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Maharajganj News: निजी अस्पताल बढ़ा रहे मरीजों का दर्द...तीमारदार हो रहे कंगाल

Tue, 20 May 2025 12:36 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, महाराजगंज
संवाद न्यूज एजेंसी, महाराजगंज Updated Tue, 20 May 2025 12:36 AM IST
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Private hospitals are increasing the pain of patients...attendants are becoming poor
महराजगंज। निजी अस्पतालों में मरीजों को आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता है। इलाज ऐसा होता है कि, बीमारी ठीक होने के बजाय और बढ़ जाती है। इसमें मोटी रकम खर्च करने के बाद तीमारदार कंगाल हो जाते हैं।
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वहीं दूसरी ओर इन अस्पतालों में नियम कानून का सख्ती से पालन कराने के दावों की पोल खुल जाती है। ज्यादातर अस्पतालों में पंजीकृत डॉक्टर के स्थान पर दूसरे इलाज करते हैं, जिनके पास डिग्री नहीं अनुभव होता है। मरीज, तीमारदार इस खेल को समझ नहीं पाते हैं।
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दिसंबर वर्ष 2024 की बात करें तो श्यामदेउरवा क्षेत्र के महदेवा चौराहे पर स्थित एक निजी अस्पताल में बुद्धि रामपुर की उजाला की प्रसव के दौरान मौत हो गई थी। प्रसव पीड़िता को परिजन महदेवा चौराहे पर एक अस्पताल में भर्ती कराए थे। जहां ऑपरेशन के बाद रक्तस्राव होने लगा। हालत बिगड़ने पर अस्पताल संचालक ने खून चढ़ाने और परिजनों से 24 हजार रुपये जमा कराने के लिए कहा था।
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कुछ देर बाद संचालक ने उजाला की स्थिति गंभीर बताते हुए कहा कि उसे गोरखपुर मेडिकल कॉलेज ले जाना पड़ेगा और खुद पीछे से आने की बात कहकर जिम्मेदारी परिजनों पर डाल दी। परिजन किसी तरह महिला को मेडिकल कॉलेज गोरखपुर लेकर पहुंचे, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया था। बताया जाता है कि अस्पताल पंजीकृत भी नहीं था।
इसी तरह से मामले सामने आते रहते हैं। बीते दिनों ठूठीबारी की सलेहा ने निजी अस्पताल में ऑपरेशन कराया था। उसकी बीमारी ठीक होने के बजाए बढ़ गई। ऑपरेशन के दौरान लिवर में चोट लगने की बात कही जा रही है।
उसने इलाज में तीन लाख रुपये खर्च कर दिए और चार लाख रुपये की जरूरत है। पति रईस रकम का इंतजार करने में परेशान हैं। अब पास में कुछ बचा भी नहीं है। उन्होंने बताया कि समय से ऑपरेशन नहीं कराया तो समस्या बढ़ जाएगी।
सूत्रों की माने तो अस्पतालों की जांच होती है। नियम के अनुसार कार्रवाई भी होती है, लेकिन प्रभावी कार्रवाई इस वजह से नहीं हो पाती है कि अस्पताल संचालक रकम देकर मामले को रफादफा करा लेते हैं।

विभाग की ओर से पंजीकरण आदि देखकर दायित्व की इतिश्री कर दी जाती है। उधर, जांच के दौरान नामित डॉक्टर भी नहीं मिलते हैं। इसपर नोटिस देकर जवाब ले लिया जाता है। इसके बाद व्यवस्था में सुधार नहीं होता है। जिन डॉक्टरों के नाम अस्पताल संचालित होते हैं, उनको मौके पर कोई देखता ही नहीं है। उनकी जगह पर अनुभव वाले कर्मी इलाज करते हैं। यही वजह है कि बीमारी बढ़ती है।
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