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Lalitpur News: विलुप्त होती जा रहीं बुंदेलखंड की परंपराएं
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जाखलौन। गांवों में विलुप्त होती आल्हा ऊदल के गायन की परंपरा चंदेल शासकों के समय से चली आ रही है। यह करीब 800 वर्ष पुरानी वीर गाथा है। आल्हा ऊदल के पराक्रम को दर्शाने वाली यह परंपरा मनोरंजन के नए साधनों एवं युवा पीढ़ी की बेरुखी के कारण विलुप्त होने के कगार पर है। अब से कुछ वर्ष पूर्व गांवों में इस गाथा काे चौपाल लगाकर उत्साहपूर्वक गाया जाता था। जिसमें गांव के सभी बुजुर्ग एवं युवा शामिल होते थे।
आल्हा गायन बरसात के मौसम में नाग पंचमी से शुरू किया जाता था। यह वीर रस से भरा लोकगीत होता था। इसे सुनने से श्रोताओं में असीम जोश, उत्साह एवं पराक्रम की भावना पैदा होती थी। जब खेत में काम कम हुआ करता था तब ग्रामीण आल्हा ऊदल के लोकगीत गाया और सुना करते थे। बुजुर्गों का कहना है कि यह बुंदेलखंड क्षेत्र का पारंपरिक लोक गीत है। इससे राष्ट्र प्रेम की भावना भी जागृत होती है। आज के आधुनिक दौर में यह लोक गीत, नृत्य राई-सेरा व गीत जैसे मनोरंजन के साधन विलुप्त होने के कगार पर हैं।
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फोटो-8
बुंदेलखंड का लोकप्रिय आल्हा ऊदल गायन आज मोबाइल की दुनिया में विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गया है। पहले सावन के माह में चौपाल लगाकर बुजुर्ग व्यक्ति इसका गायन सामूहिक रूप से किया करते थे। लेकिन अब मोबाइल की चकाचौंध से यह विलुप्त हो गया है।-बाबूलाल पंथी
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फोटो-9
सावन लगते ही आल्हा ऊदल गायन शुरू हो जाया करता था। जो कजलियों तक चलता था। अब बुंदेलखंड का यह लोकप्रिय गायन समाप्त होने के कगार पर है। इसका प्रमुख कारण है युवाओं का दिलचस्पी न लेना। मोबाइल के दौर में अनेक परंपराएं विलुप्त होती जा रहीं हैं।-खिलान सिंह
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आल्हा गायन बरसात के मौसम में नाग पंचमी से शुरू किया जाता था। यह वीर रस से भरा लोकगीत होता था। इसे सुनने से श्रोताओं में असीम जोश, उत्साह एवं पराक्रम की भावना पैदा होती थी। जब खेत में काम कम हुआ करता था तब ग्रामीण आल्हा ऊदल के लोकगीत गाया और सुना करते थे। बुजुर्गों का कहना है कि यह बुंदेलखंड क्षेत्र का पारंपरिक लोक गीत है। इससे राष्ट्र प्रेम की भावना भी जागृत होती है। आज के आधुनिक दौर में यह लोक गीत, नृत्य राई-सेरा व गीत जैसे मनोरंजन के साधन विलुप्त होने के कगार पर हैं।
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बुंदेलखंड का लोकप्रिय आल्हा ऊदल गायन आज मोबाइल की दुनिया में विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गया है। पहले सावन के माह में चौपाल लगाकर बुजुर्ग व्यक्ति इसका गायन सामूहिक रूप से किया करते थे। लेकिन अब मोबाइल की चकाचौंध से यह विलुप्त हो गया है।-बाबूलाल पंथी
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फोटो-9
सावन लगते ही आल्हा ऊदल गायन शुरू हो जाया करता था। जो कजलियों तक चलता था। अब बुंदेलखंड का यह लोकप्रिय गायन समाप्त होने के कगार पर है। इसका प्रमुख कारण है युवाओं का दिलचस्पी न लेना। मोबाइल के दौर में अनेक परंपराएं विलुप्त होती जा रहीं हैं।-खिलान सिंह