{"_id":"67cb3b5ee40307dc05018394","slug":"mud-holi-is-played-on-the-second-day-of-holika-dahan-lalitpur-news-c-131-1-ltp1005-131053-2025-03-08","type":"story","status":"publish","title_hn":"Lalitpur News: होलिका दहन के दूसरे दिन खेली जाती है कीचड़ की होली","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Lalitpur News: होलिका दहन के दूसरे दिन खेली जाती है कीचड़ की होली
विज्ञापन
संवाद न्यूज एजेंसी
ललितपुर। प्राचीन मान्यता के अनुसार होली का पर्व भक्त प्रह्लाद के आग से बचने और अत्याचार रूपी होलिका के भस्म होने पर लोगों ने धूल उड़ाकर खुशी मनाई थी। इसलिए होली के त्योहार को बुंदेलखंड में धुलेंडी के नाम से भी जाना जाता है। बाद में इसने यहां कीचड़ की होली का रूप ले लिया।
होलिका दहन के बाद लोग इसकी पूजा व परिक्रमा करते हैं। रात से ही कीचड़ और धूल की होली खेलना शुरू कर देते हैं। प्रतिपदा यानि परमा के दिन कीचड़, गोबर और धूल की होली खेलने की परंपरा है। इसके पीछे मान्यता है कि फसल पक जाने पर और घर आने पर किसान इसी प्रकार से खुशियां मनाते हैं। कीचड़ और गोबर की होली में भी बुंदेलों में सौहार्द व प्रेम झलकता है। इसके दूसरे दिन भाईदूज को सभी सुबह से ही रंग-गुलाल की होली खेलते हैं।
धुलेंडी के पीछे एक मान्यता यह भी है कि जब भक्त प्रह्लाद को उसकी बुआ होलिका ने गोदी में बैठाकर आग से जलाकर भस्म करने का प्रयास किया, तो भक्त प्रह्लाद तो बच गए, लेकिन होलिका आग में जल गई। विष्णु उपासकों और देवताओं ने भक्त प्रह्लाद के बचने की खुशी में उत्सव मनाया और होलिका दहन की भस्म को माथे पर और पूरे शरीर पर लगाया। धीरे-धीरे यह परंपरा में बदल गई और होलिका दहन की भस्म को जल में मिश्रित करके धारण किया जाने लगा।
विज्ञापन
जिसको भस्म नहीं मिल पाती तो वह होलिका दहन स्थल की धूल को ही जल में मिश्रित कर माथे से लगा लेता है। बाद में यह नालों के कीचड़ में बदल गया, जो एक कुरीति के रूप में नजर आने लगा।
विज्ञापन
ललितपुर। प्राचीन मान्यता के अनुसार होली का पर्व भक्त प्रह्लाद के आग से बचने और अत्याचार रूपी होलिका के भस्म होने पर लोगों ने धूल उड़ाकर खुशी मनाई थी। इसलिए होली के त्योहार को बुंदेलखंड में धुलेंडी के नाम से भी जाना जाता है। बाद में इसने यहां कीचड़ की होली का रूप ले लिया।
होलिका दहन के बाद लोग इसकी पूजा व परिक्रमा करते हैं। रात से ही कीचड़ और धूल की होली खेलना शुरू कर देते हैं। प्रतिपदा यानि परमा के दिन कीचड़, गोबर और धूल की होली खेलने की परंपरा है। इसके पीछे मान्यता है कि फसल पक जाने पर और घर आने पर किसान इसी प्रकार से खुशियां मनाते हैं। कीचड़ और गोबर की होली में भी बुंदेलों में सौहार्द व प्रेम झलकता है। इसके दूसरे दिन भाईदूज को सभी सुबह से ही रंग-गुलाल की होली खेलते हैं।
विज्ञापन
धुलेंडी के पीछे एक मान्यता यह भी है कि जब भक्त प्रह्लाद को उसकी बुआ होलिका ने गोदी में बैठाकर आग से जलाकर भस्म करने का प्रयास किया, तो भक्त प्रह्लाद तो बच गए, लेकिन होलिका आग में जल गई। विष्णु उपासकों और देवताओं ने भक्त प्रह्लाद के बचने की खुशी में उत्सव मनाया और होलिका दहन की भस्म को माथे पर और पूरे शरीर पर लगाया। धीरे-धीरे यह परंपरा में बदल गई और होलिका दहन की भस्म को जल में मिश्रित करके धारण किया जाने लगा।
विज्ञापन
जिसको भस्म नहीं मिल पाती तो वह होलिका दहन स्थल की धूल को ही जल में मिश्रित कर माथे से लगा लेता है। बाद में यह नालों के कीचड़ में बदल गया, जो एक कुरीति के रूप में नजर आने लगा।