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अवैध कटाई से जंगलों में घटते जा रहे हैं फलदार वृक्ष
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tree.j
- फोटो : tree.j
डोंगराखुर्द (ललितपुर)। जनपद के जंगलों में फलदार वृक्षों की संख्या दिन- प्रतिदिन कम होती जा रही है। सदियों से सहरिया आदिवासी परिवारों के लिए जंगल आजीविका का साधन रहा है। लेकिन, वर्तमान मेें पकने से पहले ही फलों को तोड़ा जा रहा है, जिससे फलों के बीच जमीन पर नहीं गिर पा रहे हैं। इससे फलदार वृक्षों की संख्या घटती जा रही है।
जिले के गौना, मड़ावरा, धौर्रा और देवगढ़ वन क्षेत्र में फलदार वृक्षों की भरमार थी। जंगल में तेंदू, आंवला, बेल, महुआ, कैंथ सहित विभिन्न प्रजाति के पेड़ थे। स्थानीय लोगों द्वारा फलों को पकने से पहले ही उनका दोहन करने से फलदार वृक्षों में कमी आ गई है। पेड़ पर लगे बेल को पकने से पहले तोड़ लिया जाता है। आंवला का फल भी परिपक्व नहीं हो पाता है। ऊंची कीमत पर बिकने वाला चिरौंजी फल भी यहां के जंगलों में भरपूर है, किंतु इसको पकने नहीं दिया जाता। फल पके तो बीज गिरेगा और फिर नया पौधा तैयार होगा, किंतु ऐसा नहीं हो पा रहा है। इतना ही नहीं जंगलों में आग लगने से भी पेड़- पौधों को नुकसान हो रहा है। गलत तरीके से दोहन होने से फलदार वृक्षों का अस्तित्व खतरे में है।
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चिरौंजी के पेड़ पर सर्वाधिक ध्यान
दस साल पहले पर्याप्त मात्रा चिरौंजी मिल जाती थी, लेकिन अब धीरे-धीरे नष्ट होती जा रही है। नष्ट होने का मुख्य कारण जंगलों में आग लगाना तथा ईंट- भट्टे के कारोबार में पेड़ों का कटान है।
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जंगलों में फलदार वृक्षों की संख्या घटती जा रही है, जिससें हम लोगों का रोजगार कम होता जा रहा है।
- रामरचरण आदिवासी
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तेंदू, बेल, महुआ, आंवला, करौंदा सहित विभिन्न प्रजातियों पेड़ों को लोग धीरे-धीरे नष्ट कर रहे हैं।
- संतोष साहू
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औषधीय पौधों के विलुप्त होने की ओर वन विभाग के अधिकारियों को ध्यान देने की जरूरत है।
- महेंद्र सतभैया, समाजसेवी
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जीवनोपयोगी गुणों वाले पौधों का विलुप्त होना ठीक नहीं है। इन्हें संरक्षण दिए जाने की आवश्यकता है।
- नरेंद्र दुबे, एडवोकेट
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चिरौंजी और तेंदू के बीजों को हजारों की संख्या में बोना नाली में बोया गया है। आदिवासी महुआ बीनने के समय जंगल में चोरी छिपकर आग लगा देते हैं, जिससे पेड- पौधे सूख जाते हैं और पौधों की संख्या घट जाती है। इस ओर ध्यान दिया जा रहा है।
- आरके शाही, वन क्षेत्राधिकारी गौना
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जिले के गौना, मड़ावरा, धौर्रा और देवगढ़ वन क्षेत्र में फलदार वृक्षों की भरमार थी। जंगल में तेंदू, आंवला, बेल, महुआ, कैंथ सहित विभिन्न प्रजाति के पेड़ थे। स्थानीय लोगों द्वारा फलों को पकने से पहले ही उनका दोहन करने से फलदार वृक्षों में कमी आ गई है। पेड़ पर लगे बेल को पकने से पहले तोड़ लिया जाता है। आंवला का फल भी परिपक्व नहीं हो पाता है। ऊंची कीमत पर बिकने वाला चिरौंजी फल भी यहां के जंगलों में भरपूर है, किंतु इसको पकने नहीं दिया जाता। फल पके तो बीज गिरेगा और फिर नया पौधा तैयार होगा, किंतु ऐसा नहीं हो पा रहा है। इतना ही नहीं जंगलों में आग लगने से भी पेड़- पौधों को नुकसान हो रहा है। गलत तरीके से दोहन होने से फलदार वृक्षों का अस्तित्व खतरे में है।
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चिरौंजी के पेड़ पर सर्वाधिक ध्यान
दस साल पहले पर्याप्त मात्रा चिरौंजी मिल जाती थी, लेकिन अब धीरे-धीरे नष्ट होती जा रही है। नष्ट होने का मुख्य कारण जंगलों में आग लगाना तथा ईंट- भट्टे के कारोबार में पेड़ों का कटान है।
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जंगलों में फलदार वृक्षों की संख्या घटती जा रही है, जिससें हम लोगों का रोजगार कम होता जा रहा है।
- रामरचरण आदिवासी
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तेंदू, बेल, महुआ, आंवला, करौंदा सहित विभिन्न प्रजातियों पेड़ों को लोग धीरे-धीरे नष्ट कर रहे हैं।
- संतोष साहू
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औषधीय पौधों के विलुप्त होने की ओर वन विभाग के अधिकारियों को ध्यान देने की जरूरत है।
- महेंद्र सतभैया, समाजसेवी
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जीवनोपयोगी गुणों वाले पौधों का विलुप्त होना ठीक नहीं है। इन्हें संरक्षण दिए जाने की आवश्यकता है।
- नरेंद्र दुबे, एडवोकेट
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चिरौंजी और तेंदू के बीजों को हजारों की संख्या में बोना नाली में बोया गया है। आदिवासी महुआ बीनने के समय जंगल में चोरी छिपकर आग लगा देते हैं, जिससे पेड- पौधे सूख जाते हैं और पौधों की संख्या घट जाती है। इस ओर ध्यान दिया जा रहा है।
- आरके शाही, वन क्षेत्राधिकारी गौना