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Maharajganj News: बौद्ध स्थलों के संरक्षण के लिए 1.51 करोड़ की स्वीकृति
Sat, 12 Jul 2025 11:57 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, महाराजगंज
संवाद न्यूज एजेंसी, महाराजगंज
Updated Sat, 12 Jul 2025 11:57 PM IST
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लक्ष्मीपुर। नौतनवा तहसील के बनरसिहा कला और बनरसिहा खुर्द गांवों में स्थित प्राचीन देवदह बौद्ध स्थल अब अपने ऐतिहासिक स्वरूप में पुनर्जीवित होने की ओर अग्रसर है। राज्य सरकार ने इन बहुमूल्य पुरातात्विक धरोहरों के संरक्षण एवं विकास के लिए 1.51 करोड़ की प्रशासकीय एवं वित्तीय स्वीकृति दी है।
उत्तर प्रदेश शासन की संयुक्त सचिव उमा द्विवेदी की ओर से लखनऊ स्थित राज्य पुरातत्व निदेशालय को भेजे गए पत्र में स्पष्ट किया गया है कि बनरसिहा कला और बनरसिहा खुर्द में स्थित राज्य संरक्षित स्मारकों, पुरास्थलों और स्तूपों के संरक्षण के लिए 1.51 करोड़ रुपये की धनराशि स्वीकृत की गई है।
यह राशि स्थलीय विकास, सांस्कृतिक सूचना पट्टों, प्राचीन स्मारकों के अनुरक्षण और पर्यटन सुविधा निर्माण जैसे विभिन्न मदों में उपयोग की जाएगी। ऐतिहासिक स्मारकों और स्तूपों की संरचना की मरम्मत व मूल स्वरूप में पुनर्निर्माण, स्थल पर सांस्कृतिक और ऐतिहासिक सूचना पट्टों की स्थापना, पर्यटक पथ, बैठने की व्यवस्था, आकर्षक द्वार, प्रकाश व्यवस्था का निर्माण, समग्र स्थलीय सुंदरीकरण और पर्यटन के अनुकूल वातावरण का सृजन किया जाएगा।
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राज्य सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि कार्य का निष्पादन पुरातत्व विशेषज्ञों एवं तकनीकी टीम की ओर से किया जाएगा। कार्य की डिजाइन हैरिटेज कंजर्वेशन आर्किटेक्ट की ओर से तैयार की जाएगी, जिससे जीर्ण-शीर्ण भवनों को उनकी मूल वास्तुकला के अनुरूप संरक्षित किया जा सके।
यह कार्य भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पैटर्न पर कराया जाएगा। गुणवत्ता में किसी भी प्रकार की कमी की स्थिति में संपूर्ण जिम्मेदारी राज्य पुरातत्व निदेशालय की होगी।
देवदह का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व
देवदह, भगवान बुद्ध की माता माया देवी का मायका और भगवान बुद्ध के ननिहाल के रूप में जाना जाता है। यह स्थान बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए उतना ही पवित्र है जितना लुंबिनी, सारनाथ या कुशीनगर। इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के अनुसार, बनरसिहा कला और बनरसिहा खुर्द गांवों में स्थित कई प्राचीन स्तूप, मंदिर अवशेष, ईंट संरचनाएं और उत्खनन स्थल आज भी बुद्धकालीन गौरव की गवाही देते हैं। फिर भी लंबे समय तक ये स्थल उपेक्षा और संरक्षण के अभाव में टूट-फूट और क्षरण के शिकार रहे। यहां कई बार उत्खनन कराया जा चुका है। इसमें करीब 2500 वर्ष से भी पुराने अवशेष मिले हैं।
बुद्ध पर्यटन सर्किट से जुड़ने की संभावना
उत्तर प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी बुद्धिस्ट सर्किट परियोजना के अंतर्गत कुशीनगर, सारनाथ और श्रावस्ती जैसे स्थलों को पहले ही शामिल किया गया है। अब यदि बनरसिहा कला (देवदह) को भी इस सर्किट से जोड़ा जाए तो यह न केवल बौद्ध श्रद्धालुओं को एक नया तीर्थस्थल देगा, बल्कि उत्तर प्रदेश को विश्व बौद्ध पर्यटन में अग्रणी राज्य बना सकता है।
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उत्तर प्रदेश शासन की संयुक्त सचिव उमा द्विवेदी की ओर से लखनऊ स्थित राज्य पुरातत्व निदेशालय को भेजे गए पत्र में स्पष्ट किया गया है कि बनरसिहा कला और बनरसिहा खुर्द में स्थित राज्य संरक्षित स्मारकों, पुरास्थलों और स्तूपों के संरक्षण के लिए 1.51 करोड़ रुपये की धनराशि स्वीकृत की गई है।
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यह राशि स्थलीय विकास, सांस्कृतिक सूचना पट्टों, प्राचीन स्मारकों के अनुरक्षण और पर्यटन सुविधा निर्माण जैसे विभिन्न मदों में उपयोग की जाएगी। ऐतिहासिक स्मारकों और स्तूपों की संरचना की मरम्मत व मूल स्वरूप में पुनर्निर्माण, स्थल पर सांस्कृतिक और ऐतिहासिक सूचना पट्टों की स्थापना, पर्यटक पथ, बैठने की व्यवस्था, आकर्षक द्वार, प्रकाश व्यवस्था का निर्माण, समग्र स्थलीय सुंदरीकरण और पर्यटन के अनुकूल वातावरण का सृजन किया जाएगा।
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राज्य सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि कार्य का निष्पादन पुरातत्व विशेषज्ञों एवं तकनीकी टीम की ओर से किया जाएगा। कार्य की डिजाइन हैरिटेज कंजर्वेशन आर्किटेक्ट की ओर से तैयार की जाएगी, जिससे जीर्ण-शीर्ण भवनों को उनकी मूल वास्तुकला के अनुरूप संरक्षित किया जा सके।
यह कार्य भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पैटर्न पर कराया जाएगा। गुणवत्ता में किसी भी प्रकार की कमी की स्थिति में संपूर्ण जिम्मेदारी राज्य पुरातत्व निदेशालय की होगी।
देवदह का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व
देवदह, भगवान बुद्ध की माता माया देवी का मायका और भगवान बुद्ध के ननिहाल के रूप में जाना जाता है। यह स्थान बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए उतना ही पवित्र है जितना लुंबिनी, सारनाथ या कुशीनगर। इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के अनुसार, बनरसिहा कला और बनरसिहा खुर्द गांवों में स्थित कई प्राचीन स्तूप, मंदिर अवशेष, ईंट संरचनाएं और उत्खनन स्थल आज भी बुद्धकालीन गौरव की गवाही देते हैं। फिर भी लंबे समय तक ये स्थल उपेक्षा और संरक्षण के अभाव में टूट-फूट और क्षरण के शिकार रहे। यहां कई बार उत्खनन कराया जा चुका है। इसमें करीब 2500 वर्ष से भी पुराने अवशेष मिले हैं।
बुद्ध पर्यटन सर्किट से जुड़ने की संभावना
उत्तर प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी बुद्धिस्ट सर्किट परियोजना के अंतर्गत कुशीनगर, सारनाथ और श्रावस्ती जैसे स्थलों को पहले ही शामिल किया गया है। अब यदि बनरसिहा कला (देवदह) को भी इस सर्किट से जोड़ा जाए तो यह न केवल बौद्ध श्रद्धालुओं को एक नया तीर्थस्थल देगा, बल्कि उत्तर प्रदेश को विश्व बौद्ध पर्यटन में अग्रणी राज्य बना सकता है।