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Maharajganj News: मिट्टी-तापमान की अनुकूलता के बाद भी घटा आलू का रकबा
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महराजगंज। मौजूदा समय में आलू का भाव जिले में 35 रुपये प्रति किलो है। यह बाहरी जिलों से पहुंचने के कारण महंगा बताया जा रहा है। पांच वर्ष पहले इसी मौसम में आलू 10 से 15 रुपये प्रति किलो तक बिकता था। क्योंकि तब जिले के किसान इसके उत्पादन से जुड़े हुए थे और गन्ने की तरह नकदी फसल के रूप में इसकी उपज प्राप्त करते थे।
जब जिले के बड़े क्षेत्रफल में आलू का उत्पादन होता था, उस समय पूरे साल करीब 10 रुपये किलो तक आलू फुटकर में उपलब्ध रहता था।
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, जनपद की मिट्टी और जलवायु दोनों आलू की खेती के लिए मुफीद है। आलू के बेहतर उत्पादन के लिए हल्की बलुई दोमट मिट्टी उपयुक्त मानी जाती है। नदियों से अभिसिंचित भूमि की उपलब्धता के चलते जिले के लगभग हर ब्लॉक क्षेत्र की मिट्टी आलू उत्पादन के लिए बेहतर है जिसका पावर आफ हाइड्रोजन (पीएच) मान 6.5 से लेकर 7 तक बना रहता है।
बावजूद इसके जनपद के किसान आलू उत्पादन से दूर होते चले गए। कभी सात से आठ हजार हेक्टेयर आलू का रकबा सिमटकर 2800 रह गया है। पांच वर्ष पहले तक जिले में आलू उत्पादन 14 से 15 लाख क्विंटल के आसपास था। कोल्ड स्टोरेज की उपलब्धता के चलते किसानों को भंडारण की सुविधा उपलब्ध थी। मगर, पैदावार के बाद उचित मूल्य न मिलने, अधिक मेहनत और जंगली जानवरों के कारण किसानों का आलू उत्पादन से मोह भंग हो गया।
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मौजूदा समय में आलू के रकबे की बात करें तो 2700-2800 हेक्टेयर के आसपास है। उद्यान विभाग की मानें तो मेहनत अधिक होने के कारण किसान आलू की जगह अन्य मौसमी सब्जी जैसे फूल गोभी, पत्तागोभी, शिमला मिर्च आदि खेती पर अधिक ध्यान दे रहे हैं।
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बाजार भाव बना सबसे बड़ा कारण
आलू की खेती न करने पर किसानों से वार्ता कर जब कुरेदा गया तो उनकी पीड़ा जुबां पर आ गई। ग्राम पंचायत पोखरभिंडा के पूर्व प्रधान अनिरुद्ध चौधरी, सिंहपुर अयोध्या के विनय कुमार बताते हैं कि पहले आलू की खेती वह लोग अधिक करते थे और यह नकदी फसल थी। मगर, बेहतर बाजार की सुविधा उपलब्ध नहीं हो सकी। जब आलू की फसल तैयार होती थी तब बाजार भाव नीचे हो जाता। हम लोग मुनाफे के लिए इसे कोल्ड स्टोरेज में रखा कराते थे। निकासी के समय बाजार में बाहर से नया आलू आ जाता था और हमें औने-पौने दाम पर बिक्री कर घाटे का सौदा करते थे। लगातार इन्ही परिस्थितियों से घिर कर हमने इसका उत्पादन बंद कर अन्य मौसमी सब्जियों पर ध्यान देना शुरू कर दिया।
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बिचौलियों के कारण किसानों को नहीं मिलता था लाभ
भारतीय किसान यूनियन के जिलाध्यक्ष रामअशीष कहते हैं कि पांच साल पहले तक हर ब्लॉक में आलू का अच्छा खासा रकबा था। एक जनवरी तक खोदाई कर फसल बाजार में लाई जाती थी। उस समय बिचौलियों के कारण लाभ किसानों को नहीं मिलता था और उनकी जमा पूंजी भी नहीं निकलती थी। जंगली जानवरों से फसल बचाने में भी खतरा था। इन तमाम परेशानियों को देख किसान आलू की जगह मिर्ची, गोभी, बैंगन, पालक इत्यादि की खेती इस मौसम में नकदी फसल के रूप में करते हैं।
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कोट
जिले की मिट्टी व तापमान दोनों आलू उत्पादन के लिए बेहतर हैं। किसान उद्यान विभाग से संपर्क कर उन्नतिशील बीज भी पा सकते हैं। आलू भंडारण के लिए फरेंदा, पनियरा व परतावल में कोल्ड स्टोरेज 34 हजार एमटी क्षमता का है। पहले यह सीजन में फुल हो जाते थे। मगर, जनपद के किसान अब सिर्फ खाने के लिए ही आलू उगाते हैं। उत्पादन रकबा निरंतर घट रहा है।
-संजय कुमार रस्तोगी, जिला उद्यान अधिकारी, महराजगंज
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जब जिले के बड़े क्षेत्रफल में आलू का उत्पादन होता था, उस समय पूरे साल करीब 10 रुपये किलो तक आलू फुटकर में उपलब्ध रहता था।
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, जनपद की मिट्टी और जलवायु दोनों आलू की खेती के लिए मुफीद है। आलू के बेहतर उत्पादन के लिए हल्की बलुई दोमट मिट्टी उपयुक्त मानी जाती है। नदियों से अभिसिंचित भूमि की उपलब्धता के चलते जिले के लगभग हर ब्लॉक क्षेत्र की मिट्टी आलू उत्पादन के लिए बेहतर है जिसका पावर आफ हाइड्रोजन (पीएच) मान 6.5 से लेकर 7 तक बना रहता है।
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बावजूद इसके जनपद के किसान आलू उत्पादन से दूर होते चले गए। कभी सात से आठ हजार हेक्टेयर आलू का रकबा सिमटकर 2800 रह गया है। पांच वर्ष पहले तक जिले में आलू उत्पादन 14 से 15 लाख क्विंटल के आसपास था। कोल्ड स्टोरेज की उपलब्धता के चलते किसानों को भंडारण की सुविधा उपलब्ध थी। मगर, पैदावार के बाद उचित मूल्य न मिलने, अधिक मेहनत और जंगली जानवरों के कारण किसानों का आलू उत्पादन से मोह भंग हो गया।
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मौजूदा समय में आलू के रकबे की बात करें तो 2700-2800 हेक्टेयर के आसपास है। उद्यान विभाग की मानें तो मेहनत अधिक होने के कारण किसान आलू की जगह अन्य मौसमी सब्जी जैसे फूल गोभी, पत्तागोभी, शिमला मिर्च आदि खेती पर अधिक ध्यान दे रहे हैं।
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बाजार भाव बना सबसे बड़ा कारण
आलू की खेती न करने पर किसानों से वार्ता कर जब कुरेदा गया तो उनकी पीड़ा जुबां पर आ गई। ग्राम पंचायत पोखरभिंडा के पूर्व प्रधान अनिरुद्ध चौधरी, सिंहपुर अयोध्या के विनय कुमार बताते हैं कि पहले आलू की खेती वह लोग अधिक करते थे और यह नकदी फसल थी। मगर, बेहतर बाजार की सुविधा उपलब्ध नहीं हो सकी। जब आलू की फसल तैयार होती थी तब बाजार भाव नीचे हो जाता। हम लोग मुनाफे के लिए इसे कोल्ड स्टोरेज में रखा कराते थे। निकासी के समय बाजार में बाहर से नया आलू आ जाता था और हमें औने-पौने दाम पर बिक्री कर घाटे का सौदा करते थे। लगातार इन्ही परिस्थितियों से घिर कर हमने इसका उत्पादन बंद कर अन्य मौसमी सब्जियों पर ध्यान देना शुरू कर दिया।
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बिचौलियों के कारण किसानों को नहीं मिलता था लाभ
भारतीय किसान यूनियन के जिलाध्यक्ष रामअशीष कहते हैं कि पांच साल पहले तक हर ब्लॉक में आलू का अच्छा खासा रकबा था। एक जनवरी तक खोदाई कर फसल बाजार में लाई जाती थी। उस समय बिचौलियों के कारण लाभ किसानों को नहीं मिलता था और उनकी जमा पूंजी भी नहीं निकलती थी। जंगली जानवरों से फसल बचाने में भी खतरा था। इन तमाम परेशानियों को देख किसान आलू की जगह मिर्ची, गोभी, बैंगन, पालक इत्यादि की खेती इस मौसम में नकदी फसल के रूप में करते हैं।
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कोट
जिले की मिट्टी व तापमान दोनों आलू उत्पादन के लिए बेहतर हैं। किसान उद्यान विभाग से संपर्क कर उन्नतिशील बीज भी पा सकते हैं। आलू भंडारण के लिए फरेंदा, पनियरा व परतावल में कोल्ड स्टोरेज 34 हजार एमटी क्षमता का है। पहले यह सीजन में फुल हो जाते थे। मगर, जनपद के किसान अब सिर्फ खाने के लिए ही आलू उगाते हैं। उत्पादन रकबा निरंतर घट रहा है।
-संजय कुमार रस्तोगी, जिला उद्यान अधिकारी, महराजगंज