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Mathura News: 403 वर्षों तक पेड़ों की टहनियाें पर फूलपत्ती से सुसज्जित हिंडोले का आनंद उठाते थे बिहारीजी
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मथुरा। हरियाली तीज पर इसी झूले पर विराजेंगे श्री बांके बिहारी। फाइल फोटो
- फोटो : mathura
वृंदावन। श्रीबांकेबिहारी लाल ने 403 वर्षाें तक पेड़ों की टहनियों पर सुगंधित पुष्प कलियों से सुसज्जित हिंडोले का आनंद उठाया था। उसके बाद 19 अगस्त 1947 के दिन हरियाली तीज पर्व की शाम को प्रथम बार भव्य स्वर्ण रजत निर्मित जड़ाऊ हिंडोले में झूला विहार किया था। इस बार 27 जुलाई को आयोजित झूलनोत्सव में 79वीं बार इस झूले में विराजेंगे।
सेवायत आचार्य प्रहलाद बल्लभ गोस्वामी बताते हैं कि हरियाली तीज पर मंदिर में झूलन महोत्सव मनाया जाता है। इस दिन ठाकुरजी सोने-चांदी के झूले पर 79वीं बार विराजेंगे। इस दिन आराध्य प्रभु को हरे रंग की बेशकीमती जड़ाऊ पोशाक व रत्नजड़ित स्वर्णाभूषण धारण कराए जाएंगे। साथ ही मावा, मलाई, मक्खन, सादा मीठा घेवर तथा फीकी- मीठी रसीली- केसरिया फैनी का विशेष भोग अर्पित किया जाएगा।
इस विशेष पर्व पर ठाकुरजी के विश्राम के लिए स्वर्ण रजत निर्मित शयनशैया सजाकर उसके पास रजत आइना सहित शृंगार की समस्त सामग्री (सुहाग पिटारी) रखी जाएगी। भावनानुसार झूला विहार के उपरांत बिहारीजी इसी शैया पर शयन करने के बाद पुनः उठकर सजते संवरते हैं, इसीलिए इस शयनशैया पर सुहाग पिटारी चढ़ाने का विशेष महत्व है।
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बनारस के कारीगर
1942 में महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बांकेबिहारी के हिंडोला का निर्माण कार्य बनारस के कारीगर छोटेलाल और ललन भाई के निर्देशन में 20 कारीगरों के समूह द्वारा 5 वर्ष की मेहनत के बाद पूर्ण हुआ था। हिंडोला निर्माण में एक लाख तोले चांदी व दस हजार तोले सोना एवं शीशम, साल व सागवान की लकड़ी का प्रयोग हुआ। इन लकड़ियों के लिए नेपाल में टनकपुर के जंगल की लकड़ी का सौदा कई वर्षों की लीज पर किया गया था। इसके निर्माण में सेवायत समाज, भक्त परिकर तथा बेरीबाला परिवार ने सहयोग प्रदान किया था। 15 अगस्त 1947 को जिस दिन भारत को आजादी मिली थी, उसी दिन ये झूला ठाकुरजी की सेवार्थ समर्पित किया गया था और भारत के स्वतंत्रता दिवस के तीन दिन बाद 19 अगस्त 1947 को हरियाली तीज पर्व पर श्री बांकेबिहारी ने इस झूले में प्रथम बार दर्शन प्रदान किए थे।
अद्भुत नक्काशी कला का बेजोड़ प्रमाण है यह हिंडोला
करीब 125 अलग-अलग हिस्सों में बना अपने आप में अनूठा हिंडोला नक्काशी कला का बेजोड़ प्रमाण है। नाचते मयूर, टेड़ेमेढ़े खंभे, घुमावदार सीढि़यां एवं ललिता, विशाखा, चित्रलेखा व रंगदेवी नामक सखियों की आदमकद मूर्तियां सहित उकेरे गए बेलबूंटों की कलात्मकता भावुक भक्तों को सहजता से आकर्षित करतीं हैं। उस वक्त इसे बनाने में लगभग 25 लाख रुपये खर्च हुए थे, अब इसकी कीमत तकरीबन सौ करोड़ रुपये से अधिक जाती है।
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सेवायत आचार्य प्रहलाद बल्लभ गोस्वामी बताते हैं कि हरियाली तीज पर मंदिर में झूलन महोत्सव मनाया जाता है। इस दिन ठाकुरजी सोने-चांदी के झूले पर 79वीं बार विराजेंगे। इस दिन आराध्य प्रभु को हरे रंग की बेशकीमती जड़ाऊ पोशाक व रत्नजड़ित स्वर्णाभूषण धारण कराए जाएंगे। साथ ही मावा, मलाई, मक्खन, सादा मीठा घेवर तथा फीकी- मीठी रसीली- केसरिया फैनी का विशेष भोग अर्पित किया जाएगा।
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इस विशेष पर्व पर ठाकुरजी के विश्राम के लिए स्वर्ण रजत निर्मित शयनशैया सजाकर उसके पास रजत आइना सहित शृंगार की समस्त सामग्री (सुहाग पिटारी) रखी जाएगी। भावनानुसार झूला विहार के उपरांत बिहारीजी इसी शैया पर शयन करने के बाद पुनः उठकर सजते संवरते हैं, इसीलिए इस शयनशैया पर सुहाग पिटारी चढ़ाने का विशेष महत्व है।
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बनारस के कारीगर
1942 में महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बांकेबिहारी के हिंडोला का निर्माण कार्य बनारस के कारीगर छोटेलाल और ललन भाई के निर्देशन में 20 कारीगरों के समूह द्वारा 5 वर्ष की मेहनत के बाद पूर्ण हुआ था। हिंडोला निर्माण में एक लाख तोले चांदी व दस हजार तोले सोना एवं शीशम, साल व सागवान की लकड़ी का प्रयोग हुआ। इन लकड़ियों के लिए नेपाल में टनकपुर के जंगल की लकड़ी का सौदा कई वर्षों की लीज पर किया गया था। इसके निर्माण में सेवायत समाज, भक्त परिकर तथा बेरीबाला परिवार ने सहयोग प्रदान किया था। 15 अगस्त 1947 को जिस दिन भारत को आजादी मिली थी, उसी दिन ये झूला ठाकुरजी की सेवार्थ समर्पित किया गया था और भारत के स्वतंत्रता दिवस के तीन दिन बाद 19 अगस्त 1947 को हरियाली तीज पर्व पर श्री बांकेबिहारी ने इस झूले में प्रथम बार दर्शन प्रदान किए थे।
अद्भुत नक्काशी कला का बेजोड़ प्रमाण है यह हिंडोला
करीब 125 अलग-अलग हिस्सों में बना अपने आप में अनूठा हिंडोला नक्काशी कला का बेजोड़ प्रमाण है। नाचते मयूर, टेड़ेमेढ़े खंभे, घुमावदार सीढि़यां एवं ललिता, विशाखा, चित्रलेखा व रंगदेवी नामक सखियों की आदमकद मूर्तियां सहित उकेरे गए बेलबूंटों की कलात्मकता भावुक भक्तों को सहजता से आकर्षित करतीं हैं। उस वक्त इसे बनाने में लगभग 25 लाख रुपये खर्च हुए थे, अब इसकी कीमत तकरीबन सौ करोड़ रुपये से अधिक जाती है।