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Mathura News: चेक बाउंस मामले में छह माह की सजा बरकरार, अपील खारिज
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मथुरा। चेक बाउंस के मामले में अपर सत्र न्यायाधीश चतुर्थ अनुराग शर्मा ने आरोपी मोहन सिंह को राहत नहीं दी। अदालत ने छह माह के साधारण कारावास और सात लाख रुपये के अर्थदंड की सजा के खिलाफ दाखिल आपराधिक अपील की अर्जी को निरस्त करते हुए निचली अदालत के 30 अप्रैल 2026 के फैसले को बरकरार रखा है। अदालत ने आरोपी को सजा भुगतने के लिए एक सप्ताह में विचारण न्यायालय में आत्मसमर्पण करने और अर्थदंड की राशि जमा करने का निर्देश दिया है।
मामला फौजदारी सम्मन वाद संख्या 3480/2019, ख्यालीराम बनाम मोहन सिंह से जुड़ा है। इसमें परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 के तहत मुकदमा दर्ज कराया गया था। निचली अदालत ने 30 अप्रैल 2026 को मोहन सिंह को दोषी सिद्ध करते हुए छह माह के साधारण कारावास और सात लाख रुपये के अर्थदंड से दंडित किया था। इसी फैसले के खिलाफ मोहन सिंह ने आपराधिक अपील दाखिल की थी।
मामले के अनुसार, मथुरा के केशोपुरा-मनोहरपुरा क्षेत्र में 80.82 वर्ग मीटर के आवासीय भूखंड का सौदा 21.20 लाख रुपये में हुआ था। बैनामे के प्रतिफल के लिए आरोपी की ओर से चार चेक दिए गए थे। इनमें 5.50 लाख रुपये का एक चेक बैंक में भुगतान के लिए प्रस्तुत किए जाने पर पर्याप्त धनराशि नहीं होने के कारण बाउंस हो गया। दोबारा चेक लगाने पर भी भुगतान नहीं हुआ। इसके बाद विधिक नोटिस भेजे जाने के बावजूद राशि का भुगतान नहीं किया गया और 5 सितंबर 2019 को परिवाद दाखिल किया गया।
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अपील में आरोपी की ओर से भूखंड के स्वामित्व को लेकर विवाद होने और परिवादी के अकेले स्वामी न होने समेत कई तर्क दिए गए। आरोपी ने यह भी कहा कि चार चेक में से दो का भुगतान हो चुका था और शेष चेक से संबंधित विवाद भूखंड के अन्य सह-हिस्सेदारों से जुड़ा था। वहीं अभियोजन पक्ष ने निचली अदालत के फैसले को विधिसम्मत बताते हुए अपील खारिज करने की मांग की।
अपीलीय अदालत ने पत्रावली, दोनों पक्षों की दलीलों और निचली अदालत के निर्णय का अवलोकन करने के बाद माना कि 30 अप्रैल 2026 के निर्णय में ऐसी कोई तथ्यात्मक या वैधानिक त्रुटि नहीं है, जिसके आधार पर उसमें हस्तक्षेप किया जाए। अदालत ने मोहन सिंह को एक सप्ताह में आत्मसमर्पण कर सजा भुगतने के निर्देश दिए हैं। साथ ही अर्थदंड की धनराशि जमा करने को कहा है। निर्धारित अवधि में आत्मसमर्पण नहीं करने पर विचारण न्यायालय को गैर जमानती वारंट जारी कर आरोपी को सजा भुगतने के लिए जिला कारागार भेजने का अधिकार होगा।
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मामला फौजदारी सम्मन वाद संख्या 3480/2019, ख्यालीराम बनाम मोहन सिंह से जुड़ा है। इसमें परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 के तहत मुकदमा दर्ज कराया गया था। निचली अदालत ने 30 अप्रैल 2026 को मोहन सिंह को दोषी सिद्ध करते हुए छह माह के साधारण कारावास और सात लाख रुपये के अर्थदंड से दंडित किया था। इसी फैसले के खिलाफ मोहन सिंह ने आपराधिक अपील दाखिल की थी।
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मामले के अनुसार, मथुरा के केशोपुरा-मनोहरपुरा क्षेत्र में 80.82 वर्ग मीटर के आवासीय भूखंड का सौदा 21.20 लाख रुपये में हुआ था। बैनामे के प्रतिफल के लिए आरोपी की ओर से चार चेक दिए गए थे। इनमें 5.50 लाख रुपये का एक चेक बैंक में भुगतान के लिए प्रस्तुत किए जाने पर पर्याप्त धनराशि नहीं होने के कारण बाउंस हो गया। दोबारा चेक लगाने पर भी भुगतान नहीं हुआ। इसके बाद विधिक नोटिस भेजे जाने के बावजूद राशि का भुगतान नहीं किया गया और 5 सितंबर 2019 को परिवाद दाखिल किया गया।
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अपील में आरोपी की ओर से भूखंड के स्वामित्व को लेकर विवाद होने और परिवादी के अकेले स्वामी न होने समेत कई तर्क दिए गए। आरोपी ने यह भी कहा कि चार चेक में से दो का भुगतान हो चुका था और शेष चेक से संबंधित विवाद भूखंड के अन्य सह-हिस्सेदारों से जुड़ा था। वहीं अभियोजन पक्ष ने निचली अदालत के फैसले को विधिसम्मत बताते हुए अपील खारिज करने की मांग की।
अपीलीय अदालत ने पत्रावली, दोनों पक्षों की दलीलों और निचली अदालत के निर्णय का अवलोकन करने के बाद माना कि 30 अप्रैल 2026 के निर्णय में ऐसी कोई तथ्यात्मक या वैधानिक त्रुटि नहीं है, जिसके आधार पर उसमें हस्तक्षेप किया जाए। अदालत ने मोहन सिंह को एक सप्ताह में आत्मसमर्पण कर सजा भुगतने के निर्देश दिए हैं। साथ ही अर्थदंड की धनराशि जमा करने को कहा है। निर्धारित अवधि में आत्मसमर्पण नहीं करने पर विचारण न्यायालय को गैर जमानती वारंट जारी कर आरोपी को सजा भुगतने के लिए जिला कारागार भेजने का अधिकार होगा।