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Maharajganj News: गरीबी ने थमाई खिलौनों की टोकरी, बचपन पर बोझ
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निचलौल। जिन हाथों में किताबें और कलम होनी चाहिए, उनमें परिवार की रोजी-रोटी के लिए खिलौनों की टोकरी है। निचलौल के दशहरा मेले में सोमवार को कुशीनगर के तमकुही रोड निवासी दो सगे भाई अरबाज (15) और अरमान (13) खिलौने बेचते नजर आए।
बातचीत के दौरान अरमान ने बताया कि मां बीमार हैं और घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। परिवार के अन्य सदस्य भी पहले से यही काम करते रहे हैं। इसी के सहारे घर का खर्च चलता है। दोनों भाई साहूकारों से उधार लेकर खिलौने और अन्य सामान खरीदते हैं। इसके बाद अलग-अलग जगहों पर लगने वाले मेलों में उन्हें बेचते हैं। बिक्री से मिली रकम में पहले साहूकार का कर्ज चुकाते हैं, फिर जो पैसा बचता है, उससे परिवार की जरूरतें पूरी करने में मदद करते हैं।
चेहरे पर उदासी और परिवार की जिम्मेदारियों के बीच खिलौने बेचने की उनकी जद्दोजहद ने मेले में आए लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया। आर्थिक तंगी और मां की बीमारी ने इन बच्चों को कम उम्र में ही काम करने के लिए मजबूर कर दिया है।
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दोनों भाइयों ने बताया कि मेले में सामान बेचने के लिए उन्हें किसी निश्चित स्थान की सुविधा नहीं मिली है। वे मेले में घूम-घूमकर खिलौने बेचते हैं। कई बार रात भी मेले में ही गुजारनी पड़ती है। कम उम्र में परिवार की जिम्मेदारी उठाने की उनकी मजबूरी मेले की रौनक के बीच बचपन की मुश्किलों को बयां कर रही थी।
मेले में मौजूद रमेश, रोशन, शाहनवाज और वकील अहमद ने कहा कि ऐसे मामलों में प्रशासन को ध्यान देना चाहिए। बच्चों की उम्र पढ़ने-लिखने और खेलने की है, लेकिन गरीबी के कारण उन्हें परिवार चलाने के लिए मेहनत करनी पड़ रही है। बाल कल्याण के लिए जागरूकता अभियान चलाने के साथ ही ऐसे परिवारों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए भी ठोस प्रयास किए जाने चाहिए।
पूर्वांचल ग्रामीण सेवा समिति के सदस्य श्रवण कुमार ने बताया कि संस्था ऐसे परिवारों को जागरूक करती है।
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बातचीत के दौरान अरमान ने बताया कि मां बीमार हैं और घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। परिवार के अन्य सदस्य भी पहले से यही काम करते रहे हैं। इसी के सहारे घर का खर्च चलता है। दोनों भाई साहूकारों से उधार लेकर खिलौने और अन्य सामान खरीदते हैं। इसके बाद अलग-अलग जगहों पर लगने वाले मेलों में उन्हें बेचते हैं। बिक्री से मिली रकम में पहले साहूकार का कर्ज चुकाते हैं, फिर जो पैसा बचता है, उससे परिवार की जरूरतें पूरी करने में मदद करते हैं।
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चेहरे पर उदासी और परिवार की जिम्मेदारियों के बीच खिलौने बेचने की उनकी जद्दोजहद ने मेले में आए लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया। आर्थिक तंगी और मां की बीमारी ने इन बच्चों को कम उम्र में ही काम करने के लिए मजबूर कर दिया है।
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दोनों भाइयों ने बताया कि मेले में सामान बेचने के लिए उन्हें किसी निश्चित स्थान की सुविधा नहीं मिली है। वे मेले में घूम-घूमकर खिलौने बेचते हैं। कई बार रात भी मेले में ही गुजारनी पड़ती है। कम उम्र में परिवार की जिम्मेदारी उठाने की उनकी मजबूरी मेले की रौनक के बीच बचपन की मुश्किलों को बयां कर रही थी।
मेले में मौजूद रमेश, रोशन, शाहनवाज और वकील अहमद ने कहा कि ऐसे मामलों में प्रशासन को ध्यान देना चाहिए। बच्चों की उम्र पढ़ने-लिखने और खेलने की है, लेकिन गरीबी के कारण उन्हें परिवार चलाने के लिए मेहनत करनी पड़ रही है। बाल कल्याण के लिए जागरूकता अभियान चलाने के साथ ही ऐसे परिवारों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए भी ठोस प्रयास किए जाने चाहिए।
पूर्वांचल ग्रामीण सेवा समिति के सदस्य श्रवण कुमार ने बताया कि संस्था ऐसे परिवारों को जागरूक करती है।