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विधायक बोलेः नक्शे में बदलाव मैदानी क्षेत्रों में दरार का कारण बना

Wed, 17 Jun 2020 10:36 PM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Wed, 17 Jun 2020 10:36 PM IST
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map change cause cracks in the plains
विधायक बोले : नक्शे में बदलाव मैदानी क्षेत्रों में दरार का कारण बना
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संवाद न्यूज एजेंसी
महराजगंज। मधेशी समुदाय के जनप्रतिनिधियों की नेपाल की संसद में सहभागिता होने के बाद भी यह समुदाय नेपाल में उपेक्षित है। राजशाही समाप्त होने के बाद अपनी मांगों को लेकर वे सड़क पर उतर चुके हैं। कुछ जनप्रतिनिधियों ने कहा कि नेपाल में भारत के खिलाफ मुहिम चला कर चुनाव जीतना अब यहां की परम्परा बन चुकी है, जिसको लेकर नेपाल के कुछ विधायकों और जनप्रतिनिधियों ने नेपाल द्वारा जारी नए नक्शे पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा है कि नेपाल का यह नक्शा दोनों देशों के रिश्तों की डोर को कमजोर कर रहा है।
भैरहवां के विधायक संतोष पांडेय व राष्ट्रीय जनता समाजवादी पार्टी रूपनदेही के अध्यक्ष अजय वर्मा ने कहा कि नेपाल की संसद ने नक्शे में बदलाव के लिए पहाड़ पर खीची जिस नई लकीर पर मुहर लगाई है, वह देश के मैदानी इलाकों में दरार का कारण बन रही है।
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लिपुलेख, कालापानी व लिंपियाधुरा के मुद्दे पर उपजे तनाव का असर भारत-नेपाल की 1751 किलोमीटर लंबी सरहद पर दिख रहा है, जो फिलहाल किसी अनहोनी को लेकर मधेशी लोगों में संशय है।
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संशय में हैं सीमा से पास रहने वाले लोग
रूपनदेही जिले में एक कार्यक्रम में इन नेताओं ने कहा कि भारत-नेपाल धार्मिक व सांस्कृतिक आधार पर जुड़े हैं। दोनों देशों की जनता में कटुता के लिए कोई जगह नहीं है। संसद के निचले सदन, प्रतिनिधि सभा में विवादित नक्शे को लेकर पेश संविधान संशोधन विधेयक को मंजूरी मिलने से तराई के सीमा के निकट रहने वाले लोग संशय में हैं।

उपेक्षित हैं नेपाल के मधेशी
नेपाल के नवलपरासी, रूपनदेही, कपिलवस्तु, झापा, मोरंग, सुनसरी, सप्तसरी, धनुषा, भोजपुर समेत तराई के 22 जिलों में रहने वाले मधेशियों की बोली-भाषा, खान-पान, रहन-सहन पहाड़ी नेपालियों से अलग है। ऐसे में काठमांडू से वह उपेक्षित होते आए हैं, जिसको लेकर मधेशी समुदाय के लोग समय-समय पर सरकार के खिलाफ सड़क पर उतर कर प्रदर्शन करते रहे हैं। नेपाल की सदन में 33 सांसद मधेशी हैं, इसके बाद भी नेपाल के संविधान में मधेशी समुदाय को कोई जगह नहीं मिल पाई, जिसको लेकर चार साल पूर्व करीब छह माह चले मधेशियों के आंदोलन के बाद भी उनकी सुनवाई नहीं हो सकी।
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