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Maharajganj News: भंडारण के इंतजाम नहीं, आलू से किसानों का मोहभंग

Sun, 08 Dec 2024 02:09 AM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Sun, 08 Dec 2024 02:09 AM IST
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No storage arrangements, farmers disillusioned with potatoes
निचलौल क्षेत्र के खोनहौली में आलू की खेती को देखते किसान भरत।
महराजगंज। जिले में आलू का रकबा बेहद कम हो गया है। उत्पादन के सापेक्ष खपत अधिक है। स्थानीय आलू की फसल समय पर तैयार नहीं हो पाती है। जबकि बाहरी आलू से बाजार पट जाता है। ऐसे में स्थानीय आलू जब बाजार में आते हैं तो उसका उचित दाम नहीं मिल पाता है। भंडारण की पर्याप्त व्यवस्था न होने से किसान औने-पौने दाम पर आलू बेचने पर मजबूर हो जाते हैँ। यही वजह है कि किसानों का आलू उत्पादन से मोह भंग होता जा रहा है।
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गुजरे वक्त में जिले के किसान आलू की खूब खेती करते थे। मगर, लागत और मुनाफे के अंतर से इसका रकबा लगातार कम होता जा रहा है। दिसंबर में स्थानीय आलू की फसल तैयार नहीं होती है। ऐसे में बाहरी आलू बाजार पर कब्जा कर लेते हैं। वर्तमान में आलू का भाव 36 से 38 रुपये प्रति किलो है।
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यही रेट यदि जनवरी-फरवरी में मिले तो स्थानीय किसान मालामाल हो जाएंगे। मगर, आलू की अधिक उपलब्धता की वजह से किसानों को औने-पौने दाम पर बिक्री करनी पड़ती है।
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महराजगंज शहर काफी दूर निचलौल रोड पर खेतों में बहुत कम आलू की खेती होते दिखी। खोन्हौली गांव के किसान भरत अपने खेत में आलू की फसल से खरपतवार हटा रहे थे। बातचीत में उनका दर्द सामने आ गया। उन्होंने बताया कि किसान कहीं का नहीं रह गया है। खेती में लागत बढ़ गई है। कोई फायदा नहीं हो रहा है। आलू की बुवाई बस इतनी हो रही है कि घर का काम चल जाए। बिक्री से कोई फायदा नहीं हो रहा है।
उन्होंने कहा कि स्थानीय स्तर पर आलू भंडारण की सुविधा नहीं है। कोल्ड स्टोर तक आलू पहुंचाने पर रकम खर्च होती है। इसके पहले खेती में इतनी रकम खर्च हो जाती है की फसल होने पर बेचकर जरूरतों को पूरा करना पड़ता है। स्टोर करने से अच्छा है जो भाव मिले, उसी में बेच दो। उन्होंने बताया कि पांच वर्ष पहले एक एकड़ भूमि में आलू की खेती की थी। अब 10 डिस्मिल में आलू बो रखा है।
मधुबनी नहर पुल स्थित चाय की दुकान पर मिले किसान ज्ञानेश कुमार ने बताया कि तहसील क्षेत्र में कोल्ड स्टोर न होने से किसान सस्ते कीमत पर आलू बेचने पर मजबूर हैं। इन्होंने बताया कि एक बीघा आलू बोने के लिए तीन क्विंटल बीज, 35 किलोग्राम डीएपी, इतनी ही यूरिया, सिंचाई व रोगों से बचाव के लिए कीटनाशक दवाओं का छिड़काव आदि खर्च के बाद तैयार आलू जब बाजार में पहुंचता है तो व्यापारी उसे औने-पौने दामों पर लेते हैं। ऐसे में किसानों को दोहरी मार झेलनी पड़ रही है।

मिश्रवलिया के इजहार अली ने कहा कि स्थानीय आलू का भाव नहीं मिलेगा तो खेती कौन करेगा। मदनपुर गांव के शंकर भी समस्याओं का हवाला देते हुए कहने लगे की एक एकड़ आलू की खेती में करीब 70 से 80 हजार रुपये लागत आती है। उत्पादन ठीक नहीं हुआ तो लागत भी नहीं निकल पाती है। ऐसे में घाटे की खेती कौन करेगा।
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