन्यासी के पैर नहीं टिकते। गृहस्थ आज को और संन्यासी कल को सुधारता है। मन को जीतना बहुत महत्वपूर्ण है। विश्वामित्र की साधना में दोष मेनका का नहीं, मन का था।
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उन्होंने कहा कि जीवन में कुछ बनना चाहते हो, तो चार चीजों को त्यागना पड़ेगा, जिसमें पहली चीज ये है कि किसी काम को करने से पहले यह भावना मन से निकाल दो कि कोई क्या कहेगा? दूसरी बात यह कि मन में यह भावना कभी न आने दो कि यह मुझसे नहीं होगा? तीसरा भाग्य को कभी मत कोसो कि भाग्य खराब है? चौथा किसी भी काम को करने से पहले यह मत बोलो कि मन नहीं है? मुनिश्री ने कहा कि यदि मनुष्य को यदि ऊंचाई को हासिल करना है, तो मन पर विजय पाना बहुत जरूरी है।
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भागवताचार्य देवकी नंदन महाराज ने मुनि जी से भेंट कर 8 फरवरी 16 को वृंदावन में मंदिर की आधारशिला कार्यक्रम में हिस्सा लेने का अनुरोध किया। प्रेमचंद जैन, अशोक कामियां, तेजवंत जैन, प्रवीन जैन, नवीन जैन, विनोद जैन ने मुनिश्री की आरती उतारी। कार्यक्रम में डा. अशोक जैन, अशोक आचार्य, दीपक जैन, मुकेश जैन, सुभाष जैन, नितिन जैन, विजय सर्राफ, अरुण जैन आदि उपस्थित रहे।