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हजारों सालों की गाथाओं को समेटे है जिला
अमर उजाला ब्यूरो, मैनपुरी
Updated Sun, 17 Apr 2016 11:12 PM IST
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इतिहास
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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मैनपुरी जिला भले ही काफी पिछड़ा हो लेकिन इसका इतिहास गौरवशाली रहा है। अगर यहां की सांस्कृतिक और पौराणिक धरोहरों को सहेजा जाए तो यहां के कई क्षेत्र हैरिटेज साइट में शामिल हो सकते हैं।
जिले का औंछा क्षेत्र पौराणिक काल को समेटे हुए है। क्षेत्र के विशाल टीले और उनकी खोदाई के दौरान मिलने वाले प्राचीन भगभनावशेष औंछा की प्राचीनता का बोध कराते हैं। कहा जाता है कि जब वर्ष 1392 में मैनपुरी नगर बसाया गया तो औंछा से लोगों को मुफ्त में जमीन और घर बनाने के लिए अनुदान देकर यहां लाया गया था। औंछा क्षेत्र में पौराणिक काल के महर्षि च्यवन, श्रंगी, वेदव्यास जैसे ऋषियों के आश्रम होने का भी उल्लेख मिलता है। छठवीं शताब्दी में मथुरा-प्रयाग राजमार्ग पर पड़ने वाले औंछा क्षेत्र में दो सौ से अधिक आश्रमों और मंदिरों का भी उल्लेख मिलता है। शुक्रचार्य पुस्तक के अनुसार श्रंगी और महर्षि वेदव्यास का भी यहां आश्रम था। पुस्तक में औंछा क्षेत्र में विशाल और भव्य सूर्य मंदिर होने का भी उल्लेख किया गया है। इतिहासकार श्रीकृष्ण मिश्र ने एक लेख में औंछा क्षेत्र में छठवीं-सातवीं शताब्दी में दो सौ से अधिक आश्रम और मंदिर होने का उल्लेख किया है।
वहीं जिले के गांव विधूना के पास महर्षि मार्कंडेय की तपोभूमि तमाम पौराणिक गाथाओं को समेटे हुए है। मान्यता है कि सैकड़ों एकड़ क्षेत्र में फैले हुए अरण्य में सतयुग, त्रेता, द्वापर एवं कलियुग के प्रारंभिक काल तक प्रत्येक युग में अनेक ऋषियों, मुनियों और तपस्वियों ने यहां साधना की थी। महात्मा विदुर का टीला कहे जाने वाले स्थान पर की गई खोदाई में निकली मूर्तियां और अंदर किसी आलीशान महल के भग्नावशेष बताते हैं कि यह स्थल अपने अंदर पौराणिक गाथा समेटे है। कहा जाता है कि महात्मा विदुर के नाम पर ही इस स्थान का नाम विधूना पड़ा है।
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जिला मुख्यालय से मैनुपरी-सिरसागंज रोड पर करीब 22 किमी दूर स्थित ग्राम विधूना में कई अवशेष आज भी मौजूद हैं जो किसी पौराणिक स्थल होने की गवाही देते हैं। कुछ मूर्तियां आज भी टीले पर खुले में रखी हैं। कई विखंडित मूर्तियां अराजक तत्व उठा ले गए। इसके अलावा शहर के बीच में बना महाराजा तेज सिंह का किला भी पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो सकता है। इस किले को महाराज तेज सिंह के पूर्वजों ने बनवाया था। देखरेख के अभाव में यह जीर्णशीर्ण हो चुका है। अगर इसकी सही देखरेख की जाए तो यह दर्शनीय स्थल बन सकता है।
16 टीले हैं मौजूद
च्यवन ऋषि, दत्तात्रेय आश्रम, गर्ग आश्रम (गर्गा वाली टुकिया), नौमस ऋषि आश्रम (नौमरा टुकिया), विभांडक आश्रम (भड़ामई), व्यास आश्रम (बमिया), श्रृंगी ऋषि आश्रम, गरुण आश्रम(गढ़ोखर), कासार्य आश्रम (कसरानी), पाराशर ऋषि आश्रम (पाला), अमर आश्रम (अमसार), राम आश्रम (रामतराई), ओमऋषि आश्रम (उमराव), भुवनेश्वर आश्रम (भमेसर), बहवल ऋषि आश्रम (देवरी), शंखलिखित आश्रम (शंखाबाई की टुकिया)। उक्त 16 आश्रम वर्तमान में टीले के रूप में मौजूद हैं।
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जिले का औंछा क्षेत्र पौराणिक काल को समेटे हुए है। क्षेत्र के विशाल टीले और उनकी खोदाई के दौरान मिलने वाले प्राचीन भगभनावशेष औंछा की प्राचीनता का बोध कराते हैं। कहा जाता है कि जब वर्ष 1392 में मैनपुरी नगर बसाया गया तो औंछा से लोगों को मुफ्त में जमीन और घर बनाने के लिए अनुदान देकर यहां लाया गया था। औंछा क्षेत्र में पौराणिक काल के महर्षि च्यवन, श्रंगी, वेदव्यास जैसे ऋषियों के आश्रम होने का भी उल्लेख मिलता है। छठवीं शताब्दी में मथुरा-प्रयाग राजमार्ग पर पड़ने वाले औंछा क्षेत्र में दो सौ से अधिक आश्रमों और मंदिरों का भी उल्लेख मिलता है। शुक्रचार्य पुस्तक के अनुसार श्रंगी और महर्षि वेदव्यास का भी यहां आश्रम था। पुस्तक में औंछा क्षेत्र में विशाल और भव्य सूर्य मंदिर होने का भी उल्लेख किया गया है। इतिहासकार श्रीकृष्ण मिश्र ने एक लेख में औंछा क्षेत्र में छठवीं-सातवीं शताब्दी में दो सौ से अधिक आश्रम और मंदिर होने का उल्लेख किया है।
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वहीं जिले के गांव विधूना के पास महर्षि मार्कंडेय की तपोभूमि तमाम पौराणिक गाथाओं को समेटे हुए है। मान्यता है कि सैकड़ों एकड़ क्षेत्र में फैले हुए अरण्य में सतयुग, त्रेता, द्वापर एवं कलियुग के प्रारंभिक काल तक प्रत्येक युग में अनेक ऋषियों, मुनियों और तपस्वियों ने यहां साधना की थी। महात्मा विदुर का टीला कहे जाने वाले स्थान पर की गई खोदाई में निकली मूर्तियां और अंदर किसी आलीशान महल के भग्नावशेष बताते हैं कि यह स्थल अपने अंदर पौराणिक गाथा समेटे है। कहा जाता है कि महात्मा विदुर के नाम पर ही इस स्थान का नाम विधूना पड़ा है।
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जिला मुख्यालय से मैनुपरी-सिरसागंज रोड पर करीब 22 किमी दूर स्थित ग्राम विधूना में कई अवशेष आज भी मौजूद हैं जो किसी पौराणिक स्थल होने की गवाही देते हैं। कुछ मूर्तियां आज भी टीले पर खुले में रखी हैं। कई विखंडित मूर्तियां अराजक तत्व उठा ले गए। इसके अलावा शहर के बीच में बना महाराजा तेज सिंह का किला भी पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो सकता है। इस किले को महाराज तेज सिंह के पूर्वजों ने बनवाया था। देखरेख के अभाव में यह जीर्णशीर्ण हो चुका है। अगर इसकी सही देखरेख की जाए तो यह दर्शनीय स्थल बन सकता है।
16 टीले हैं मौजूद
च्यवन ऋषि, दत्तात्रेय आश्रम, गर्ग आश्रम (गर्गा वाली टुकिया), नौमस ऋषि आश्रम (नौमरा टुकिया), विभांडक आश्रम (भड़ामई), व्यास आश्रम (बमिया), श्रृंगी ऋषि आश्रम, गरुण आश्रम(गढ़ोखर), कासार्य आश्रम (कसरानी), पाराशर ऋषि आश्रम (पाला), अमर आश्रम (अमसार), राम आश्रम (रामतराई), ओमऋषि आश्रम (उमराव), भुवनेश्वर आश्रम (भमेसर), बहवल ऋषि आश्रम (देवरी), शंखलिखित आश्रम (शंखाबाई की टुकिया)। उक्त 16 आश्रम वर्तमान में टीले के रूप में मौजूद हैं।