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Maharajganj News: चकबंदी में उलझा गांव, आठ हजार ग्रामीण योजनाओं के लाभ से वंचित

Mon, 19 Oct 2026 02:45 AM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Mon, 19 Oct 2026 02:45 AM IST
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Due to departmental negligence and persistent objections, the land consolidation process could not be finalized even after 22 years.
संवाद न्यूज एजेंसी
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महराजगंज/धानी। धानी ब्लॉक के कोइलाडांड़ गांव की करीब आठ हजार आबादी के लिए अपनी ही जमीन पराया धन बन गई है। किसानों के पास जमीन है। वे उस पर खेती भी कर रहे हैं लेकिन कागजात में वे आज भी जमीन के मालिक नहीं हैं। नतीजा यह है कि गांव के किसान केंद्र व प्रदेश सरकार की हर महत्वपूर्ण योजना से वंचित हैं।
इसकी वजह सिर्फ एक है- साल 2004 में शुरू हुई चकबंदी जो 2026 में भी पूरी नहीं हो पाई है। कोइलाडांड़ में चकबंदी प्रक्रिया की शुरुआत वर्ष 2004 में हुई थी। तब ग्रामीणों को उम्मीद थी कि दो-तीन साल में गांव के खेतों का बिखराव खत्म होगा और सबको एक जगह चक मिल जाएगा। वह उम्मीद अब निराशा में बदल गई है। विभागीय लापरवाही और लगातार आपत्तियों के चलते 22 साल बाद भी चकबंदी को अंतिम रूप नहीं दिया जा सका।
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केसीसी से लेकर फार्मर रजिस्ट्री तक से वंचित : खतौनी में मालिकाना हक स्पष्ट न होने से सबसे ज्यादा मार किसानों पर पड़ रही है। बैंक बिना स्पष्ट खतौनी के केसीसी लोन देने को तैयार नहीं हैं। किसान सम्मान निधि के लिए जब किसान आवेदन करते हैं तो पोर्टल पर जमीन का मिलान नहीं हो पाता। खाद-बीज अनुदान और कृषि यंत्रों पर मिलने वाली सब्सिडी से भी वे वंचित हैं। अब तो नई शुरू हुई फार्मर रजिस्ट्री भी नहीं बन पाई, जिसके चलते उपज बिचौलियों को बेचने पर मजबूर हैं।
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चकरोड और कब्जे का पेंच
ग्रामीणों का आरोप है कि चकबंदी के दौरान मनमाने तरीके से चक आवंटित किए गए। किसी को उसके घर से तीन किलोमीटर दूर तो किसी को नदी के किनारे चक दे दिया गया है। आवंटित चकों तक जाने के लिए अब तक चकरोड तक नहीं बनाई गई है। गांव की बंजर, चारागाह और खलिहान की जमीनों पर भी अवैध कब्जे हैं लेकिन विभाग आंख मूंदे बैठा है।
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