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हारे रे रसिया घर चले, जीत चली ब्रजनारि
ब्यूरो, अमर उजाला मथुरा
Updated Sat, 26 Mar 2016 12:03 AM IST
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दाऊजी का हुरंगा
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देशभर में होली आयोजन के बाद ब्रज में रंगोत्सव की पराकाष्ठा देखते को मिली। शुक्रवार को ब्रज के राजा बलदाऊ की नगरी में हुरियारिनों ने उम्र के बंधन भूल हुरियारों पर प्रेम से पगे कोड़े बरसाए हैं तो हुरियारों ने बाल्टियां भर-भर हुरियारिनों पर रंग उड़ेला। ‘ऐसी होरी मचाई कृष्ण-बलराम कि गूंज उठे चाराें धाम...’ ये पंक्ति श्रीदाऊजी मंदिर में सच साबित हो रही थी।
पूरे देश से ब्रज की होली देखने पहुंचे श्रद्धालु पहली बार में तो इसे भी होली समझ बैठे लेकिन श्रीदाऊजी के सामने हुरियारे और हुरियारिनों की अद्भुत रंगक्रीड़ा देख समझ आ गया कि ‘जि होरी नाय दाऊजी को हुरंगा है’।
श्रीदाऊजी मंदिर का प्रांगण शुक्रवार को देवलोक सा नजर आया। मंदिर के पट खुलते ही बलदेवजी को ‘बलराम कुमार होली खेले कूं, भैया खेले होरी फाग’ से होली खेलने का निमंत्रण दिया गया। गोप समूह मंदिर प्रांगण में बने हौदों मेें रखे टेसू के फूलों के रंग की ओर तेजी से लपके और रंग को बाल्टी व पिचकारी से भरकर हुरियारिनाें और दर्शकाें पर डालने लगे।
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सतरंगी गुलाल और गुलाब के फूलों की बरसात बीच गोपी स्वरूप महिलाएं गोप स्वरूप हुरियारों के बदन से कपडे़ फाड़तीं और उनके कोड़े बना कर हुरियारों के ही नंगे बदन पर बरसातीं। इससे तड़ातड़ और चर-चर की आवाज आने लगी। गोपिकाएं उलाहना मारते हुए कह रही थीं कि‘होरी तोते जब खेलूं मेरी पौहची में नग जड़वाय।’
इसी बीच होड़ रहती हुरियारों से रेवती मैया और बलदाऊ के झंडे को छीनने की। झंडा न मिलने पर हुरियारे ‘हारी रे गोरी घर चली, जीत चले ब्रजबाल’ गाकर उलाहना देते दिखे तो हुरियारिनों ने दूने उत्साह के साथ झंडा छीना और ‘हारे रे रसिया घर चले, जीत चली ब्रजनारि’ गाकर अपनी जीत का जश्न मनाया।
इसी बीच फाग के स्वरों के साथ रसिया नफीरी, ढोल, मृदंग की गगनभेदी आवाज प्रांगण में मौजूद हजारों श्रद्धालुओं को आनंदित करती रही। हुरियारे और हुरियारिनें गीतों की धुनाें पर थिरक रहे थे। कुछ गोप बलदेवजी के आयुध हल व मूसल को तो कुछ श्रीकृष्ण स्वरूप में मुरली की धुन बजाते मस्त हुए अद्भुत वातावरण बना रहे थे।
मंदिर प्रांगण में हजारों श्रद्धालु और ब्रज के संत प्रभु की इस अद्भुत लीला को साकार होते देख आध्यात्मिक आनंद ले रहे थे। ब्रज की होली का मुकुटमणि दाऊजी का हुरंगा पूरे दो घंटे तक चला। समाज गायन ‘ढप धरि दे यार गई परु की, जो जीवे सौ खेले फाग’ के साथ हुरंगा का समापन हो गया।
होली खेलने को मचल उठे कृष्ण-बलराम स्वरूप
मंदिर प्रांगण मेें मंच पर बलराम, श्रीकृष्ण और सखा के प्रतीकात्मक स्वरूप अबीर गुलाल के साथ होली खेल रहे थे। हुरियारिनें पिटाई में भूल जाती है कि सामने उनके जेठ हैं या ससुर।
मशीनों से उड़ा गुलाल
हुरंगा में गुलाल और अबीर उड़ाने के लिए मशीनों का उपयोग किया गया। मंदिर रिसीवर आरके पाण्डेय ने बताया कि 100 मन गुलाल, 51 मन अबीर, 51 मन विभिन्न फूलों की पंखुडिया उड़ाई गईं। टेसू के रंग 10 क्विंटल, 2 क्विंटल फिटकरी, सफेदी कलई 2 क्विंटल और इत्र व केशर का प्रयोग किया गया। मध्यप्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजराज, दिल्ली व यूपी के विभिन्न स्थानों से आये दर्शक से बडे़ ही निराले अन्दाज में कहा कि जित्तौ इत्ती मारपेऊ हंसत नाचत गावत है। ऐसौ हुरंगा कबऊ न देखौ।
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पूरे देश से ब्रज की होली देखने पहुंचे श्रद्धालु पहली बार में तो इसे भी होली समझ बैठे लेकिन श्रीदाऊजी के सामने हुरियारे और हुरियारिनों की अद्भुत रंगक्रीड़ा देख समझ आ गया कि ‘जि होरी नाय दाऊजी को हुरंगा है’।
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श्रीदाऊजी मंदिर का प्रांगण शुक्रवार को देवलोक सा नजर आया। मंदिर के पट खुलते ही बलदेवजी को ‘बलराम कुमार होली खेले कूं, भैया खेले होरी फाग’ से होली खेलने का निमंत्रण दिया गया। गोप समूह मंदिर प्रांगण में बने हौदों मेें रखे टेसू के फूलों के रंग की ओर तेजी से लपके और रंग को बाल्टी व पिचकारी से भरकर हुरियारिनाें और दर्शकाें पर डालने लगे।
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सतरंगी गुलाल और गुलाब के फूलों की बरसात बीच गोपी स्वरूप महिलाएं गोप स्वरूप हुरियारों के बदन से कपडे़ फाड़तीं और उनके कोड़े बना कर हुरियारों के ही नंगे बदन पर बरसातीं। इससे तड़ातड़ और चर-चर की आवाज आने लगी। गोपिकाएं उलाहना मारते हुए कह रही थीं कि‘होरी तोते जब खेलूं मेरी पौहची में नग जड़वाय।’
इसी बीच होड़ रहती हुरियारों से रेवती मैया और बलदाऊ के झंडे को छीनने की। झंडा न मिलने पर हुरियारे ‘हारी रे गोरी घर चली, जीत चले ब्रजबाल’ गाकर उलाहना देते दिखे तो हुरियारिनों ने दूने उत्साह के साथ झंडा छीना और ‘हारे रे रसिया घर चले, जीत चली ब्रजनारि’ गाकर अपनी जीत का जश्न मनाया।
इसी बीच फाग के स्वरों के साथ रसिया नफीरी, ढोल, मृदंग की गगनभेदी आवाज प्रांगण में मौजूद हजारों श्रद्धालुओं को आनंदित करती रही। हुरियारे और हुरियारिनें गीतों की धुनाें पर थिरक रहे थे। कुछ गोप बलदेवजी के आयुध हल व मूसल को तो कुछ श्रीकृष्ण स्वरूप में मुरली की धुन बजाते मस्त हुए अद्भुत वातावरण बना रहे थे।
मंदिर प्रांगण में हजारों श्रद्धालु और ब्रज के संत प्रभु की इस अद्भुत लीला को साकार होते देख आध्यात्मिक आनंद ले रहे थे। ब्रज की होली का मुकुटमणि दाऊजी का हुरंगा पूरे दो घंटे तक चला। समाज गायन ‘ढप धरि दे यार गई परु की, जो जीवे सौ खेले फाग’ के साथ हुरंगा का समापन हो गया।
होली खेलने को मचल उठे कृष्ण-बलराम स्वरूप
मंदिर प्रांगण मेें मंच पर बलराम, श्रीकृष्ण और सखा के प्रतीकात्मक स्वरूप अबीर गुलाल के साथ होली खेल रहे थे। हुरियारिनें पिटाई में भूल जाती है कि सामने उनके जेठ हैं या ससुर।
मशीनों से उड़ा गुलाल
हुरंगा में गुलाल और अबीर उड़ाने के लिए मशीनों का उपयोग किया गया। मंदिर रिसीवर आरके पाण्डेय ने बताया कि 100 मन गुलाल, 51 मन अबीर, 51 मन विभिन्न फूलों की पंखुडिया उड़ाई गईं। टेसू के रंग 10 क्विंटल, 2 क्विंटल फिटकरी, सफेदी कलई 2 क्विंटल और इत्र व केशर का प्रयोग किया गया। मध्यप्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजराज, दिल्ली व यूपी के विभिन्न स्थानों से आये दर्शक से बडे़ ही निराले अन्दाज में कहा कि जित्तौ इत्ती मारपेऊ हंसत नाचत गावत है। ऐसौ हुरंगा कबऊ न देखौ।