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Mathura News: सृष्टि रची, फिर भी पूजा से परहेज…
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चौमुहां। जिसने सृष्टि की रचना की, भला उसी की पूजा न हो, यह बात सहज ही कौतूहल पैदा करती है। त्रिदेवों में शामिल सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्माजी के मंदिर देश में गिने-चुने हैं। धार्मिक और स्थानीय मान्यता के अनुसार, विश्व में ब्रह्माजी के दो प्रमुख मंदिर माने जाते हैं। इनमें से एक राजस्थान के पुष्कर में और दूसरा ब्रजभूमि के चौमुहां में। चौमुहां की ब्रह्मझाड़ी को भगवान ब्रह्मा की तपोस्थली माना जाता है। यहां भाद्रपद पूर्णिमा पर हर वर्ष मेला लगता है। शनिवार आज सुबह से ही दो दिवसीय मेला लगेगा। कुश्ती दंगल का आयोजन होगा। रात्रि में पथवारी मंदिर पर रसिया दंगल का आयोजन होगा।
ब्रह्मझाड़ी से जुड़ी पौराणिक मान्यता के अनुसार, एक बार ब्रह्माजी आकाश मार्ग से गुजर रहे थे। उन्होंने पृथ्वी लोक पर भगवान श्रीकृष्ण को ग्वाल-बालों के साथ गाय चराते देखा। श्रीकृष्ण ग्वाल-बालों के साथ भोजन कर रहे थे और उनका जूठा भी ग्रहण कर रहे थे। यह देखकर ब्रह्माजी को श्रीकृष्ण के ईश्वर होने पर संदेह हुआ। श्रीकृष्ण की परीक्षा लेने के लिए ब्रह्माजी ने उनकी गाय और बछड़ों को एक झाड़ी में छिपा दिया। कुछ समय बाद लौटकर देखा तो श्रीकृष्ण उन्हीं गाय-बछड़ों के साथ मौजूद थे। इसके बाद ब्रह्माजी ने गुफा में जाकर देखा तो वहां भी सभी गाय-बछड़े मौजूद थे। श्रीकृष्ण की इस दिव्य लीला को देखकर ब्रह्माजी को अपनी भूल का अहसास हुआ और उन्होंने भगवान से क्षमा मांगी। मान्यता है कि पश्चाताप के बाद ब्रह्माजी ने इसी झाड़ी में तपस्या की और श्रीकृष्ण के नाम का स्मरण किया। इसी कारण यह स्थान बाद में ब्रह्मझाड़ी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। स्थानीय मान्यता के अनुसार, कालांतर में यहां जमीन से ब्रह्माजी की प्रतिमा प्राप्त हुई, जिसके बाद मंदिर का निर्माण कराया गया। स्थानीय मान्यता के अनुसार ब्रह्माजी के चार मुख होने के कारण पहले इस क्षेत्र का नाम चौमुख पड़ा, जो कालांतर में चौमुहां के नाम से प्रसिद्ध हो गया। ब्रह्मझाड़ी आज भी क्षेत्र की धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र है।
श्राप के चलते नहीं होती ब्रह्माजी की पूजा
पौराणिक मान्यता के अनुसार ब्रह्माजी और भगवान विष्णु के बीच श्रेष्ठता को लेकर विवाद हुआ था। इसी दौरान भगवान शिव ने दोनों की परीक्षा ली। मान्यता है कि परीक्षा के दौरान ब्रह्माजी द्वारा असत्य कहे जाने पर भगवान शिव ने उन्हें श्राप दिया कि कलियुग में उनकी पूजा नहीं होगी। इसी कथा को ब्रह्माजी के मंदिर कम होने के कारणों में बताया जाता है।
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मेले में उमड़ेगा श्रद्धालुओं का सैलाब
ब्रह्माजी मंदिर पर आज शनिवार से सुबह पूजा-अर्चना के साथ मेले की शुरुआत होगी। महंत धनीराम दास द्वारा पूजा कराई जाएगी। कमेटी ने बताया कि दोपहर दो बजे से कुश्ती दंगल होगा। रात नौ बजे पथवारी मंदिर पर रसिया दंगल आयोजित किया जाएगा। मेले को लेकर मंदिर परिसर और कस्बे में तैयारियां पूरी की जा रही हैं।
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ब्रह्मझाड़ी से जुड़ी पौराणिक मान्यता के अनुसार, एक बार ब्रह्माजी आकाश मार्ग से गुजर रहे थे। उन्होंने पृथ्वी लोक पर भगवान श्रीकृष्ण को ग्वाल-बालों के साथ गाय चराते देखा। श्रीकृष्ण ग्वाल-बालों के साथ भोजन कर रहे थे और उनका जूठा भी ग्रहण कर रहे थे। यह देखकर ब्रह्माजी को श्रीकृष्ण के ईश्वर होने पर संदेह हुआ। श्रीकृष्ण की परीक्षा लेने के लिए ब्रह्माजी ने उनकी गाय और बछड़ों को एक झाड़ी में छिपा दिया। कुछ समय बाद लौटकर देखा तो श्रीकृष्ण उन्हीं गाय-बछड़ों के साथ मौजूद थे। इसके बाद ब्रह्माजी ने गुफा में जाकर देखा तो वहां भी सभी गाय-बछड़े मौजूद थे। श्रीकृष्ण की इस दिव्य लीला को देखकर ब्रह्माजी को अपनी भूल का अहसास हुआ और उन्होंने भगवान से क्षमा मांगी। मान्यता है कि पश्चाताप के बाद ब्रह्माजी ने इसी झाड़ी में तपस्या की और श्रीकृष्ण के नाम का स्मरण किया। इसी कारण यह स्थान बाद में ब्रह्मझाड़ी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। स्थानीय मान्यता के अनुसार, कालांतर में यहां जमीन से ब्रह्माजी की प्रतिमा प्राप्त हुई, जिसके बाद मंदिर का निर्माण कराया गया। स्थानीय मान्यता के अनुसार ब्रह्माजी के चार मुख होने के कारण पहले इस क्षेत्र का नाम चौमुख पड़ा, जो कालांतर में चौमुहां के नाम से प्रसिद्ध हो गया। ब्रह्मझाड़ी आज भी क्षेत्र की धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र है।
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श्राप के चलते नहीं होती ब्रह्माजी की पूजा
पौराणिक मान्यता के अनुसार ब्रह्माजी और भगवान विष्णु के बीच श्रेष्ठता को लेकर विवाद हुआ था। इसी दौरान भगवान शिव ने दोनों की परीक्षा ली। मान्यता है कि परीक्षा के दौरान ब्रह्माजी द्वारा असत्य कहे जाने पर भगवान शिव ने उन्हें श्राप दिया कि कलियुग में उनकी पूजा नहीं होगी। इसी कथा को ब्रह्माजी के मंदिर कम होने के कारणों में बताया जाता है।
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मेले में उमड़ेगा श्रद्धालुओं का सैलाब
ब्रह्माजी मंदिर पर आज शनिवार से सुबह पूजा-अर्चना के साथ मेले की शुरुआत होगी। महंत धनीराम दास द्वारा पूजा कराई जाएगी। कमेटी ने बताया कि दोपहर दो बजे से कुश्ती दंगल होगा। रात नौ बजे पथवारी मंदिर पर रसिया दंगल आयोजित किया जाएगा। मेले को लेकर मंदिर परिसर और कस्बे में तैयारियां पूरी की जा रही हैं।