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कोरोना के चलते गांव-गांव में थम गईं आल्हा गायन की चौपालें
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महोबा। सावन माह में गांव-गांव में सजने वाली आल्हा गायन की चौपालें इस बार कोरोना महामारी के चलते थम गईं हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में शाम होते ही रिमझिम बारिश के बीच आल्हा गायन की गाथाएं सुनाई देतीं थीं, लेकिन कोरोना के चलते आल्हा गायन की तान भी गुम हो गई है।
बुुंदेलखंड में आल्हा-ऊदल की याद में हर साल भादौ मास में कजली मेले का आयोजन होता था। ऐतिहासिक कजली मेला को देखने के लिए गांव में हर घर में मेहमानों की आवाजाही शुरू हो जाती थी। इससे गांवों में कई दिन तक खासी चहल-पहल रहती थी। चौपालों पर होने वाले आल्हा गायन के कार्यक्रम में लोग आल्हा-ऊदल की वीरता का बखान सुनकर लुत्फ उठाते थे।
इस साल कोरोना संक्रमण को देखते हुए ग्रामीणांचलों में भी आल्हा गायन की चौपालें नहीं सज रहीं हैं और न ही बड़े लड़इयै महुबे वाले जिनसे हार गई तलवार, एक को मारे द्वि मर जावै तीसरा खौफ खाए मर जाए जैसी आल्हा गायकी की गूंज भी नहीं सुनाई दे रही है। रिमझिम बारिश तो हो रही है, लेेकिन सावन की फुहारों के बीच होने वाला आल्हा गायन नहीं सुनाई दे रहा है।
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बुुंदेलखंड में आल्हा-ऊदल की याद में हर साल भादौ मास में कजली मेले का आयोजन होता था। ऐतिहासिक कजली मेला को देखने के लिए गांव में हर घर में मेहमानों की आवाजाही शुरू हो जाती थी। इससे गांवों में कई दिन तक खासी चहल-पहल रहती थी। चौपालों पर होने वाले आल्हा गायन के कार्यक्रम में लोग आल्हा-ऊदल की वीरता का बखान सुनकर लुत्फ उठाते थे।
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इस साल कोरोना संक्रमण को देखते हुए ग्रामीणांचलों में भी आल्हा गायन की चौपालें नहीं सज रहीं हैं और न ही बड़े लड़इयै महुबे वाले जिनसे हार गई तलवार, एक को मारे द्वि मर जावै तीसरा खौफ खाए मर जाए जैसी आल्हा गायकी की गूंज भी नहीं सुनाई दे रही है। रिमझिम बारिश तो हो रही है, लेेकिन सावन की फुहारों के बीच होने वाला आल्हा गायन नहीं सुनाई दे रहा है।
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