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29 साल बाद जख्म फिर हरे हुए
ब्यूरो
Updated Mon, 18 Jan 2016 12:45 AM IST
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ललितपुर। 29 साल पहले सौजना थाने में डाक्टर की हिरासत में मौत के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार को अवमानना नोटिस जारी किया है। यह नोटिस पीड़ित परिवार को शेष राहत राशि पांच लाख रुपये न दिए जाने के कारण जारी किया गया है। इससे 29 साल के बाद जख्म फिर से हरे हो गए हैं।
डाक्टर की हिरासत में मौत की घटना वर्ष 1987 की है। सिमरिया गांव निवासी डा. वीरेंद्र सिंह की सौजना थाने में आठ मार्च 1987 को हिरासत में मौत हो गई थी। डा. सिंह के भाई राघवेंद्र सिंह ने बताया कि उनका छोटा भाई वीरेंद्र अपने ननिहाल सौजना में रहकर प्रैक्टिस करता था। छह मार्च 1987 को सौजना गांव में एक ठाकुर परिवार में लड़की की शादी थी। बारात में आई महिलाओं के साथ सौजना थाने के दो सिपाही अभद्रता कर रहे थे।
इसको लेकर डा. वीरेंद्र सिंह ने सिपाहियों की अभद्रता का विरोध किया, तो सिपाही उनसे गाली-गलौज व जान से मारने की धमकी देते हुए भाग गए। गांव वालों के दबाव में डा. वीरेंद्र ने उसी रात गांव छोड़ दिया और अपनी बुआ के घर मध्य प्रदेश के ग्राम रतनगंज चले गए। सौजना थाने में एक एफआईआर दर्ज की गई, जिसमें डा. वीरेंद्र को आरोपी बनाया गया।
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थाने की पुलिस रतनगंज जाकर डा. वीरेंद्र को लेकर सौजना पहुंची। जहां पर तत्कालीन थानाध्यक्ष जगवीर कठरया ने अपने दो सिपाहियों के साथ मिलकर उनके साथ मारपीट की। मारपीट से डाक्टर की हिरासत में मौत हो गई। हिरासत में मौत की खबर सुनकर गांव वालों व परिजनों ने हंगामा किया, जिस पर दबाव में थानाध्यक्ष व सिपाहियों पर हत्या का मुकदमा दर्ज हुआ।
मामले की सुनवाई के बाद सेशन कोर्ट ने तत्कालीन थानाध्यक्ष को उम्र कैद व सिपाहियों को छह-छह माह की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने फैसले को बदलते हुए थानाध्यक्ष की सजा दो वर्ष व सबूतों के अभाव में सिपाहियों को बरी कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने थानाध्यक्ष की सजा बढ़ाते हुए दो से पांच वर्ष कर दी। इसके अलावा मृतक के परिजनों को दस लाख राहत राशि देने का निर्देश दिया, जिसमें से पांच लाख रुपये तो दे दिए गए, लेकिन शेष राशि नहीं दी गई।
इसी मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को उत्तर प्रदेश सरकार को अवमानना का नोटिस जारी कर दिया गया। मृतक डॉक्टर की एक बेटी थी, जिसकी कुछ वर्ष पहले शादी हो गई है, जबकि उनकी पत्नी राजस्थान में एक महाविद्यालय में पढ़ा रही हैं। 29 वर्ष के बाद भी पूर्ण इंसाफ न मिलने से परिजन हताश हैं।
डाक्टर की हिरासत में मौत की घटना वर्ष 1987 की है। सिमरिया गांव निवासी डा. वीरेंद्र सिंह की सौजना थाने में आठ मार्च 1987 को हिरासत में मौत हो गई थी। डा. सिंह के भाई राघवेंद्र सिंह ने बताया कि उनका छोटा भाई वीरेंद्र अपने ननिहाल सौजना में रहकर प्रैक्टिस करता था। छह मार्च 1987 को सौजना गांव में एक ठाकुर परिवार में लड़की की शादी थी। बारात में आई महिलाओं के साथ सौजना थाने के दो सिपाही अभद्रता कर रहे थे।
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इसको लेकर डा. वीरेंद्र सिंह ने सिपाहियों की अभद्रता का विरोध किया, तो सिपाही उनसे गाली-गलौज व जान से मारने की धमकी देते हुए भाग गए। गांव वालों के दबाव में डा. वीरेंद्र ने उसी रात गांव छोड़ दिया और अपनी बुआ के घर मध्य प्रदेश के ग्राम रतनगंज चले गए। सौजना थाने में एक एफआईआर दर्ज की गई, जिसमें डा. वीरेंद्र को आरोपी बनाया गया।
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थाने की पुलिस रतनगंज जाकर डा. वीरेंद्र को लेकर सौजना पहुंची। जहां पर तत्कालीन थानाध्यक्ष जगवीर कठरया ने अपने दो सिपाहियों के साथ मिलकर उनके साथ मारपीट की। मारपीट से डाक्टर की हिरासत में मौत हो गई। हिरासत में मौत की खबर सुनकर गांव वालों व परिजनों ने हंगामा किया, जिस पर दबाव में थानाध्यक्ष व सिपाहियों पर हत्या का मुकदमा दर्ज हुआ।
मामले की सुनवाई के बाद सेशन कोर्ट ने तत्कालीन थानाध्यक्ष को उम्र कैद व सिपाहियों को छह-छह माह की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने फैसले को बदलते हुए थानाध्यक्ष की सजा दो वर्ष व सबूतों के अभाव में सिपाहियों को बरी कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने थानाध्यक्ष की सजा बढ़ाते हुए दो से पांच वर्ष कर दी। इसके अलावा मृतक के परिजनों को दस लाख राहत राशि देने का निर्देश दिया, जिसमें से पांच लाख रुपये तो दे दिए गए, लेकिन शेष राशि नहीं दी गई।
इसी मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को उत्तर प्रदेश सरकार को अवमानना का नोटिस जारी कर दिया गया। मृतक डॉक्टर की एक बेटी थी, जिसकी कुछ वर्ष पहले शादी हो गई है, जबकि उनकी पत्नी राजस्थान में एक महाविद्यालय में पढ़ा रही हैं। 29 वर्ष के बाद भी पूर्ण इंसाफ न मिलने से परिजन हताश हैं।