{"_id":"57531a384f1c1bbe53109948","slug":"the-developments-at-the-expense-of-health","type":"story","status":"publish","title_hn":"सेहत की कीमत पर हो रहा विकास ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
सेहत की कीमत पर हो रहा विकास
अमर उजाला ब्यूरो, मैनपुरी
Updated Sat, 04 Jun 2016 11:43 PM IST
विज्ञापन
पर्यावरण
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
शहर का विकास पर्यावरण और मानव की सेहत की कीमत पर हो रहा है। इस विकास के दुष्प्रभाव भी तत्काल देखे जा रहे हैं। मगर, रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाए जा रहे। धरातल पर आम आदमी से लेकर अधिकारी और संस्थाएं कुछ नहीं कर रहे हैं। प्रदूषण बढ़ने के कारण ही शहर की हवा से लेकर भूगर्भ जल तक प्रदूषित हो रहा है। विकास के लिए जगह-जगह हो रहे निर्माण कार्य लोगों को सांस और अस्थमा की चपेट में आ रहे हैं। विश्व पर्यावरण दिवस पर रविवार को पर्यावरण के प्रदूषित होने पर चिंता जताई जाएगी, लेकिन हकीकत में कुछ नहीं किया जाएगा
धूल बन रही बीमारी का कारण
सीएमओ डा. केके शर्मा ने बताया कि धूल का गुबार लोगों को श्वांस और अस्थमा का रोगी बना रहा है। धूल फेफड़ों तक जाकर लोगों को मरीज बना रही है। आंखों की बीमारियां भी लोगों को परेशान कर रही है।
कैसे हो पर्यावरण कंट्रोल
जिले में प्रदूषण नियंत्रण के लिए कोई संसाधन नहीं। इसके लिए न तो शासन-प्रशासन ने कोई पहल की और न ही किसी गैर सरकारी संगठन ने। जिले में प्रदूषण के बारे में पता ही नहीं चलता।
विज्ञापन
3500 पेड़ों काटे गए
फोर लेन सड़क निर्माण बनाने के लिए जिले में करीब साढ़े तीन हजार पेड़ काटे गए, लेकिन कार्यदायी संस्था ने उसके बदले एक भी पौधा नहीं लगाया। जबकि नियमानुसार कार्यदायी संस्था को इसके बदले दो गुने पेड़ लगाने पड़ते हैं। लेकिन अभी तक किसी भी कार्यदायी संस्था ने पौध रोपण नहीं किया।
वाहन भी बन रहे कारण
जिले में 15-20 साल पुराने वाहनों की संख्या काफी है। इनके पास न तो फिटनेस है और न ही प्रदूषण प्रमाण पत्र। इन वाहनों से निकलने वाला धुआं भी पर्यावरण को प्रदूषित कर रहा है।
पर्यावरण मित्र योजना का पता नहीं
पर्यावरण मित्र को ही लें तो इसके गठन के पीछे मंशा थी कि प्रदूषण के कारणों की खोज और वातावरण को प्रदूषण से मुक्त रखने के प्रयास किए जाएंगे, तो लोगों को पर्यावरण की रक्षा के लिए प्रेरित किया जाएगा। लेकिन पर्यावरण मित्र यह योजना केवल सरकारी फाइलों में ही सिमट कर रह गई।
हरियाली प्रोजेक्ट का भी नहीं मिला लाभ
बडे़ पैमाने पर जिले भर में हो रहे पेड़ों के कटान का ही परिणाम है कि हरियाली प्रोजेक्ट में 25 हजार पौधे रोपने के बाद भी जिले के वन क्षेत्र में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है। यह पहले के समान ही मात्र 0.5 प्रतिशत पर ही स्थिर है। इस संबंध में प्रभागीय निदेशक सामाजिक वानिकी सिद्धार्थ कुमार का कहना कि फोर लेन सड़क निर्माण कर रही संस्था को जुलाई में पौधरोपण करने के लिए कहा गया है।
ईशन नदी से गायब हुए जलचल
एक समय शहर के बीच से होकर गुजर रही ईशन नदी में बड़ी संख्या में कछुए, मछली एवं अन्य जलचर बड़ी संख्या में मिलते थे। पर्यावरण से लगातार हो रही छेड़छाड़ के कारण ही जहां नदी का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। वहीं नदी में रहने वाले जलचर भी पूरी तरह से लुप्त हो चुके हैं। यहां पर नदी में सिर्फ जलकुंभी ही दिखती है।
प्राकृतिक धरोहर हो रही हैं समाप्त
पर्यावरण संस्था से जुड़े प्रमोद दुबे बाबा कहते हैं कि अंधाधुंध पेड़ों का कटान और पॉलिथीन का बढ़ता प्रयोग पर्यावरण के लिए खतरा है। प्रदूषण रोकने के लिए हमारी प्राकृतिक धरोहर ही पर्याप्त थी, लेकिन उसे निरंतर समाप्त किया जा रहा है। परिणाम स्वरूप वर्षा का ग्राफ गिरता जा रहा है। नदियों का जल स्तर गिर रहा है। उन्होंने पर्यावरण पर हो रहे हमले के लिए समाज के लोगों को ही दोषी बताया।
विज्ञापन
धूल बन रही बीमारी का कारण
सीएमओ डा. केके शर्मा ने बताया कि धूल का गुबार लोगों को श्वांस और अस्थमा का रोगी बना रहा है। धूल फेफड़ों तक जाकर लोगों को मरीज बना रही है। आंखों की बीमारियां भी लोगों को परेशान कर रही है।
विज्ञापन
कैसे हो पर्यावरण कंट्रोल
जिले में प्रदूषण नियंत्रण के लिए कोई संसाधन नहीं। इसके लिए न तो शासन-प्रशासन ने कोई पहल की और न ही किसी गैर सरकारी संगठन ने। जिले में प्रदूषण के बारे में पता ही नहीं चलता।
विज्ञापन
3500 पेड़ों काटे गए
फोर लेन सड़क निर्माण बनाने के लिए जिले में करीब साढ़े तीन हजार पेड़ काटे गए, लेकिन कार्यदायी संस्था ने उसके बदले एक भी पौधा नहीं लगाया। जबकि नियमानुसार कार्यदायी संस्था को इसके बदले दो गुने पेड़ लगाने पड़ते हैं। लेकिन अभी तक किसी भी कार्यदायी संस्था ने पौध रोपण नहीं किया।
वाहन भी बन रहे कारण
जिले में 15-20 साल पुराने वाहनों की संख्या काफी है। इनके पास न तो फिटनेस है और न ही प्रदूषण प्रमाण पत्र। इन वाहनों से निकलने वाला धुआं भी पर्यावरण को प्रदूषित कर रहा है।
पर्यावरण मित्र योजना का पता नहीं
पर्यावरण मित्र को ही लें तो इसके गठन के पीछे मंशा थी कि प्रदूषण के कारणों की खोज और वातावरण को प्रदूषण से मुक्त रखने के प्रयास किए जाएंगे, तो लोगों को पर्यावरण की रक्षा के लिए प्रेरित किया जाएगा। लेकिन पर्यावरण मित्र यह योजना केवल सरकारी फाइलों में ही सिमट कर रह गई।
हरियाली प्रोजेक्ट का भी नहीं मिला लाभ
बडे़ पैमाने पर जिले भर में हो रहे पेड़ों के कटान का ही परिणाम है कि हरियाली प्रोजेक्ट में 25 हजार पौधे रोपने के बाद भी जिले के वन क्षेत्र में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है। यह पहले के समान ही मात्र 0.5 प्रतिशत पर ही स्थिर है। इस संबंध में प्रभागीय निदेशक सामाजिक वानिकी सिद्धार्थ कुमार का कहना कि फोर लेन सड़क निर्माण कर रही संस्था को जुलाई में पौधरोपण करने के लिए कहा गया है।
ईशन नदी से गायब हुए जलचल
एक समय शहर के बीच से होकर गुजर रही ईशन नदी में बड़ी संख्या में कछुए, मछली एवं अन्य जलचर बड़ी संख्या में मिलते थे। पर्यावरण से लगातार हो रही छेड़छाड़ के कारण ही जहां नदी का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। वहीं नदी में रहने वाले जलचर भी पूरी तरह से लुप्त हो चुके हैं। यहां पर नदी में सिर्फ जलकुंभी ही दिखती है।
प्राकृतिक धरोहर हो रही हैं समाप्त
पर्यावरण संस्था से जुड़े प्रमोद दुबे बाबा कहते हैं कि अंधाधुंध पेड़ों का कटान और पॉलिथीन का बढ़ता प्रयोग पर्यावरण के लिए खतरा है। प्रदूषण रोकने के लिए हमारी प्राकृतिक धरोहर ही पर्याप्त थी, लेकिन उसे निरंतर समाप्त किया जा रहा है। परिणाम स्वरूप वर्षा का ग्राफ गिरता जा रहा है। नदियों का जल स्तर गिर रहा है। उन्होंने पर्यावरण पर हो रहे हमले के लिए समाज के लोगों को ही दोषी बताया।