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बिस्मिल को भूलने लगे जिले के लोग

Sun, 18 Dec 2016 11:35 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो मैनपुरी
अमर उजाला ब्यूरो मैनपुरी Updated Sun, 18 Dec 2016 11:35 PM IST
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Bismil district, people started forgetting
बिस्मिल को भूलने लगे जिले के लोग - फोटो : अमर उजाला
देश के क्रांतिकारियों के लिए मंत्र बनी लाइनें ‘सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में हैं’ के रचयिता अमर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल का जिले से गहरा नाता रहा है। आजादी के इतिहास में दर्ज मैनपुरी षड्यंत्र केस में शाहजहांपुर से शामिल हुए छह युवकों के लीडर के रूप में बिस्मिल ने भाग लिया था। बावजूद इसके उनके बलिदान दिवस पर कोसमा ही नहीं जिले में कहीं भी उन्हें याद करने की तैयारी नहीं की गई हैं।
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11 जून 1897 को शाहजहांपुर में जन्मे रामप्रसाद बिस्मिल ने देश को आजाद कराने के लिए अंग्रेजों के खिलाफ 11 वर्ष तक क्रांतिकारी के रूप में संघर्ष किया। काकोरी कांड के नायक रामप्रसाद बिस्मिल ने देश की आन की खातिर 19 दिसंबर 1927 को अशफाक उल्ला खां और रोशन सिंह के साथ फांसी का फंदा चूम लिया था। मातृवेदी संगठन से जुड़कर उन्होंने जिले की क्रांतिकारी गतिविधियों में हिस्सा लिया और मैनपुरी षड़यंत्र केस में उनकी अहम भूमिका रही।
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बिस्मिल की बहन शास्त्री देवी की शादी ग्राम कोसमा में ठाकुर गंगा सिंह के साथ हुई थी। वर्ष 1917 से 1919 के दौरान बिस्मिल ने कई महीने कोसमा और जिले के अन्य हिस्सों में बिताए थे। कोसमा में उन्हाेेंने युवाओं को देश की आजादी के लिए संगठित कर क्रांतिकारी बनने को प्रेरित किया। इसी का नतीजा रहा कि कोसमा में 60 से अधिक क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानियों ने देश की आजादी की जंग में आहुतियां दीं। गांव के स्वतंत्रता सेनानी परशुराम बताते हैं कि बिस्मिल की प्रेरणा ही थी कोसमा का बच्चा-बच्चा देश की आजादी के लिए सब कुछ कुर्बान करने को तैयार हो गया था।
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एक मात्र यादगार भी गुमनामी के अंधेरे में
कोसमा में रामप्रसाद बिस्मिल ने कई महीने गुजारे लेकिन उनकी स्मृति के नाम पर गांव में कुछ भी नहीं है। बिस्मिल की बहन ने वर्ष 1969 में उनकी स्मृति में गांव के बाहर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल जूनियर हाईस्कूल की नींव डाली और सरकार ने वर्ष 1971 में उसे सहायता प्राप्त विद्यालय की श्रेणी भी दे दी। लेकिन स्कूल की हालत देखकर लगता ही नहीं कि यह शहीद रामप्रसाद बिस्मिल की यादगार में बना स्कूल है। स्कूल में औपचारिक रूप से शहीद बिस्मिल को नारे लगाकर याद तो कर लिया गया लेकिन खंडहर में तब्दील हो चुके स्कू ल में पढ़ने वाले 71 बच्चों में से अधिकांश नहीं जानते कि बिस्मिल कौन थे। स्कूल के प्रधानाचार्य तो थे नहीं शिक्षक राकेश चतुर्वेदी और वीरेंद्र सिंह यादव ने बताया कि स्कूल की बेहतरी के लिए कोई कुछ करना ही नहीं चाहता। 1987 में शास्त्री देवी और 1988 में पुत्र हरिश्चंद्र सिंह के निधन के बाद स्कूल की हालत बिगड़ती ही चली गई।

क्रांतिकारियों के गांव पर कोई तो ध्यान दे
कोसमा के स्वतंत्रता सेनानी परशुराम (92) को इस बात का मलाल है कि गांव में अमर शहीद बिस्मिल की प्रतिमा तक नहीं लगाई गई है। बिस्मिल की प्रेरणा से ही वे आजादी की जंग में कूदे थे। इसमें रघुनाथ प्रसाद दुबे, बाबूराम कुलश्रेष्ठ, फरसंद अली, निरंजन कश्यप आदि शामिल थे।


शहीद की निशानी हो रही खंडहर
मैनपुरी। शहीद रामप्रसाद बिस्मिल जूनियर हाईस्कूल के छात्र रहे धर्मवीर सिंह राही ने बताया कि ढाई दशक पूर्व तक स्कूल अच्छी हालत में था लेकिन उसके बाद स्कूल खंडहर में तब्दील होता जा रहा है।
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