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दो जून रोटी की जुगाड़ में जूझ रही जिंदगी

Mon, 24 Oct 2016 12:16 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो Updated Mon, 24 Oct 2016 12:16 AM IST
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 Life is struggling in June managed to bread
dance, lalitpur news - फोटो : amar ujala, lalitpur news
ललितपुर। राष्ट्रपति पुरस्कार विजेता लोक कलाकार राई सैरा नर्तक शिवराज सिंह की प्रतिभा को जनपद से लेकर देश भर में सराहा गया, लेकिन आज उन्हीं का परिवार गरीबी के झंझावात में पिस रहा है। दो जून रोटी की जुगाड़ को जिंदगी जूझ रही है। पौत्र विरासत में अपनी कला को छोड़कर जूस की दुकान पर गिलास धोकर पढ़ने को मजबूर है तो बहू आंगनबाड़ी केंद्र में रसोइया है। जिस मकान में यह लोग निवास कर रहे हैं, वह जर्जर है। परिजनों को दो वर्ष की पेंशन भी नहीं मिली। लोक कलाकार के परिवार की सुुध लेने के लिए प्रशासन व स्थानीय जनप्रतिनिधियों के पास समय नहीं है। 
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 जिला मुख्यालय से सात किलोमीटर दूर ग्राम पनारी में जन्मे सांस्कृतिक प्रतिभा के धनी राष्ट्रपति से पुरस्कृत राई सैरा नर्तक शिवराज ने अपनी प्रतिभा का लोहा सभी को मनवाया। बुंदेलखंडी इस लोक कलाकार ने गांव से लेकर दिल्ली के लाल किला मैदान तक बुंदेलखंडी प्रतिभा दिखाई। शुरुआत में शिवराज का लोकनृत्य गांव तक ही सीमित रहा, लेकिन बाद में बुंदेलखंडी लोक सांस्कृतिक मंडल के बैनर तले उन्होंने अपनी प्रतिभा  अन्य प्रदेशों में भी बिखेरनी शुरू कर दी।  उन्होंने सबसे पहले अपनी मंडली के साथ वर्ष 1989 में ताज महोत्सव के दौरान अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। अभिनेत्री हेमामालिनी के साथ लोकनृत्य किया। पूर्व राष्ट्रपति आर वेंकटरमण के समक्ष उन्होंने अपनी मंडली में लीला व फूला नाम की दो लोकहस्तियों के साथ लोकनृत्य प्रस्तुत किया, जिस पर तत्कालीन राष्ट्रपति ने उन्हें व उनकी मंडली को राईसैरा नृत्य के लिए सम्मानित किया। उन्होंने वर्ष 1989 में इलाहाबाद में आयोजित कुंभ के मेले में भी उत्तर प्रदेश की ओर से सांस्कृतिक कार्यक्रम राईसैरा को प्रस्तुत किया।
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पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के समक्ष भी पंद्रह अगस्त के कार्यक्रम में लाल किला के मैदान में लोकनृत्य राईसैरा की प्रस्तुति दी। शिवराज ने प्रदेश के जनपद झांसी, हमीरपुर व ताजमहोत्सव के अलावा मध्य प्रदेश व राजस्थान के कई शहरों में राईसैरा का जलवा बिखेरा। जनपद में उन्हेे तत्कालीन जिलाधिकारी ंअविनाश अवस्थी द्वारा भी लखनऊ से प्राप्त नौशाद पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। यही कारण रहा कि उन्हें शासन से पेंशन मिलने लगी, जो धीरे- धीरे बढ़कर तीन हजार रुपये हो गई।
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शिवराज को गरीबी शुरू से घेरे रही। वर्षों पूर्व गांव में पुस्तैनी जमीन सरकारी कर्ज के तले नीलाम हो गई, जिसके चलते गुजर बसर को एकमात्र साधन लोकनृत्य के रुप में मिलने वाली पेंशन ही रही। दिसंबर में शिवराज की मौत हो गई। शिवराज को मौत से एक वर्ष पहले से पेंशन नहीं मिली। इससे परिवार की आर्थिक स्थिति बिगड़ती गई। घर भी क्षतिग्रस्त हो गया। अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है, कि बारिश के मौसम में क्षतिग्रस्त छत से घर में पानी न रिसे इसके लिए पौत्र राजाबाबू ने दुकान में कई दिन मजदूरी की। इसके बाद बरसाती ली। इसी बरसाती से उसने अपने घर की छत को सुरक्षित किया। उसका संघर्ष यहीं नहीं रुका और कक्षा नवमीं में प्रवेश लेने के उसने गन्ना जूस की दुकान पर काम किया। मजदूरी में मिली रकम से नवमीं कक्षा में खुद अपना प्रवेश कराया।      

अधिवक्ता संतोष वत्सल बताते हैं कि आज भी दिल्ली के रविंद्रालय संग्रहालय में लोक कलाकार शिवराज सिंह और उसकी मंडली में शामिल लीला व फूला नर्तकियों की आदमकद तस्वीरें लगी हुई हैं, लेकिन यह सम्मान उनके परिवार की गरीबी दूर नहीं कर सका। 



     
पजन सिंह को भी नहीं मिली मदद           
शिवराज सिंह के साथी लोक कलाकार पजन सिंह शासन की उपेक्षा के शिकार हुए। उन्हें मदद नहीं मिली। वह आजकल अपनी लड़की के घर ग्राम नुनावली में रहकर किसी प्रकार जिंदगी गुजार रह्े हैं। 
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