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‘असहिष्णुता की बातों से पड़ता है संबंधों पर बुरा असर’
ब्यूरो, अमर उजाला मथुरा
Updated Mon, 01 Feb 2016 08:21 PM IST
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आरसीए गर्ल्स डिग्री कालेज में चल रहे राष्ट्रीय सेमिनार में भारत सरकार की नीति ‘लुक ईस्ट-एक्ट ईस्ट’ पर मंथन किया गया। वक्ताओं ने अपनी बेबाक राय रखी। कहा कि देश में असहिष्णुता की बातों से पड़ोसी देशों से संबंधों पर बुरा असर पड़ता है।
राजनीतिक स्वार्थ के लिए असहिष्णुता की बात करना या फिर ऐसा माहौल पैदा करने से बचना चाहिए। साथ ही इंगित किया कि अमेरिका की विदेश नीति के केंद्र में पावर बैलेंसिंग की सोच हावी रहती है। सेमिनार का शुभारंभ विदेश विभाग में एशिया डेस्क के सचिव अभिजीत चक्रवर्ती ने किया।
मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए पूर्व राजदूत एवं प्रोफेसर एमेरिटस एसडी मुनी ने कहा कि एशिया सेंचुरी में चीन के साथ दोस्ती और दुश्मनी साथ-साथ चलेगी। पूर्वी देश वियतनाम, कंबोडिया, जापान, थाइलैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया के साथ कनेक्टिविटी बढ़ानी होगी।
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एक आंकड़ा हमारी स्थिति को साफ करता है। चीन की इन देशों के लिए जाने वाली फ्लाइट की संख्या 1,614 है जबकि भारत की मात्र 394 है। चीन का इन देशों से कारोबार हमारे मुकाबले 5.1 गुना, इन्वेस्टमेंट 6.6 गुना अधिक है।
एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि देश में असहिष्णुता की बातों से अन्य देशों से संबंधों पर बुरा असर पड़ता है। ऐसे में राजनीतिक स्वार्थ के लिए असहिष्णुता की बात करना या फि र राजनीतिक हित साधने के लिए ऐसा माहौल बनाना गलत है।
रिटायर्ड मेजर प्रो. गोविंद द्विवेदी ने कहा कि भारत से चीन के संबंध इस बात पर निर्भर करते हैं कि उसका रुख हमारे अरुणाचल प्रदेश और सीमाओं को लेकर क्या रहता है। चीन से एक हाथ से लड़ाई और एक हाथ से सहयोग चलेगा।
चीन अमेरिका के वर्चस्व को चुनौती दे रहा है। उन्होंने इंगित किया कि अमेरिका की विदेश नीति में पावर बैलेंसिंग की सोच हावी रहती है।
राष्ट्रीय सेमीनार की अध्यक्षता करते हुए डा. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय के कुलपति मुहम्मद मुजम्मिल ने कहा कि आर्थिक विकास की दौड़ में हम पिछड़ गए हैं। 1760 में ग्रेट ब्रिटेन ने सबसे पहले औद्योगिक तरक्की की, इसके बाद 1860 में जर्मनी, जापान, यूरोप के देशों ने खुद को खड़ा किया।
1960 में जापान, इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड जैसे देशों ने खुद को इस दौड़ में शामिल कर लिया। इस बीच कई अर्थव्यवस्थाएं लड़खड़ाई जिसमें दूसरे चरणों के सुधारों में पारदर्शी प्रशासन, स्वतंत्र न्यायपालिका को लागू किया जा रहा है।
इस अवसर पर प्रबंध समिति के सचिव गिरीश अग्रवाल, रामबाबू, प्राचार्या डा. प्रीति जौहरी, डा. योगेंद्री, डा. नीतू गोस्वामी, डा. अर्चना पाल, डा. टीपी सिंह आदि मौजूद रहे।
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राजनीतिक स्वार्थ के लिए असहिष्णुता की बात करना या फिर ऐसा माहौल पैदा करने से बचना चाहिए। साथ ही इंगित किया कि अमेरिका की विदेश नीति के केंद्र में पावर बैलेंसिंग की सोच हावी रहती है। सेमिनार का शुभारंभ विदेश विभाग में एशिया डेस्क के सचिव अभिजीत चक्रवर्ती ने किया।
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मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए पूर्व राजदूत एवं प्रोफेसर एमेरिटस एसडी मुनी ने कहा कि एशिया सेंचुरी में चीन के साथ दोस्ती और दुश्मनी साथ-साथ चलेगी। पूर्वी देश वियतनाम, कंबोडिया, जापान, थाइलैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया के साथ कनेक्टिविटी बढ़ानी होगी।
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एक आंकड़ा हमारी स्थिति को साफ करता है। चीन की इन देशों के लिए जाने वाली फ्लाइट की संख्या 1,614 है जबकि भारत की मात्र 394 है। चीन का इन देशों से कारोबार हमारे मुकाबले 5.1 गुना, इन्वेस्टमेंट 6.6 गुना अधिक है।
एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि देश में असहिष्णुता की बातों से अन्य देशों से संबंधों पर बुरा असर पड़ता है। ऐसे में राजनीतिक स्वार्थ के लिए असहिष्णुता की बात करना या फि र राजनीतिक हित साधने के लिए ऐसा माहौल बनाना गलत है।
रिटायर्ड मेजर प्रो. गोविंद द्विवेदी ने कहा कि भारत से चीन के संबंध इस बात पर निर्भर करते हैं कि उसका रुख हमारे अरुणाचल प्रदेश और सीमाओं को लेकर क्या रहता है। चीन से एक हाथ से लड़ाई और एक हाथ से सहयोग चलेगा।
चीन अमेरिका के वर्चस्व को चुनौती दे रहा है। उन्होंने इंगित किया कि अमेरिका की विदेश नीति में पावर बैलेंसिंग की सोच हावी रहती है।
राष्ट्रीय सेमीनार की अध्यक्षता करते हुए डा. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय के कुलपति मुहम्मद मुजम्मिल ने कहा कि आर्थिक विकास की दौड़ में हम पिछड़ गए हैं। 1760 में ग्रेट ब्रिटेन ने सबसे पहले औद्योगिक तरक्की की, इसके बाद 1860 में जर्मनी, जापान, यूरोप के देशों ने खुद को खड़ा किया।
1960 में जापान, इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड जैसे देशों ने खुद को इस दौड़ में शामिल कर लिया। इस बीच कई अर्थव्यवस्थाएं लड़खड़ाई जिसमें दूसरे चरणों के सुधारों में पारदर्शी प्रशासन, स्वतंत्र न्यायपालिका को लागू किया जा रहा है।
इस अवसर पर प्रबंध समिति के सचिव गिरीश अग्रवाल, रामबाबू, प्राचार्या डा. प्रीति जौहरी, डा. योगेंद्री, डा. नीतू गोस्वामी, डा. अर्चना पाल, डा. टीपी सिंह आदि मौजूद रहे।