{"_id":"65ae82d36ab94197b3044de4","slug":"shri-ram-janaki-temple-of-siswa-was-the-center-point-of-shri-ram-janmabhoomi-movement-maharajganj-news-c-206-1-sgkp1021-14385-2024-01-22","type":"story","status":"publish","title_hn":"Maharajganj News: श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन का केंद्र बिंदु रहा सिसवा का श्रीराम जानकी मंदिर","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Maharajganj News: श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन का केंद्र बिंदु रहा सिसवा का श्रीराम जानकी मंदिर
Mon, 22 Jan 2024 08:29 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, महाराजगंज
संवाद न्यूज एजेंसी, महाराजगंज
Updated Mon, 22 Jan 2024 08:29 PM IST
विज्ञापन
सिसवा बाजार। स्थानीय प्राचीन श्रीराम जानकी मंदिर रामजन्म भूमि आंदोलन का केंद्र बिंदु था। यहां से कारसेवकों को आंदोलन में भाग लेने के लिए दिशा-निर्देश दिए जाते थे। साथ ही जरूरी सुविधाएं भी मुहैया कराई जाती थीं।
मंदिर के पूर्व अध्यक्ष रविंद्र नाथ पांडेय ने बताया कि सिसवा के श्रीराम जानकी मंदिर का स्थापना ब्रिटिश कॉल के दौरान हुई थी। इस प्राचीन मंदिर की क्षेत्र में प्रसिद्धि को देखते हुए श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन में भाग लेने वाले भक्त व कारसेवकों के लिए ये मंदिर केंद्र बिंदु रहा। मंदिर के तत्कालीन अध्यक्ष सीताराम भूत रामभक्तों के घर जाकर आंदोलन में प्रतिभाग करने के लिए ऊर्जा भरते थे। 1992 में जब आंदोलन अपने सबसे ऊंचे दौर में था, तब सीताराम ने स्वयं भी भेष बदलकर और गुब्बारा बेचते हुए अयोध्या पहुंचे थे और विवादित ढांचा गिराए जाने के साक्षी बने थे।
मंदिर के पूर्व महामंत्री उमाशंकर सोनी ने बताया कि तब मंदिर से कारसेवकों को दिशा निर्देश दिया जाता था और उनको जिस भी सहयोग की जरूरत होती थी वो पूरा किया जाता था। इसको लेकर प्रशासन हर समय मंदिर पर अपनी नजर बना के रखती थी जिसके वजह से मंदिर समिति के पदाधिकारियों को भूमिगत होना पड़ता था, लेकिन आज मंदिर प्राण प्रतिष्ठा देख एक स्वप्न के पूरा होने जैसा लग रहा है। महान कार्य के पूरा होने पर गर्व की अनुभूति हो रही है।
विज्ञापन
विज्ञापन
मंदिर के पूर्व अध्यक्ष रविंद्र नाथ पांडेय ने बताया कि सिसवा के श्रीराम जानकी मंदिर का स्थापना ब्रिटिश कॉल के दौरान हुई थी। इस प्राचीन मंदिर की क्षेत्र में प्रसिद्धि को देखते हुए श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन में भाग लेने वाले भक्त व कारसेवकों के लिए ये मंदिर केंद्र बिंदु रहा। मंदिर के तत्कालीन अध्यक्ष सीताराम भूत रामभक्तों के घर जाकर आंदोलन में प्रतिभाग करने के लिए ऊर्जा भरते थे। 1992 में जब आंदोलन अपने सबसे ऊंचे दौर में था, तब सीताराम ने स्वयं भी भेष बदलकर और गुब्बारा बेचते हुए अयोध्या पहुंचे थे और विवादित ढांचा गिराए जाने के साक्षी बने थे।
विज्ञापन
मंदिर के पूर्व महामंत्री उमाशंकर सोनी ने बताया कि तब मंदिर से कारसेवकों को दिशा निर्देश दिया जाता था और उनको जिस भी सहयोग की जरूरत होती थी वो पूरा किया जाता था। इसको लेकर प्रशासन हर समय मंदिर पर अपनी नजर बना के रखती थी जिसके वजह से मंदिर समिति के पदाधिकारियों को भूमिगत होना पड़ता था, लेकिन आज मंदिर प्राण प्रतिष्ठा देख एक स्वप्न के पूरा होने जैसा लग रहा है। महान कार्य के पूरा होने पर गर्व की अनुभूति हो रही है।
विज्ञापन