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जिला अस्पताल में मनोरोगियों की व्यथा सुनने वाला कोई नहीं
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जिला अस्पताल में मनोरोगियों की व्यथा सुनने वाला कोई नहीं
मनोरोग विशेषज्ञ की तैनाती नहीं होने से इलाज में परेशानी, इलाज कराने जाना पड़ता गोरखपुर
संवाद न्यूज एजेंसी
महराजगंज। जिले में मनोरोगियों के इलाज के बेहतर इंतजाम नहीं है। जिला अस्पताल में पद स्वीकृत होने के बावजूद मनोरोग विशेषज्ञ की तैनाती नहीं है। इससे मनोरोगियों को इलाज कराने गोरखपुर जाना पड़ता है। दो साल पहले जिला अस्पताल में मनोरोग विशेषज्ञ की तैनाती हुई थी, लेकिन उनके स्थानांतरण के बाद से पद खाली है। ऐसे में जिला अस्पताल में मनोरोगियों के मन की व्यथा सुनने वाला कोई नहीं है।
मानसिक समस्या जैसे नशाखोरी, अवसाद, एनसीडी रोग से बचाव के लिए मनोरोग विशेषज्ञ के मार्गदर्शन में परामर्श के लिए जिला अस्पताल में मनकक्ष की स्थापना की गई। यह कक्ष कहां है किसी को पता नहीं है। जिला अस्पताल में औसतन 700 से अधिक रोगी प्रतिदिन इलाज कराने आते हैं। इनमें से मनोरोग के 30 से 40 मरीज होते ही हैं। मनोचिकित्सक नहीं होने के कारण मरीजों को निजी अस्पताल में महंगा इलाज कराना पड़ता है। शुक्रवार को ओपीडी में मनोरोग के कुछ मरीज आए थे और फिजिशियन से सलाह लेकर चले गए।
जिला अस्पताल के फिजिशियन डॉ. एवी त्रिपाठी कहते हैं कि अगर कोई मरीज आए और एक साथ तमाम बीमारियों को बताने लगे तो पता चल जाता है की वह मनोरोगी है। इसके बाद उसका इलाज सावधानी पूर्वक करना पड़ता है। बार-बार दवा खाने के बाद मर्ज ठीक नहीं होना मनोरोग की पहचान है। अक्सर ऐसे मरीज ओपीडी में आते हैं। उनकी काउंसिलिंग कर जरूरी सलाह के साथ दवाएं दी जाती हैं।
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मनोरोग के प्रमुख लक्षण
याददाश्त कमजोर हो जाती है। खाना-पीना भूलने लगते हैं। परिवार और रिश्तेदारों को पहचान नहीं पाते हैं। किसी भी चीज का नाम याद नहीं रहता। रास्ते भूल जाना, हर वक्त चिड़चिड़ापन महसूस करना, निर्णय न ले पाना, बोलने में दिक्कत आना आदि शामिल हैं।
...
मोबाइल फोन का अत्यधिक प्रयोग युवाओं को मनोरोगी बना रहा है। इससे आंखों की नमी कम होने लगती है। ईयरफोन के प्रयोग से बहरेपन की समस्या आ रही है। मोबाइल फोन के ज्यादा इस्तेमाल से मानसिक तौर पर विकलांगता भी हो रही है।
- डॉ. मेघा विश्वनाथ, मनोरोग विशेषज्ञ, केएमसी डिजिटल अस्पताल
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जिला अस्पताल में मनोरोग विशेषज्ञ नहीं हैं। इसके लिए शासन को पत्र भेजा जा चुका है। ओपीडी में आने वाले मरीजों की काउंसिलिंग कर बेहतर ढंग से इलाज का प्रयास किया जाता है।
- डॉ. एएम भाष्कर, सीएमएस
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मनोरोग विशेषज्ञ की तैनाती नहीं होने से इलाज में परेशानी, इलाज कराने जाना पड़ता गोरखपुर
संवाद न्यूज एजेंसी
महराजगंज। जिले में मनोरोगियों के इलाज के बेहतर इंतजाम नहीं है। जिला अस्पताल में पद स्वीकृत होने के बावजूद मनोरोग विशेषज्ञ की तैनाती नहीं है। इससे मनोरोगियों को इलाज कराने गोरखपुर जाना पड़ता है। दो साल पहले जिला अस्पताल में मनोरोग विशेषज्ञ की तैनाती हुई थी, लेकिन उनके स्थानांतरण के बाद से पद खाली है। ऐसे में जिला अस्पताल में मनोरोगियों के मन की व्यथा सुनने वाला कोई नहीं है।
मानसिक समस्या जैसे नशाखोरी, अवसाद, एनसीडी रोग से बचाव के लिए मनोरोग विशेषज्ञ के मार्गदर्शन में परामर्श के लिए जिला अस्पताल में मनकक्ष की स्थापना की गई। यह कक्ष कहां है किसी को पता नहीं है। जिला अस्पताल में औसतन 700 से अधिक रोगी प्रतिदिन इलाज कराने आते हैं। इनमें से मनोरोग के 30 से 40 मरीज होते ही हैं। मनोचिकित्सक नहीं होने के कारण मरीजों को निजी अस्पताल में महंगा इलाज कराना पड़ता है। शुक्रवार को ओपीडी में मनोरोग के कुछ मरीज आए थे और फिजिशियन से सलाह लेकर चले गए।
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जिला अस्पताल के फिजिशियन डॉ. एवी त्रिपाठी कहते हैं कि अगर कोई मरीज आए और एक साथ तमाम बीमारियों को बताने लगे तो पता चल जाता है की वह मनोरोगी है। इसके बाद उसका इलाज सावधानी पूर्वक करना पड़ता है। बार-बार दवा खाने के बाद मर्ज ठीक नहीं होना मनोरोग की पहचान है। अक्सर ऐसे मरीज ओपीडी में आते हैं। उनकी काउंसिलिंग कर जरूरी सलाह के साथ दवाएं दी जाती हैं।
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मनोरोग के प्रमुख लक्षण
याददाश्त कमजोर हो जाती है। खाना-पीना भूलने लगते हैं। परिवार और रिश्तेदारों को पहचान नहीं पाते हैं। किसी भी चीज का नाम याद नहीं रहता। रास्ते भूल जाना, हर वक्त चिड़चिड़ापन महसूस करना, निर्णय न ले पाना, बोलने में दिक्कत आना आदि शामिल हैं।
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मोबाइल फोन का अत्यधिक प्रयोग युवाओं को मनोरोगी बना रहा है। इससे आंखों की नमी कम होने लगती है। ईयरफोन के प्रयोग से बहरेपन की समस्या आ रही है। मोबाइल फोन के ज्यादा इस्तेमाल से मानसिक तौर पर विकलांगता भी हो रही है।
- डॉ. मेघा विश्वनाथ, मनोरोग विशेषज्ञ, केएमसी डिजिटल अस्पताल
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जिला अस्पताल में मनोरोग विशेषज्ञ नहीं हैं। इसके लिए शासन को पत्र भेजा जा चुका है। ओपीडी में आने वाले मरीजों की काउंसिलिंग कर बेहतर ढंग से इलाज का प्रयास किया जाता है।
- डॉ. एएम भाष्कर, सीएमएस