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हर मोर्चे पर सफल हुई ‘आधी आबादी’
अमर उजाला ब्यूरो, मैनपुरी
Updated Thu, 25 Aug 2016 11:23 PM IST
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महिला समानता दिवस
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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सामाजिक सोच में आए बदलाव का ही नतीजा है कि आज महिलाएं हर मोर्चे पर सफल है। किसी भी समस्या का डटकर मुकाबला करने में भी वह सक्षम हैं। घर से निकलकर समाज को सुधारने के लिए आगे आकर कई महिलाओं ने बेहतर मुकाम पाया है। सामाजिक बदलाव का इरादा लेकर आगे बढ़ी इन महिलाओं ने समाज को कई क्षेत्रों में नई दिशा भी दी है।
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बालिका शिक्षा बढ़ाने को चुनी राह
मैनपुरी। ब्लाक मैनपुरी की ग्रामसभा रठेरा की एमबीए प्रधान पूनम यादव ने कभी नहीं सोचा था कि वे प्रधान बनकर जनसेवा करेंगी। चार साल पहले शादी के बाद गांव आईं। पूनम ने जब गांव में शिक्षा और स्वास्थ्य की बदहाली देखी, तो इसमें सुधार की सोची। इस बदलाव के जज्बे के साथ उन्होंने प्रधानी का चुनाव लड़ा। पहले ही प्रयास में प्रधान भी बन गई। वे बालिका शिक्षा और महिलाओं के स्वास्थ्य की दिशा में लगातार पहल कर रही हैं।
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परिवार चलाकर भाई को दिलाया मुकाम
मैनपुरी। नगर निवासी रेखा कौशल एक डिग्री कालेज में निदेशक हैं। मां बाप की बचपन में ही मौत के बाद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। विपरीत परिस्थितियों में खुद पढ़ाई पूरी करके परिवार चलाने के लिए कपिलमुनि डिग्री कालेज में प्राचार्य रहते हुए बालिकाओं की शिक्षा के लिए कार्य किया। अपने इकलौते छोटे भाई दीपक को शिक्षा दिलाकर काबिल बनाया। दीपक आज दिल्ली में एनडीएनसी में नौकरी करते हैं। दीपक भी बहिन के अरमानों को पूरा करने के लिए बालिका शिक्षा की दिशा में अभियान चलाकर पहल कर रहे हैं।
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विपरीत परिस्थितियों में भी नहीं खोया धैर्य
मैनुपरी। मात्र 20 साल की उम्र में ही पिता वीरसिंह की मौत के बाद धैर्य न खोकर तीन छोटी बहिनों को शिक्षित बनाकर परिवार चलाना मुश्किल था। मगर धुन की पक्की बिजनौर निवासी नीता सिंह ने यह कर दिखाया। पुलिस में नौकरी करके खुद अविवाहित रहकर तीन छोटी बहिनों अन्नू, खुशी, चंचल की शादी की। महिला थानाध्यक्ष जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाते हुए आज भी वह अपनी मां निर्मला सिंह और बहनों को बालिका शिक्षा बढ़ाने पर जोर दे रही हैं।
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बालिका शिक्षा बढ़ाने को चुनी राह
मैनपुरी। ब्लाक मैनपुरी की ग्रामसभा रठेरा की एमबीए प्रधान पूनम यादव ने कभी नहीं सोचा था कि वे प्रधान बनकर जनसेवा करेंगी। चार साल पहले शादी के बाद गांव आईं। पूनम ने जब गांव में शिक्षा और स्वास्थ्य की बदहाली देखी, तो इसमें सुधार की सोची। इस बदलाव के जज्बे के साथ उन्होंने प्रधानी का चुनाव लड़ा। पहले ही प्रयास में प्रधान भी बन गई। वे बालिका शिक्षा और महिलाओं के स्वास्थ्य की दिशा में लगातार पहल कर रही हैं।
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परिवार चलाकर भाई को दिलाया मुकाम
मैनपुरी। नगर निवासी रेखा कौशल एक डिग्री कालेज में निदेशक हैं। मां बाप की बचपन में ही मौत के बाद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। विपरीत परिस्थितियों में खुद पढ़ाई पूरी करके परिवार चलाने के लिए कपिलमुनि डिग्री कालेज में प्राचार्य रहते हुए बालिकाओं की शिक्षा के लिए कार्य किया। अपने इकलौते छोटे भाई दीपक को शिक्षा दिलाकर काबिल बनाया। दीपक आज दिल्ली में एनडीएनसी में नौकरी करते हैं। दीपक भी बहिन के अरमानों को पूरा करने के लिए बालिका शिक्षा की दिशा में अभियान चलाकर पहल कर रहे हैं।
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विपरीत परिस्थितियों में भी नहीं खोया धैर्य
मैनुपरी। मात्र 20 साल की उम्र में ही पिता वीरसिंह की मौत के बाद धैर्य न खोकर तीन छोटी बहिनों को शिक्षित बनाकर परिवार चलाना मुश्किल था। मगर धुन की पक्की बिजनौर निवासी नीता सिंह ने यह कर दिखाया। पुलिस में नौकरी करके खुद अविवाहित रहकर तीन छोटी बहिनों अन्नू, खुशी, चंचल की शादी की। महिला थानाध्यक्ष जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाते हुए आज भी वह अपनी मां निर्मला सिंह और बहनों को बालिका शिक्षा बढ़ाने पर जोर दे रही हैं।