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Lalitpur News: विलुप्त हो गई फूलों के रंगों से होली खेलने की परंपरा

Fri, 22 Mar 2024 02:48 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Fri, 22 Mar 2024 02:48 AM IST
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The tradition of playing Holi with flower colors has become extinct.
संवाद न्यूज एजेंसी
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ललितपुर। बुंदेलखंड में युवाओं की बेरुखी के चलते लोक विधाएं और परंपराएं विलुप्त हो रही हैं। त्योहारों की रौनक भी दिनों-दिन कम होती जा रही है। चार दशक पहले फूलों से रंग बनाकर होली खेली जाती थी, इन रंगों का औषधीय महत्व भी था, लेकिन अब पेड़ों पर लगे फूल बुजुर्गों की यादों तक सीमित रह गए हैं। बुजुर्ग बताते हैं कि फूलों से रंग बनाने में मेहनत लगती थी। लेकिन अब वह रंग और परंपरा गुम हो गई।

होली का पर्व फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन लोग एक दूसरे को रंग लगाकर अपनी बुराइयों को भूलते हैं। पहले रंगों का पर्व तीन दिन तक मनाया जाता था। पहले दिन कीचड़ से खेलते थे, इसके बाद अगले दिन रंग व गुलाल लगाते थे। यह पर्व मनाने का सिलसिला रंग पंचमी तक चलता था। अब बदलते परिवेश में पर्व केवल एक दिन ही मनाया जाता है। चार दशक पूर्व प्राकृतिक रंग से होली खेली जाती थी। इसमें लोग फूलों से रंग बनाते थे। कई दिन पहले से तैयारियां होती थीं। रंगों के लिए पलाश व सेमर समेत अन्य फूलों को घर लाकर सुखा लेते थे। इसके बाद पानी में गलाकर रखते थे। इससे केसरिया रंग बनता था। सेमर के फूल से लाल रंग तैयार होता था। इसके अलावा कई पत्तों को सुखाकर रंग बनाकर होली खेलते थे। अब अधिक मेहनत के चलते प्राकृतिक रंगों का चलन खत्म हो गया है। वर्तमान में रासायनिक रंगों का प्रयोग किया जा रहा है, जो सेहत को भी प्रभावित कर रहा है। कइयों को चर्म रोग की समस्या हो जाती है।
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