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तालीम से दूर बचपन
lalitpur
Updated Mon, 19 Sep 2016 12:42 AM IST
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भारत सरकार जहां शिक्षा की अलख जगाने के लिए अभियान चला रही है। सर्व शिक्षा अभियान, मिड-डे मील पर लाखों करोड़ों का खर्चा किया जा रहा है। ऐसे में जहां नौनिहालों के हाथों में कलम व कंधों पर किताबों का बस्ता होना चाहिए, वहां उनके नाजुक कंधों पर परिवार के लिए रोटी की जुगाड़ करने का बोझ लदा हुआ हैं। हालत यह हैं कि आज भी सैकड़ों बच्चे स्कूल जाने के बजाय भूख मिटाने के लिए मशक्कत करते देखे जा सकते हैं।
रोटी की जुगाड़ में काम करते बच्चे सर्व शिक्षा अभियान की पोल खोल रहे हैं। ऐसे कई बच्चे चाय की दुकान पर कप उठाते हुए, कंधे पर बोरी रखकर कूडे़ के ढेर पर, हाथ में कटौरा लेकर भीख मांगते हुए या फिर कंधों पर झोली और हाथों में जहरीले जानवर लेकर दर-दर भटकते हुए आसानी से देखे जा सकते हैं। खेद की बात है कि न तो विभागीय अधिकारियों को बच्चों का श्रम दिखाई पड़ रहा है और न ही किसी को बच्चों से श्रम कराने से गुरेज है।
सर्व शिक्षा अभियान के तहत 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को प्राथमिक शिक्षा से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा हैं। इस अधिनियम के अस्तित्व में आने से सभी बच्चों को जूनियर हाईस्कूल तक की शिक्षा ग्रहण करने का कानूनी हक मिल गया है, पर धरातल पर इसका असर नहीं दिखाई दे रहा है। बीते वर्षों की भांति मौजूदा समय में भी अनेक बच्चे स्कूली शिक्षा से कोसों दूर है। स्कूली शिक्षा से वंचित नाथ समुदाय से ताल्लुक रखने वाला 12 वर्षीय गोखन नाथ सुबह होते ही पेट की खातिर कंधे पर बस्ते की जगह झोली टांगे और हाथ में जहरीले सांप लेकर दर-दर भटकता फिर रहा है। उसका कहना हैं कि होश संभालते ही उसके सर से मां का साया उठ गया। पढ़ाई करने की इच्छा होने के बावजूद पेट की खातिर मांगने जाना पड़ता हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में न केवल गोखन बल्कि ऐसे बच्चों की संख्या कहीं अधिक है जो पेट की भूख मिटाने और परिवार का भरण पोषण करने के लिए दो जून की रोटी की जुगाड़ करते आसानी से देखे जा सकते हैं। विभागीय उदासीनता का खामियाजा मासूम बच्चों को भुगतना पड़ रहा है और उनका खिलता बचपन परिवार का बोझ उठाने में बरबाद हो रहा हैं। विभागीय अधिकारियों का ध्यान इस ओर अपेक्षित हैं।
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रोटी की जुगाड़ में काम करते बच्चे सर्व शिक्षा अभियान की पोल खोल रहे हैं। ऐसे कई बच्चे चाय की दुकान पर कप उठाते हुए, कंधे पर बोरी रखकर कूडे़ के ढेर पर, हाथ में कटौरा लेकर भीख मांगते हुए या फिर कंधों पर झोली और हाथों में जहरीले जानवर लेकर दर-दर भटकते हुए आसानी से देखे जा सकते हैं। खेद की बात है कि न तो विभागीय अधिकारियों को बच्चों का श्रम दिखाई पड़ रहा है और न ही किसी को बच्चों से श्रम कराने से गुरेज है।
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सर्व शिक्षा अभियान के तहत 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को प्राथमिक शिक्षा से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा हैं। इस अधिनियम के अस्तित्व में आने से सभी बच्चों को जूनियर हाईस्कूल तक की शिक्षा ग्रहण करने का कानूनी हक मिल गया है, पर धरातल पर इसका असर नहीं दिखाई दे रहा है। बीते वर्षों की भांति मौजूदा समय में भी अनेक बच्चे स्कूली शिक्षा से कोसों दूर है। स्कूली शिक्षा से वंचित नाथ समुदाय से ताल्लुक रखने वाला 12 वर्षीय गोखन नाथ सुबह होते ही पेट की खातिर कंधे पर बस्ते की जगह झोली टांगे और हाथ में जहरीले सांप लेकर दर-दर भटकता फिर रहा है। उसका कहना हैं कि होश संभालते ही उसके सर से मां का साया उठ गया। पढ़ाई करने की इच्छा होने के बावजूद पेट की खातिर मांगने जाना पड़ता हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में न केवल गोखन बल्कि ऐसे बच्चों की संख्या कहीं अधिक है जो पेट की भूख मिटाने और परिवार का भरण पोषण करने के लिए दो जून की रोटी की जुगाड़ करते आसानी से देखे जा सकते हैं। विभागीय उदासीनता का खामियाजा मासूम बच्चों को भुगतना पड़ रहा है और उनका खिलता बचपन परिवार का बोझ उठाने में बरबाद हो रहा हैं। विभागीय अधिकारियों का ध्यान इस ओर अपेक्षित हैं।
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