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‘गीतों में कशिश नहीं, संगीत में सिर्फ शोर’

Mon, 13 Jul 2015 11:50 PM IST
ब्यूरो, अमर उजाला मथ्ाुरा
ब्यूरो, अमर उजाला मथ्ाुरा Updated Mon, 13 Jul 2015 11:50 PM IST
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lyricist shailendra's sone talking to media
आज की फिल्मों से मन को सुकून देने वाला संगीत गायब है। फिल्मी दुनिया कंप्यूटरीकृत हो गई है। फिल्म बनाने के मायने भी बदल गए हैं। अब संगीतकार और गीतकार को उतना आदर मिलता, जितना मुख्य कलाकार को मिलता है। यह पहले नहीं था।
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ऐसा कहना है, मशहूर गीतकार शैलेंद्र के पुत्र दिनेश शंकर और पुत्री अमला का। दोनों जन सांस्कृतिक मंच के लोगों के अनुरोध पर मथुरा आए थे। स्थानीय होटल में उन्होंने अमर उजाला से विशेष बातचीत में अब के बॉलीवुड और शैलेंद्र के समय के  बारे में चर्चा की। पुराने अनुभव भी बताए।   
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गीतकार शैलेंद्र के सबसे छोटे पुत्र दिनेश और पुत्री अमला ने कहा कि आज बॉलीवुड की फिल्मों से संदेश वाहक सामग्री और समाज को दिशा देने वाली कहानियां गायब हैं। फिल्म भी ऐसी आ रही हैं कि परिवार के साथ थिएटर में नहीं देख सकते। पहले दौर अलग था। फिल्म बनाने के दौरान संगीतकार, गीतकार और गायक बराबर का सम्मान पाते थे। आज के फिल्मकार गीतकारों पर गीत को अपने हिसाब से थोपते हैं। इससे गीतों में कशिश नहीं आ पा रही है और वह शोर बनकर रह जाते हैं।
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दिनेश ने कहा कि उनके पिता ने समाज की हकीकत, मानवता और व्यवहारिकता पर गीत लिखे। इसमें सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है, समाज की हकीकत और मानवता पर आधारित है। लता मंगेशकर के साथ फ्रेंडशिप और आइसक्रीम खाने के कंपटीशन के दौरान लिखा गाना ‘मुड़-मुड़ के ना देख मुड़-मुड़ के’ व्यावहारिक है। दिनेश ने कहा कि फिल्म अवार्ड देने में भी सेटिंग चलती है।

एक वाकया याद करते हुए उन्होंने बताया कि साहिर लुधियानवी ने ताजमहल फिल्म पर अवार्ड लेने से मना कर दिया था। उनका कहना था कि इसके असली हकदार तो शैलेन्द्र हैं। वे अवार्ड लेने नहीं गए और अवार्ड उनके घर पहुंचाया गया। बता दें कि गीतकार शैलेंद्र का मथुरा से काफी पुराना नाता है। वे काफी दिनों यहां रहे थे। उनके नाम पर यहां स्मृति द्वार बनाने की घोषणा भी हो चुकी है। वार्ता के दौरान डा. अशोक बंसल, पवन चतुर्वेदी, डा. आरके चतुर्वेदी, रामसरीन एडवोकेट, सतीश चांद आदि मौजूद थे।



गली गंगा सिंह में रहे थे शैलेन्द्र
गीतकार शैलेन्द्र अपने बड़े भाई बीडी राव के साथ शहर के धौलीप्याऊ क्षेत्र की गली गंगासिंह में रहे थे। उन्होंने 1939 में जीआईसी से हाईस्कूल उत्तीर्ण की औ प्रदेश में तीसरा स्थान पाया। शैलेन्द्र प्रख्यात अभिनेता राजकपूर के चहेते थे। उन्होंने लगभग 170 फिल्मों के लिए 800 से अधिक गीत लिखे। उनके अल्फाजों को मशहूर गायक मुकेश, लता मंगेशकर, आशा भौंसले, मोहम्मद रफी, मन्ना डे, किशोर कुमार आदि ने आवाज दी।
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