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Maharajganj News: रूहानी ऊर्जा को कमजोर करता है सोशल मीडिया पर अनावश्यक समय बिताना
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डिजिटल दौर में इंसान की जिंदगी की रफ्तार हो गई तेज
रमजान में इबादत का हिस्सा बन सकती है डिजिटल ईमानदारी
सिसवा बाजार। डिजिटल दौर में इंसान की जिंदगी की रफ्तार तेज हो गई है। मोबाइल, सोशल मीडिया और इंटरनेट ने एक ओर दुनिया में दूर-दूर तक बिखरे लोगों को पास लिया दिया है तो दूसरी ओर इंसान को अपने ही भीतर से दूर भी कर दिया है। ऐसे समय में रमजान का महीना हमें रुककर सोचने, अपने आप से जुड़ने और आध्यात्मिक शुद्धि की ओर लौटने का अवसर देता है। लेकिन सवाल यह है कि डिजिटल दौर में हम रमजान की पवित्रता को कैसे बरकरार रखें?
कस्बे के बीजापार स्थित सैयदा नूरी गर्ल्स कॉलेज के मौलाना कमरुज्जमा चतुर्वेदी ने बताया कि रमजान केवल भूखा-प्यासा रहने का नाम नहीं है बल्कि यह आत्मसंयम और आत्मनियंत्रण की संपूर्ण साधना है। आज के समय में रोजा केवल खाने-पीने से परहेज करने तक सीमित नहीं रह गया है बल्कि आंखों, कानों और दिल का रोजा रखना भी उतना ही जरूरी हो गया है।
सोशल मीडिया पर अनावश्यक वीडियो देखना, बेवजह की बहसों में उलझना या समय को व्यर्थ स्क्रॉलिंग में गंवाना, यह सब हमारी रूहानी ऊर्जा को कमजोर करता है। डिजिटल प्लेटफॉर्म का सही इस्तेमाल रमजान में नेमत बन सकता है। आज कुरआन की तिलावत, दीन की बातें, इस्लामी लेक्चर और तरावीह की लाइव स्ट्रीमिंग आसानी से उपलब्ध है। यदि इंसान अपने मोबाइल को फिजूल मनोरंजन की जगह इबादत और इल्म हासिल करने का जरिया बना ले तो यही तकनीक उसके लिए सवाब का कारण बन सकती है।
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जरूरत इस बात की है कि हम अपने डिजिटल समय को नियंत्रित करें और इसकी एक सीमा निर्धारित करें। रमजान हमें सब्र और अनुशासन सिखाता है। इसी अनुशासन को डिजिटल जीवन में भी लागू करने की आवश्यकता है। इस्लाम भी सच्चाई और जिम्मेदारी की शिक्षा देता है, इसलिए डिजिटल ईमानदारी भी इबादत का हिस्सा बन सकती है। दिनभर सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने की बजाय, कुछ समय तिलावत, दुआ और आत्ममंथन के लिए निर्धारित करना चाहिए।
इफ्तार के समय तस्वीरें और स्टेटस अपडेट करने से पहले यह सोचना चाहिए कि असली मकसद दिखावा नहीं, बल्कि शुक्रगुज़ारी है। परिवार के साथ बैठकर इफ्तार करना, एक-दूसरे से दिल की बातें करना और सामूहिक इबादत करना, यह रमजान की खूबसूरती है। डिजिटल व्यस्तता कहीं ऐसा न हो कि परिवार एक ही कमरे में बैठा हो, लेकिन सबकी निगाहें मोबाइल स्क्रीन पर हों। रमजान हमें रिश्तों को मजबूत करने का भी संदेश देता है। इसलिए इस महीने में डिजिटल दूरी और मानवीय नजदीकी बढ़ाना बेहद अहम है। डिजिटल दौर में अफवाहों और गलत सूचनाओं का प्रसार, एक और चुनौती है।
रमजान के दौरान कई बार धार्मिक भावनाओं से जुड़ी अपुष्ट खबरें तेजी से फैलती हैं। ऐसे में हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है कि बिना सत्यापन के किसी भी संदेश को आगे न बढ़ाए।
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रमजान में इबादत का हिस्सा बन सकती है डिजिटल ईमानदारी
सिसवा बाजार। डिजिटल दौर में इंसान की जिंदगी की रफ्तार तेज हो गई है। मोबाइल, सोशल मीडिया और इंटरनेट ने एक ओर दुनिया में दूर-दूर तक बिखरे लोगों को पास लिया दिया है तो दूसरी ओर इंसान को अपने ही भीतर से दूर भी कर दिया है। ऐसे समय में रमजान का महीना हमें रुककर सोचने, अपने आप से जुड़ने और आध्यात्मिक शुद्धि की ओर लौटने का अवसर देता है। लेकिन सवाल यह है कि डिजिटल दौर में हम रमजान की पवित्रता को कैसे बरकरार रखें?
कस्बे के बीजापार स्थित सैयदा नूरी गर्ल्स कॉलेज के मौलाना कमरुज्जमा चतुर्वेदी ने बताया कि रमजान केवल भूखा-प्यासा रहने का नाम नहीं है बल्कि यह आत्मसंयम और आत्मनियंत्रण की संपूर्ण साधना है। आज के समय में रोजा केवल खाने-पीने से परहेज करने तक सीमित नहीं रह गया है बल्कि आंखों, कानों और दिल का रोजा रखना भी उतना ही जरूरी हो गया है।
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सोशल मीडिया पर अनावश्यक वीडियो देखना, बेवजह की बहसों में उलझना या समय को व्यर्थ स्क्रॉलिंग में गंवाना, यह सब हमारी रूहानी ऊर्जा को कमजोर करता है। डिजिटल प्लेटफॉर्म का सही इस्तेमाल रमजान में नेमत बन सकता है। आज कुरआन की तिलावत, दीन की बातें, इस्लामी लेक्चर और तरावीह की लाइव स्ट्रीमिंग आसानी से उपलब्ध है। यदि इंसान अपने मोबाइल को फिजूल मनोरंजन की जगह इबादत और इल्म हासिल करने का जरिया बना ले तो यही तकनीक उसके लिए सवाब का कारण बन सकती है।
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जरूरत इस बात की है कि हम अपने डिजिटल समय को नियंत्रित करें और इसकी एक सीमा निर्धारित करें। रमजान हमें सब्र और अनुशासन सिखाता है। इसी अनुशासन को डिजिटल जीवन में भी लागू करने की आवश्यकता है। इस्लाम भी सच्चाई और जिम्मेदारी की शिक्षा देता है, इसलिए डिजिटल ईमानदारी भी इबादत का हिस्सा बन सकती है। दिनभर सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने की बजाय, कुछ समय तिलावत, दुआ और आत्ममंथन के लिए निर्धारित करना चाहिए।
इफ्तार के समय तस्वीरें और स्टेटस अपडेट करने से पहले यह सोचना चाहिए कि असली मकसद दिखावा नहीं, बल्कि शुक्रगुज़ारी है। परिवार के साथ बैठकर इफ्तार करना, एक-दूसरे से दिल की बातें करना और सामूहिक इबादत करना, यह रमजान की खूबसूरती है। डिजिटल व्यस्तता कहीं ऐसा न हो कि परिवार एक ही कमरे में बैठा हो, लेकिन सबकी निगाहें मोबाइल स्क्रीन पर हों। रमजान हमें रिश्तों को मजबूत करने का भी संदेश देता है। इसलिए इस महीने में डिजिटल दूरी और मानवीय नजदीकी बढ़ाना बेहद अहम है। डिजिटल दौर में अफवाहों और गलत सूचनाओं का प्रसार, एक और चुनौती है।
रमजान के दौरान कई बार धार्मिक भावनाओं से जुड़ी अपुष्ट खबरें तेजी से फैलती हैं। ऐसे में हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है कि बिना सत्यापन के किसी भी संदेश को आगे न बढ़ाए।