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धाराओं के बंधन से आजाद हुई अभिव्यक्ति
Thu, 09 Nov 2023 07:05 PM IST
Anonymous User
ब्यूरो, अमर उजाला मैनपुरी
ब्यूरो, अमर उजाला मैनपुरी
Published by: Anonymous User
Updated Thu, 09 Nov 2023 07:05 PM IST
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मैनपुरी। मंगलवार का दिन सोशल मीडिया केक्षेत्र में ऐतिहासिक फैसले का दिन रहा। सुप्रीम कोर्ट ने एक्ट की धारा 66 ए को अभिव्यक्ति की आजादी के मूल अधिकार के विरुद्ध मानते हुए इसे रद कर दिया है। संविधान की धारा 19 के तहत हर नागरिक के पास अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार है। न्यायालय के फैसले के बाद युवाओं ने कलम को धाराओं के बंधन आजाद माना तो प्रबुद्ध वर्ग बेलगामी को लेकर चिंतित दिखा।
देश में युवा से लेकर हर वर्ग के बीच सोशल मीडिया का क्रेज है। फेसबुक, व्हाट्सएप, ट्विटर, हाइक, मैसेन्जर समेत कई माध्यम से लोग विचारों की अभिव्यक्ति करते हैं। लेकिन कई बार उनके विचारों के चलते जटिलताओं का सामना करना पड़ता है। मैनपुरी समेत देश में कई ऐसे मामले हुए हैं जिनमें किसी टिप्पणी के बाद मुकदमा दर्ज हुआ और आरोपी हवालात तक पहुंच गए। मुंबई की दो छात्राओं को फेसबुक पर कमेंट करने के लिए जेल भेजे जाने के बाद यह मामला तूल पकड़ गया तो वहीं आजम खां पर टिप्पणी एक युवक को काफी महंगी पड़ी।
बता दें कि एक्ट की धारा 66 ए के अनुसार सरकार के पास यह शक्ति थी कि वह सोशल मीडिया पर लिखी गई बात को आपत्तिजनक मानते हुए उस व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकती है। जस्टिस जे चेलामेश्वर और रोहिंटन नरीमन की बेंच ने मंगलवार को इस एक्ट के दुरुपयोग पर फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि आईटी एक्ट साफ तौर पर लोगों के जानने के अधिकार का उलंघन करता है। कोर्ट ने अपने फैसले में कानून को अस्पष्ट और असंवैधानिक तक ठहरा दिया। कानून की छात्रा श्रेया सिंघल समेत एनजीओ और मानवाधिकार संगठनों ने इसके खिलाफ याचिका दायर की थी।
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दीवानी के अधिवक्ता अजय कृष्ण पांडेय का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने केवल आईटी एक्ट की धारा 66-ए को रद्द किया है। इससे कोई अधिक लाभ नहीं मिलेगा। धारा के रद होने से अपत्ति जनक पोस्ट डालने की इजाजत नहीं मिल जाती। आईपीसी में भी इस में रिपोर्ट दर्ज कराने का प्रावधान है। अधिवक्ता आशुतोष पांडेय का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट क ा यह निर्णय सराहनीय है। अभी तक यदि धोखे से भी कोई टिप्पणी पोस्ट हो जाती तो पुलिस ब्लैकमेल करने लगती थी।
फेसबुक उपभोक्ता आशीष तिवारी का कहना है कि किसी को कुछ बोलने या लिखने से पहले यह सोचकर नहीं डरना होगा कि उन्हें गिरफ्तार भी किया जा सकता है। हालांकि सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक चीजें पोस्ट करने पर कार्रवाई का प्रावधान सख्त होना चाहिए। कोर्ट ने अपने आदेश में समाजवादी चिंतक लोहिया का उदाहरण भी दिया है यह पारदर्शिता को दर्शाता है।
साधना सिंह ने कहा कि.यह कानून लोकतंत्र विरोधी था। सरकार लोगों को बोलने नहीं देना चाहती. आप वह कंटेंट देखिए जिसके कारण लोगों को जेल भेजा गया है, उसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जिसके कारण किसी को जेल में भर दिया जाए। यह फैसला संविधान और जनता दोनों की जीत है।
मैनपुरी में भी दर्ज हुआ था आईटी एक्ट में मुकदमा
एक समुदाय के पैगंबर के खिलाफ फेसबुक पर डाली थी अश्लील टिप्पणी
आईटी की धारा 66-ए के तहत थाना भोगांव में रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी। थाना बेवर क्षेत्र के ग्राम कल्यानपुर निवासी अरुण आदित्य ने 16 अप्रैल 2014 को फेसबुक पर एक पैगंबर के खिलाफ आपत्तिजनक पोस्ट डाली थी। 17 अप्रैल को भोगांव के मोहल्ला करियानीम निवासी साजेब खां ने अरुण आदित्य के खिलाफ थाना भोगांव में आईटी एक्ट की धारा 66-ए, 135-क के तहत रिपोर्ट दर्ज कराई थी। चार अगस्त 2014 को अरुण ने कोर्ट में सरेंडर कर वहां से जमानत करा ली।
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देश में युवा से लेकर हर वर्ग के बीच सोशल मीडिया का क्रेज है। फेसबुक, व्हाट्सएप, ट्विटर, हाइक, मैसेन्जर समेत कई माध्यम से लोग विचारों की अभिव्यक्ति करते हैं। लेकिन कई बार उनके विचारों के चलते जटिलताओं का सामना करना पड़ता है। मैनपुरी समेत देश में कई ऐसे मामले हुए हैं जिनमें किसी टिप्पणी के बाद मुकदमा दर्ज हुआ और आरोपी हवालात तक पहुंच गए। मुंबई की दो छात्राओं को फेसबुक पर कमेंट करने के लिए जेल भेजे जाने के बाद यह मामला तूल पकड़ गया तो वहीं आजम खां पर टिप्पणी एक युवक को काफी महंगी पड़ी।
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बता दें कि एक्ट की धारा 66 ए के अनुसार सरकार के पास यह शक्ति थी कि वह सोशल मीडिया पर लिखी गई बात को आपत्तिजनक मानते हुए उस व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकती है। जस्टिस जे चेलामेश्वर और रोहिंटन नरीमन की बेंच ने मंगलवार को इस एक्ट के दुरुपयोग पर फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि आईटी एक्ट साफ तौर पर लोगों के जानने के अधिकार का उलंघन करता है। कोर्ट ने अपने फैसले में कानून को अस्पष्ट और असंवैधानिक तक ठहरा दिया। कानून की छात्रा श्रेया सिंघल समेत एनजीओ और मानवाधिकार संगठनों ने इसके खिलाफ याचिका दायर की थी।
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दीवानी के अधिवक्ता अजय कृष्ण पांडेय का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने केवल आईटी एक्ट की धारा 66-ए को रद्द किया है। इससे कोई अधिक लाभ नहीं मिलेगा। धारा के रद होने से अपत्ति जनक पोस्ट डालने की इजाजत नहीं मिल जाती। आईपीसी में भी इस में रिपोर्ट दर्ज कराने का प्रावधान है। अधिवक्ता आशुतोष पांडेय का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट क ा यह निर्णय सराहनीय है। अभी तक यदि धोखे से भी कोई टिप्पणी पोस्ट हो जाती तो पुलिस ब्लैकमेल करने लगती थी।
फेसबुक उपभोक्ता आशीष तिवारी का कहना है कि किसी को कुछ बोलने या लिखने से पहले यह सोचकर नहीं डरना होगा कि उन्हें गिरफ्तार भी किया जा सकता है। हालांकि सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक चीजें पोस्ट करने पर कार्रवाई का प्रावधान सख्त होना चाहिए। कोर्ट ने अपने आदेश में समाजवादी चिंतक लोहिया का उदाहरण भी दिया है यह पारदर्शिता को दर्शाता है।
साधना सिंह ने कहा कि.यह कानून लोकतंत्र विरोधी था। सरकार लोगों को बोलने नहीं देना चाहती. आप वह कंटेंट देखिए जिसके कारण लोगों को जेल भेजा गया है, उसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जिसके कारण किसी को जेल में भर दिया जाए। यह फैसला संविधान और जनता दोनों की जीत है।
मैनपुरी में भी दर्ज हुआ था आईटी एक्ट में मुकदमा
एक समुदाय के पैगंबर के खिलाफ फेसबुक पर डाली थी अश्लील टिप्पणी
आईटी की धारा 66-ए के तहत थाना भोगांव में रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी। थाना बेवर क्षेत्र के ग्राम कल्यानपुर निवासी अरुण आदित्य ने 16 अप्रैल 2014 को फेसबुक पर एक पैगंबर के खिलाफ आपत्तिजनक पोस्ट डाली थी। 17 अप्रैल को भोगांव के मोहल्ला करियानीम निवासी साजेब खां ने अरुण आदित्य के खिलाफ थाना भोगांव में आईटी एक्ट की धारा 66-ए, 135-क के तहत रिपोर्ट दर्ज कराई थी। चार अगस्त 2014 को अरुण ने कोर्ट में सरेंडर कर वहां से जमानत करा ली।