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Mahoba News: आल्हा-ऊदल के शौर्य का प्रतीक है कजली मेला

Tue, 05 Aug 2025 12:54 AM IST
कानपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, महोबा
संवाद न्यूज एजेंसी, महोबा Updated Tue, 05 Aug 2025 12:54 AM IST
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Kajli fair is a symbol of the bravery of Alha-Udal
-वीर ऊदल की प्रतिमा। संवाद - फोटो : -वीर ऊदल की प्रतिमा। संवाद
महोबा। उत्तर भारत का मशहूर ऐतिहासिक कजली मेला वीर आल्हा-ऊदल के शौर्य, पराक्रम और मातृभूमि से प्रेम का प्रतीक है। 843 वर्ष पहले आल्हा ऊदल ने साधु वेष में दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चौहान को धूल चटाई थी। तब से कजली मेला विजयोत्सव के रूप में लगता चला आ रहा है। दस अगस्त से शुरू होने वाले इस मेले में बुंदेलखंड के हमीरपुर, बांदा, चित्रकूट, झांसी, ललितपुर, जालौन के अलावा मध्यप्रदेश के कई जिलों से हजारों लोग आएंगे।
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महोबा का कजली मेला चंदेल राजा परमाल के शासन से जुड़ा है। 1182 में राजा परमाल की बेटी चंद्रावलि सखियों के साथ भुजरियां विसर्जित करने कीरत सागर जा रही थीं। इसी दौरान दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चौहान ने महोबा पर आक्रमण कर दिया था। चारों ओर से महोबा को घेर लेने की सूचना कन्नौज में रह रहे आल्हा-ऊदल को मिली।
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पृथ्वीराज की योजना राजकुमारी चंद्रावलि का डोला ले जाने की थी। खबर मिलते ही आल्हा-ऊदल चचेरे भाई मलखान के साथ साधु वेष में महोबा आए। कीरत सागर तट पर आल्हा-ऊदल और पृथ्वीराज चौहान के बीच युद्ध हुआ। 24 घंटे चली लड़ाई में पृथ्वीराज चौहान को पराजय का सामना करना पड़ा।
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विजय प्राप्त होने के बाद राजा परमाल की बेटी चंद्रावलि ने सखियोंं के साथ कीरत सागर में भुजरियां विसर्जित की थीं। इसके बाद पूरे राज्य में जश्न मनाया गया था। तभी से विजयोत्सव के रूप में कजली मेला लगता चला आ रहा है।


राष्ट्रीय मेले का दर्जा न मिलने का बुंदेलोंं को मलाल
बुंदेलोंं की आन-बान-शान के प्रतीक ऐतिहासिक कजली मेले को आज तक राष्ट्रीय मेले का दर्जा नहीं मिल सका। समाजसेवी शिवकुमार गोस्वामी, बुंदेली समाज के संयोजक तारा पाटकर का कहना है कि कई बार कजली मेले को राष्ट्रीय मेले का दर्जा दिए जाने की मांग की गई, लेकिन कुछ नहीं हुआ। इसका बुंदेलों को मलाल है।
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