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अधिग्रहण हुआ तो लखनऊ से दिल्ली तक होगा आंदोलन
ब्यूरो, अमर उजाला वृंदावन
Updated Sun, 29 Nov 2015 11:54 PM IST
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विश्व प्रसिद्ध बांकेबिहारी मंदिर को अधिग्रहीत करने की सरकार की तैयारियों का सेवायतों ने विरोध किया है। रविवार को मंदिर की प्रबंध समिति ने गोस्वामी समाज की एक बैठक बुलाई और इस मुद्दे को रखा।
बैठक में मंदिर के अधिग्रहण का पुरजोर विरोध करने और सड़क पर उतरकर आंदोलन करने की बात कही गई। वक्ताओं ने यहां तक कहा कि जरूरत पड़ी लखनऊ और दिल्ली में भी आंदोलन किया जाएगा। साथ ही विधिक राय लेकर कानूनी लड़ाई लड़ने पर भी जोर दिया गया।
मंदिर परिसर में हुई इस बैठक में प्रबंध कमेटी के अध्यक्ष नंदकिशोर उपमन्यु ने कहा कि इस संबंध में कमेटी विधिक राय भी ले रही है। मंदिर के सरकार के अधीन होने पर यहां की व्यवस्थाएं फेल हो जाएंगी, धार्मिक और विकास की गतिविधियों पर भी इसका असर पड़ेगा।
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उन्होंने दावा किया कि वर्तमान में मंदिर प्रबंध कमेटी और सेवायतों के बीच कोई विवाद नहीं है। सभी मंदिर की व्यवस्थाओं और विकासशील योजनाओं को मिलकर पूरा कर रहे हैं। सेवायतों ने कहा कि यदि प्रदेश सरकार ने ठाकुर बांकेबिहारी मंदिर को अधिग्रहीत करने की अपनी मंशा को नहीं बदला तो ब्रज का संत समाज, विप्र और जनप्रतिनिधियों को साथ लेकर विरोध किया जाएगा।
उन्होंने चेतावनी दी कि किसी भी सूरत में मंदिर का अधिग्रहण नहीं होने दिया जाएगा। विरोध सड़क से लेकर प्रदेश और देश की राजधानी तक होगा। बैठक में मंदिर प्रबंध कमेटी के उपाध्यक्ष घनश्याम गोस्वामी, रजत गोस्वामी, संतु गोस्वामी, गोपी गोस्वामी, अनुराग गोस्वामी, प्रणव गोस्वामी, राजू गोस्वामी, श्रीनाथ गोस्वामी आदि ने भी अधिग्रहण का विरोध किया।
जुलाई में लिखी गई थी मंदिर अधिग्रहण की पटकथा
ठाकुर बांके बिहारी मंदिर के अधिग्रहण का सेवायत और हिंदूवादी संगठन विरोध कर रहे हैं, लेकिन बताया जा रहा है कि कुछ सेवायत अधिग्रहण के समर्थन में भी हैं। उन्होंने सरकार और शासन स्तर पर अधिकारियों को अपने पक्ष से अवगत करा दिया है।
बताया जा रहा है कि मंदिर के अधिग्रहण की पटकथा जुलाई माह में लिखी गई थी। तब प्रदेश के प्रमुख सचिव आलोक रंजन को प्राचीन परंपराओं को तोड़कर मंदिर परिसर में कुर्सी मेज पर भोजन कराया गया था। मामले के तूल पकड़ने के बाद मंदिर की प्रबंध समिति ने भोजन कराने वाले सेवायतों पर जुर्माना लगाया था और उनको से मिलने वाली सभी प्रकार की सुविधाएं समाप्त कर दी गई थीं।
इसके बाद से कुछ लोगों ने मंदिर को अधिग्रहीत करने की पैरोकारी शासन में तेज कर दी। मंदिर की नकारात्मक गतिविधियों और मंदिर की आय की जानकारी शासन को दी गई। इसके बाद शासन ने इस पर कार्य शुरू किया। सूत्रों की माने तो अगस्त माह से कुछ सेवायत लगातार शासन से संपर्क कर रहे हैं और अपना समर्थन मंदिर के अधिग्रहण के पक्ष में दे चुके हैं।
बताया गया है कि एक पखवाड़ा पूर्व भी मंदिर के कुछ सेवायत लखनऊ में अधिकारियों से मिले थे। शनिवार को इस प्रकरण को लेकर मोहन बाग में हुई बैठक में कुछ सेवायत व पदाधिकारी नहीं शामिल नहीं हुए, उनके बैठक में नहीं पहुंचने से सवाल उठ रहे हैं कि कहीं वह अधिग्रहण के समर्थन में तो नहीं हैं। हालांकि प्रबंध कमेटी के अध्यक्ष नंदकिशोर उपमन्यु इस मुद्दे पर सभी सेवायत के एक साथ होने का दावा कर रहे हैं।
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बैठक में मंदिर के अधिग्रहण का पुरजोर विरोध करने और सड़क पर उतरकर आंदोलन करने की बात कही गई। वक्ताओं ने यहां तक कहा कि जरूरत पड़ी लखनऊ और दिल्ली में भी आंदोलन किया जाएगा। साथ ही विधिक राय लेकर कानूनी लड़ाई लड़ने पर भी जोर दिया गया।
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मंदिर परिसर में हुई इस बैठक में प्रबंध कमेटी के अध्यक्ष नंदकिशोर उपमन्यु ने कहा कि इस संबंध में कमेटी विधिक राय भी ले रही है। मंदिर के सरकार के अधीन होने पर यहां की व्यवस्थाएं फेल हो जाएंगी, धार्मिक और विकास की गतिविधियों पर भी इसका असर पड़ेगा।
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उन्होंने दावा किया कि वर्तमान में मंदिर प्रबंध कमेटी और सेवायतों के बीच कोई विवाद नहीं है। सभी मंदिर की व्यवस्थाओं और विकासशील योजनाओं को मिलकर पूरा कर रहे हैं। सेवायतों ने कहा कि यदि प्रदेश सरकार ने ठाकुर बांकेबिहारी मंदिर को अधिग्रहीत करने की अपनी मंशा को नहीं बदला तो ब्रज का संत समाज, विप्र और जनप्रतिनिधियों को साथ लेकर विरोध किया जाएगा।
उन्होंने चेतावनी दी कि किसी भी सूरत में मंदिर का अधिग्रहण नहीं होने दिया जाएगा। विरोध सड़क से लेकर प्रदेश और देश की राजधानी तक होगा। बैठक में मंदिर प्रबंध कमेटी के उपाध्यक्ष घनश्याम गोस्वामी, रजत गोस्वामी, संतु गोस्वामी, गोपी गोस्वामी, अनुराग गोस्वामी, प्रणव गोस्वामी, राजू गोस्वामी, श्रीनाथ गोस्वामी आदि ने भी अधिग्रहण का विरोध किया।
जुलाई में लिखी गई थी मंदिर अधिग्रहण की पटकथा
ठाकुर बांके बिहारी मंदिर के अधिग्रहण का सेवायत और हिंदूवादी संगठन विरोध कर रहे हैं, लेकिन बताया जा रहा है कि कुछ सेवायत अधिग्रहण के समर्थन में भी हैं। उन्होंने सरकार और शासन स्तर पर अधिकारियों को अपने पक्ष से अवगत करा दिया है।
बताया जा रहा है कि मंदिर के अधिग्रहण की पटकथा जुलाई माह में लिखी गई थी। तब प्रदेश के प्रमुख सचिव आलोक रंजन को प्राचीन परंपराओं को तोड़कर मंदिर परिसर में कुर्सी मेज पर भोजन कराया गया था। मामले के तूल पकड़ने के बाद मंदिर की प्रबंध समिति ने भोजन कराने वाले सेवायतों पर जुर्माना लगाया था और उनको से मिलने वाली सभी प्रकार की सुविधाएं समाप्त कर दी गई थीं।
इसके बाद से कुछ लोगों ने मंदिर को अधिग्रहीत करने की पैरोकारी शासन में तेज कर दी। मंदिर की नकारात्मक गतिविधियों और मंदिर की आय की जानकारी शासन को दी गई। इसके बाद शासन ने इस पर कार्य शुरू किया। सूत्रों की माने तो अगस्त माह से कुछ सेवायत लगातार शासन से संपर्क कर रहे हैं और अपना समर्थन मंदिर के अधिग्रहण के पक्ष में दे चुके हैं।
बताया गया है कि एक पखवाड़ा पूर्व भी मंदिर के कुछ सेवायत लखनऊ में अधिकारियों से मिले थे। शनिवार को इस प्रकरण को लेकर मोहन बाग में हुई बैठक में कुछ सेवायत व पदाधिकारी नहीं शामिल नहीं हुए, उनके बैठक में नहीं पहुंचने से सवाल उठ रहे हैं कि कहीं वह अधिग्रहण के समर्थन में तो नहीं हैं। हालांकि प्रबंध कमेटी के अध्यक्ष नंदकिशोर उपमन्यु इस मुद्दे पर सभी सेवायत के एक साथ होने का दावा कर रहे हैं।