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किशोर-किशोरियों के सच्चे साथी बने ‘‘साथिया केंद्र’’

Tue, 11 Feb 2020 11:30 PM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Tue, 11 Feb 2020 11:30 PM IST
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"Saathiya Kendra" becomes true partner of Kishore-Kishori
महोबा। किशोरावस्था एक परिवर्तनशील वृद्धि तथा विकास की एक बहुत ही महत्वपूर्ण अवस्था होती है। इस अवस्था में शारीरिक व मानसिक बदलाव बहुत तीव्रता से होते हैं। इस दौरान किशोर-किशोरियों की समस्याओं में विभिन्नता के साथ-साथ जोखिम भी अलग-अलग होते हैं, इसलिए किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक का नाम बदलकर ‘साथिया केंद्र’ कर दिया गया है। जिला अस्पताल में संचालित इस केंद्र में अप्रैल 2019 से अब तक 8,217 किशोर-किशोरियों ने पंजीकरण कराकर अपनी समस्याओं को साझा किया।
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यह बात मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. सुमन सिंह ने कही। उन्होंने बताया कि किशोर -किशोरियों को परामर्श, स्वास्थ्य शिक्षा प्रदान करने के लिए किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक अब नए कलेवर में ‘साथिया केंद्र’ के नाम से स्थापित किए गए हैं। जिला अस्पताल में प्रशिक्षित परामर्शदाताओं द्वारा किशोर-किशोरियों के स्वास्थ्य विषयों पर परामर्श की समुचित सेवाएं मिल रही हैं। इससे उनके जीवन में बड़े बदलाव भी देखने को साफ मिल रहे हैं। जिला कार्यक्रम प्रबंधक ममता अहिरवार ने बताया कि जिला अस्पताल में संचालित किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक का नाम परिवर्तित कर दिया गया है। जिसे अब साथिया केंद्र के नाम से जाना जाएगा। केंद्र में अप्रैल 2019 से अब तक 4,038 किशोर और 4,179 किशोरियों ने पंजीकरण कराया है।
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राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन-उत्तरप्रदेश के महाप्रबंधक-किशोर स्वास्थ्य डॉ. मनोज कुमार शुक्ल का कहना है कि वर्तमान में प्रदेश में कुल 344 साथिया केंद्र क्रियाशील हैं। इन किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक पर अप्रैल 2019 से दिसंबर 2019 तक 13.58 लाख किशोर-किशोरियों द्वारा अपना पंजीकरण कराकर परामर्श एवं क्लीनिकल सेवाएं प्राप्त की गयी हैं। करीब 81 हजार किशोरियों ने माहवारी से संबंधित समस्याओं के बारे में जानकारी ली है।
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नजरंदाज न करें, समस्या को सुलझाएं
जिला अस्पताल में मानसिक रोग विशेषज्ञ डॉ. आदित्य वर्मा ने कहा कि किशोरावस्था के दौरान माता-पिता को भी बच्चों की समस्याओं को सुलझाने का प्रयास करना चाहिए। उनकी समस्याओं को धैर्यपूर्वक सुनें और उचित सलाह दें न कि नजरंदाज करें। टालने और नजरदांज करने से माता-पिता और युवाओं की प्रतिक्रियाएं उनके आपसी स्नेहपूर्ण तथा जिम्मेदार संबंधों में स्वस्थ लैंगिक विकास के विषय में संवाद को मुश्किल बनाते हैं। किशोर-किशोरियां तनाव में आकर डिप्रेशन का भी शिकार हो जाते हैं। मानसिक रोग बन जाते हैं। समय-समय पर उनसे बात करने से काफी हद तक भी इससे बच्चों को बचाया जा सकता है।
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