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Mathura News: राधा ने कंगन और श्रीकृष्ण ने बांसुरी से बनाया है कुंड

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sun, 12 Oct 2025 01:37 AM IST
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Radha created the pond with her bracelet, and Shri Krishna created it with his flute.
अहोई अष्टमी मेला में राधाकुंड स्नान करते लोग। फाइल फोटो
राधाकुंड (मथुरा)। भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली मथुरा से 25 किलोमीटर दूर गिरिराज परिक्रमा मार्ग में चमत्कारी राधा व श्याम कुंड हैं। इन्हें राधाकुंड के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि निसंतान दंपती अहोई अष्टमी की मध्य रात यहां हाथ पकड़कर स्नान करें तो उन्हें संतान की प्राप्ति होती है। यह पर्व द्वापरयुगीन है। इस दिन पति-पत्नी निर्जला व्रत रखकर राधाकुंड में तीन डुबकी लगाते हैं। मनोकामना पूरी होने के बाद भी लोग यहां अपनी संतान के साथ राधारानी की शरण में आते हैं। इस बार स्नान 13 अक्तूबर सोमवार की मध्य रात रात्रि से प्रारंभ होगा।
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धार्मिक मान्यता के अनुसार द्वापरयुग में राधाकुंड अरिष्ठ वन था। कंस ने यहीं अरिष्टासुर नामक राक्षस को बालकृष्ण का वध करने के लिए भेजा था। अरिष्टासुर बछड़े का रूप धारण कर कृष्ण की गायों के झुंड में शामिल हो गया। कृष्ण ने राक्षस को पहचान लिया और उसका जमीन पर पटक कर वध कर दिया।
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इस दौरान साथ में मौजूद राधारानी ने कृष्ण से कहा कि आपको गो हत्या का पाप लगा है। इसका उपाय देव ऋषि नारदजी से पूछिए। नारद मुनि ने कृष्ण को बताया कि संसार के सभी तीर्थ एक साथ मिलकर आपको स्नान कराएं तभी गो हत्या के पाप से मुक्ति मिल सकती है।
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देव ऋषि के कहने पर श्रीकृष्ण ने अपनी बंसी से कृष्णकुंड बनाया जबकि राधारानी ने अपने कंगन से राधाकुंड।श्रीकृष्ण ने सभी तीर्थ के जल को आमंत्रित किया और कृष्ण पक्ष की अहोई अष्टमी की अर्धरात्रि को राधारानी कुंड में स्नान किया। इससे कृष्ण गो हत्या के पाप से मुक्त हो सके। दोनों कुंड एक-दूसरे से जुड़े होने के बाद भी उनका पानी अलग-अलग है। राधाकुंड के जल का रंग सफेद तो श्याम कुंड के जल का रंग काला प्रतीत होता है।
मान्यता है यहां भी तीर्थों व देवी-देवताओं का वास होने के कारण अहोई अष्टमी पर स्नान करने से निसंतान दंपती को संतान की प्राप्ति होती है। इसी कामना को लेकर प्रतिवर्ष कई लाख दंपती यहां आकर स्नान करते हैं। संवाद

स्नान का नियम
संतान प्राप्ति के लिए दंपती का हाथ पकड़कर राधाकुंड में स्नान करना जरूरी है। पति या पत्नी में से किसी एक को स्नान करने पर संतान प्राप्ति का आशीर्वाद राधारानी नहीं देती हैं। पेठा का फल भी जल में समर्पित किया जाता। स्नान के दौरान साबुन आदि का प्रयोग वर्जित है।


पूजन की विधि
दंपती को पूजा की तैयारी सूर्यास्त से पहले कर लेनी चाहिए। सबसे पहले दीवार पर अहोई माता का चित्र बनाएं, एक कलश में पानी रखें और हाथों में गेहूं लेकर अहोई अष्टमी व्रत की कथा सुनें। अहोई देवी की आरती करें। शाम को तारे निकलने पर अर्ध्य दें।
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