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मानसून तो आ गया चेकडैम की नहीं हुई मरम्मत
amarujala
Updated Tue, 18 Jul 2017 12:59 AM IST
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rain
- फोटो : demo
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पाली । मानसून आने से पहले बरसात के पानी के जल संचय को लेकर तमाम योजनाएं बन रही थी, पर मानसून आ भी गया बारिश भी शुरू हो गई, लेकिन जल संचय को लेकर बनने वाली योजनाएं साकार रूप नही ले पाईं, इसकी वजह से पाली के तालाबों व चेकडैम का पानी रुकने का नाम नही ले रहा है। नगर पंचायत पाली में तीन प्रमुख तालाब हैं। भुजरया तालाब, नीलकंठ तालाब , नागौरी तालाब की दीवारें क्षतिग्रस्त पड़ी है। पाली क्षेत्र के अधिकांश चेकडैम भी खस्ताहाल हैं। जब तक बरसात चलेगी तब तक थोड़ा बहुत पानी इनमें देखने को मिलेगा।
ललितपुर और तालबेहट की तर्ज पर पाली में बोट क्लब की मांग जोर पकड़ती रही। बोट क्लब के लिए वार्ड एक में बना भुजरया तालाब, और नागौरी तालाब को सबसे उपयुक्त माना गया । लेकिन ऐ योजना परवान नही चढ़ पायी । जिसके पीछे का कारण इनके जीर्णोध्दार की आज तक कोई पहल न हो पाना । भुजरया तालाब लगभग तीस एकड़ के क्षेत्रफल में फैला है । लेकिन इसकी गहराई कुछ खास नही है । दीवारों में दरारें है, जिसके चलते इसमें पानी का संचय नही हो पाता । किसान केवल एक पानी ही इसका इस्तेमाल कर पाते है ।
नागौरी तालाब के तट पर प्राचीन नाग मंदिर है । जिसके चलते इस तालाब को नागौरी का नाम मिला । नागौरी तालाब के पानी से पान किसान अपने बरेजों में सिंचाई करते है । साथ ही यहां के किसान अपने खेतों में सिंचाई भी करते है । इस तालाब का पानी भी ज्यादा दिनों तक साथ नही देता । आसपास के किसान बताते है कि पिछले एक साल से इसकी एक दीवार बड़ी चौड़ी अलग पड़ी है, जिससे इसमें बरसात के पानी का संचय अपने आकर के हिसाब से नही हो पाएगा ।
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नीलकंठ मंदिर की तलहटी में बना नीलकंठ तालाब जिसे पाली में फुटटा तालाब के नाम से जाना जाता है । विंध्यांचल पर्वत की पहाड़ियों से गिरने वाला पानी इसमे आता है । बरसात के मौसम में ऐ तालाब अपनी अलग छटा बिखेरता है। लोग बताते है कि तालाब के साथ एक बदकिस्मती साथ चलती है इसकी दीवारों में दरारों का होना । अब तो इस पर बना चेकडैम भी पूरी तरह क्षतिग्रस्त है । अपनी बदकिस्मती के चलते इसमें पानी जमा नही हो पा रहा है, इसकी बदकिस्मती का एक कारण और भी है, कतिपय लोग इसमें खेती करने के उद्देश्य से इस तालाब को क्षति पहुँचा देते है ।
पर्यटन क्षेत्र दूधई जो प्राचीन राजा महाराजाओं के इतिहास की साक्षी है । साथ ही यहां 9 वीं 10वीं सदी के हिंदू व जैन मंदिर है । यहां के लोग बताते है कि कभी 100 एकड़ में फैला यहां का तालाब दूधई नगरी के गौरव में चार चाँद लगाता था । लेकिन बढ़ते समय के साथ ऐतिहासिक तालाब अपनी दुर्गति में सिमटता चला जा रहा, जिससे इस इलाके में पानी की भारी किल्लत बन जाती है । अपनी दुर्गति पर आँसू बहा रहे तालाब बरसों से इसी हाल में हैं। शासन द्वारा तालाबों के जीर्णोद्धार के लिए पहल शुरू तो हुई लेकिन पाली तक नहीं आ सकी ।
मानसून आने से पहले अगर इन तालाबों का गहरीकरण कर जीर्णोद्धार हो जाता तो आने वाले समय में लोगों को इनका भरपूर लाभ मिल जाता।
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ललितपुर और तालबेहट की तर्ज पर पाली में बोट क्लब की मांग जोर पकड़ती रही। बोट क्लब के लिए वार्ड एक में बना भुजरया तालाब, और नागौरी तालाब को सबसे उपयुक्त माना गया । लेकिन ऐ योजना परवान नही चढ़ पायी । जिसके पीछे का कारण इनके जीर्णोध्दार की आज तक कोई पहल न हो पाना । भुजरया तालाब लगभग तीस एकड़ के क्षेत्रफल में फैला है । लेकिन इसकी गहराई कुछ खास नही है । दीवारों में दरारें है, जिसके चलते इसमें पानी का संचय नही हो पाता । किसान केवल एक पानी ही इसका इस्तेमाल कर पाते है ।
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नागौरी तालाब के तट पर प्राचीन नाग मंदिर है । जिसके चलते इस तालाब को नागौरी का नाम मिला । नागौरी तालाब के पानी से पान किसान अपने बरेजों में सिंचाई करते है । साथ ही यहां के किसान अपने खेतों में सिंचाई भी करते है । इस तालाब का पानी भी ज्यादा दिनों तक साथ नही देता । आसपास के किसान बताते है कि पिछले एक साल से इसकी एक दीवार बड़ी चौड़ी अलग पड़ी है, जिससे इसमें बरसात के पानी का संचय अपने आकर के हिसाब से नही हो पाएगा ।
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नीलकंठ मंदिर की तलहटी में बना नीलकंठ तालाब जिसे पाली में फुटटा तालाब के नाम से जाना जाता है । विंध्यांचल पर्वत की पहाड़ियों से गिरने वाला पानी इसमे आता है । बरसात के मौसम में ऐ तालाब अपनी अलग छटा बिखेरता है। लोग बताते है कि तालाब के साथ एक बदकिस्मती साथ चलती है इसकी दीवारों में दरारों का होना । अब तो इस पर बना चेकडैम भी पूरी तरह क्षतिग्रस्त है । अपनी बदकिस्मती के चलते इसमें पानी जमा नही हो पा रहा है, इसकी बदकिस्मती का एक कारण और भी है, कतिपय लोग इसमें खेती करने के उद्देश्य से इस तालाब को क्षति पहुँचा देते है ।
पर्यटन क्षेत्र दूधई जो प्राचीन राजा महाराजाओं के इतिहास की साक्षी है । साथ ही यहां 9 वीं 10वीं सदी के हिंदू व जैन मंदिर है । यहां के लोग बताते है कि कभी 100 एकड़ में फैला यहां का तालाब दूधई नगरी के गौरव में चार चाँद लगाता था । लेकिन बढ़ते समय के साथ ऐतिहासिक तालाब अपनी दुर्गति में सिमटता चला जा रहा, जिससे इस इलाके में पानी की भारी किल्लत बन जाती है । अपनी दुर्गति पर आँसू बहा रहे तालाब बरसों से इसी हाल में हैं। शासन द्वारा तालाबों के जीर्णोद्धार के लिए पहल शुरू तो हुई लेकिन पाली तक नहीं आ सकी ।
मानसून आने से पहले अगर इन तालाबों का गहरीकरण कर जीर्णोद्धार हो जाता तो आने वाले समय में लोगों को इनका भरपूर लाभ मिल जाता।