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सूखे तालाबों ने छीन लिया सैकड़ों का रोजगार
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Tue, 19 Apr 2016 01:10 AM IST
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water crisis
- फोटो : amar ujala
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जितेंद्र तिवारी
सिलावन (ललितपुर)। सूखे की भयावहता तालाब बयां कर रहे हैं, जो तालाब कभी नहीं सूखे, वह इस बार सूख गए हैं। इसके कारण गांवों में जनजीवन तो अस्त-व्यस्त हो ही गया हैं, उनके सामने जीवन यापन की भी समस्या उत्पन्न हो गई। पशुओं के लिए भी पीने के पानी की परेशानी खड़ी हो गई है।
तहसील महरौनी अंतर्गत ग्राम जरया का 65 एकड़ में फैला चंदेलकालीन तालाब, ग्राम समोगर में 44 एकड़ में फैला तालाब और ग्राम गुंदरापुर में 42 एकड़ में फैला तालाब जनपद के गिने-चुने तालाबों में शुमार हैं। इन तालाबों से न सिर्फ खेतों की सिंचाई होती है, बल्कि सैकड़ों ग्रामीण मछली पालन कर या फिर मुरार उत्पादन कर जीविकोपार्जन करते हैं। इससे ग्रामीणों की दो वक्त की रोटी का जुगाड़ आसानी से हो जाता था, लेकिन सूखे की विभीषिका के कारण जैसे-जैसे यह तालाब सूखते गए, वैसे-वैसे ग्रामीणों के चेहरे भी मुरझाते गए हैं। अब उनके सामने न सिर्फ पानी की समस्या है, बल्कि पेट की भूख मिटाने की समस्या भी उत्पन्न हो गई है।
ग्राम जरया में वर्षों पूर्व चंदेलकालीन राजाओं ने 65 एकड़ जमीन पर तालाब का निर्माण कराया था। तब से लेकर आज तक यह तालाब ग्रामीणों के लिए वरदान साबित हो रहा था, इससे जहां 150 एकड़ खेतों की सिंचाई आसानी से हो जाती थी, वहीं इस तालाब में ग्रामीण मछली पालन कर अपना व परिवार का पालन पोषण भी कर लेते थे। पशुओं के लिए पानी आसानी से उपलब्ध हो जाता था। इतना ही नहीं इस तालाब से गांव के कुओं, नलकूपों और हैंडपंपों का जलस्तर भी बना रहता था। ग्रामीण बताते हैं कि इस तरह का सूखा उन्होंने पहले कभी नहीं देखा। उनके गांव का तालाब पहली बार सूखा है। इससे जहां गांव के दर्जनों लोगों का रोजगार छिन गया है, वहीं जलस्तर नीचे खिसक जाने के कारण कुओं, हैंडपंपों व नलकूपों ने भी साथ छोड़ दिया। पशु पालकों को भी पशुओं के लिए पानी जुटाने में मशक्कत करनी पड़ रही है।
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यही हाल ग्राम समोगर के 44 एकड़ में फैले तालाब का है। इससे जहां पशुओं के लिए पीने के पानी की दिक्कत हो गई है, वहीं तालाब सूखने से मछली पालन नहीं हो सका है। साथ ही गांव के अन्य जलस्रोतों का जलस्तर भी नीचे खिसक गया, जिससे लोगों को पानी के लिए जद्दोजहद करनी पड़ रही है। ऐसी ही स्थिति महरौनी अंतर्गत ग्राम गुंदरापुर स्थित तालाब की है। 46 एकड़ में फैला यह तालाब खेतों की सिंचाई का एकमात्र साधन है। गांव के 1,800 एकड़ रकबे में से 1,250 एकड़ खेतों की सिंचाई इसी तालाब पर निर्भर है। इस बार यह तालाब पूरी तरह से सूख गया है, जिसके कारण एक तो किसान अपने खेतों की बुवाई नहीं कर सके और दाने-दाने को मोहताज हो गए। इस तालाब में बड़े पैमाने पर मछली पालन भी होता था, जिससे एक सैकड़ा परिवार अपना जीवन-यापन करते थे। तालाब के सूख जाने से इन परिवारों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया है।
ग्राम जरया का प्राचीन तालाब ग्रामीणों की आय का प्रमुख साधन है। इसमें बड़े पैमाने पर मछली पालन होता है। इससे 150 से अधिक परिवार जीवन यापन करते हैं। इतना ही नहीं तालाब में उगने वाले कमल के फूल और मुरार से भी ग्रामीणों को अच्छी खासी आय हो जाती है, लेकिन तालाब के सूख जाने के कारण ग्रामीणों के समक्ष रोजगार का संकट खड़ा हो गया है। पशुओं को भी पीने के पानी के लिए परेशानी हो रही है। तालाब के सूखने से अन्य जलस्त्रोतों पर इसका असर है। इससे गांव के एक के बाद एक हैंडपंप जवाब देने लगे हैं। आने वाले दिनों में स्थिति और अधिक विकराल हो सकती है।
- चंदन सिंह
ग्राम प्रधान, जरया
वह तालाब से मछली पकड़कर और मुरार बेचकर परिवार का पालन पोषण कर लेते थे, लेकिन इस बार तालाब के सूख जाने से जैसे उनका सब कुछ छिन गया है। अब उनकी आय बंद हो गई। वह मजदूरी करके अपने परिवार का पालन पोषण करने को मजबूर हैं।
-भागचंद, ग्राम जरया।
उन्होंने जीवन में ऐसा जलसंकट पहली बार देखा है। गांव में स्थित तालाब पहली बार पूरी तरह से सूख गया। इस तालाब से खेतों की सिंचाई के साथ-साथ ग्रामीण अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे। मछली पालन से सौ से अधिक ग्रामीणों की आजीविका चलती थी। अब वह भुखमरी की कगार पर हैं। तालाब के सूखने से पशुओं को पीने के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध नहीं हो पा रहा। गांव में 35 हैंडपंपों में मात्र 15 चालू हालत में हैं। कुएं पहले ही सूख गए हैं। उन्होंने शासन को पत्र लिखकर आठ रीबोर और 10 नए हैंडपंपों की मांग की है। केंद्रीय मंत्री उमा भारती को पत्र लिखकर तालाब के गहरीकरण की मांग भी की है।
- ग्यासी कुशवाहा, ग्राम प्रधान, गुंदरापुर।
गड्ढे खोदकर की जा रही पानी की व्यवस्था
इंसान तो जैसे-तैसे पीने का पानी जुटा ही ले रहा है, लेकिन पशुओं की हालत सबसे अधिक खराब है। वह पीने के पानी के लिए भटक रहे हैं। खासकर अन्ना पशु। इनकी ओर किसी का ध्यान नहीं है। इसी को ध्यान में रखते हुए ग्राम समोगर के ग्रामीणों ने सूखे तालाब में जगह-जगह गड्ढेे खोदकर निजी नलकूप से उसमें पानी भरने की व्यवस्था की है, जिससे पशु अपनी प्यास बुझा सकें।
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सिलावन (ललितपुर)। सूखे की भयावहता तालाब बयां कर रहे हैं, जो तालाब कभी नहीं सूखे, वह इस बार सूख गए हैं। इसके कारण गांवों में जनजीवन तो अस्त-व्यस्त हो ही गया हैं, उनके सामने जीवन यापन की भी समस्या उत्पन्न हो गई। पशुओं के लिए भी पीने के पानी की परेशानी खड़ी हो गई है।
तहसील महरौनी अंतर्गत ग्राम जरया का 65 एकड़ में फैला चंदेलकालीन तालाब, ग्राम समोगर में 44 एकड़ में फैला तालाब और ग्राम गुंदरापुर में 42 एकड़ में फैला तालाब जनपद के गिने-चुने तालाबों में शुमार हैं। इन तालाबों से न सिर्फ खेतों की सिंचाई होती है, बल्कि सैकड़ों ग्रामीण मछली पालन कर या फिर मुरार उत्पादन कर जीविकोपार्जन करते हैं। इससे ग्रामीणों की दो वक्त की रोटी का जुगाड़ आसानी से हो जाता था, लेकिन सूखे की विभीषिका के कारण जैसे-जैसे यह तालाब सूखते गए, वैसे-वैसे ग्रामीणों के चेहरे भी मुरझाते गए हैं। अब उनके सामने न सिर्फ पानी की समस्या है, बल्कि पेट की भूख मिटाने की समस्या भी उत्पन्न हो गई है।
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ग्राम जरया में वर्षों पूर्व चंदेलकालीन राजाओं ने 65 एकड़ जमीन पर तालाब का निर्माण कराया था। तब से लेकर आज तक यह तालाब ग्रामीणों के लिए वरदान साबित हो रहा था, इससे जहां 150 एकड़ खेतों की सिंचाई आसानी से हो जाती थी, वहीं इस तालाब में ग्रामीण मछली पालन कर अपना व परिवार का पालन पोषण भी कर लेते थे। पशुओं के लिए पानी आसानी से उपलब्ध हो जाता था। इतना ही नहीं इस तालाब से गांव के कुओं, नलकूपों और हैंडपंपों का जलस्तर भी बना रहता था। ग्रामीण बताते हैं कि इस तरह का सूखा उन्होंने पहले कभी नहीं देखा। उनके गांव का तालाब पहली बार सूखा है। इससे जहां गांव के दर्जनों लोगों का रोजगार छिन गया है, वहीं जलस्तर नीचे खिसक जाने के कारण कुओं, हैंडपंपों व नलकूपों ने भी साथ छोड़ दिया। पशु पालकों को भी पशुओं के लिए पानी जुटाने में मशक्कत करनी पड़ रही है।
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यही हाल ग्राम समोगर के 44 एकड़ में फैले तालाब का है। इससे जहां पशुओं के लिए पीने के पानी की दिक्कत हो गई है, वहीं तालाब सूखने से मछली पालन नहीं हो सका है। साथ ही गांव के अन्य जलस्रोतों का जलस्तर भी नीचे खिसक गया, जिससे लोगों को पानी के लिए जद्दोजहद करनी पड़ रही है। ऐसी ही स्थिति महरौनी अंतर्गत ग्राम गुंदरापुर स्थित तालाब की है। 46 एकड़ में फैला यह तालाब खेतों की सिंचाई का एकमात्र साधन है। गांव के 1,800 एकड़ रकबे में से 1,250 एकड़ खेतों की सिंचाई इसी तालाब पर निर्भर है। इस बार यह तालाब पूरी तरह से सूख गया है, जिसके कारण एक तो किसान अपने खेतों की बुवाई नहीं कर सके और दाने-दाने को मोहताज हो गए। इस तालाब में बड़े पैमाने पर मछली पालन भी होता था, जिससे एक सैकड़ा परिवार अपना जीवन-यापन करते थे। तालाब के सूख जाने से इन परिवारों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया है।
ग्राम जरया का प्राचीन तालाब ग्रामीणों की आय का प्रमुख साधन है। इसमें बड़े पैमाने पर मछली पालन होता है। इससे 150 से अधिक परिवार जीवन यापन करते हैं। इतना ही नहीं तालाब में उगने वाले कमल के फूल और मुरार से भी ग्रामीणों को अच्छी खासी आय हो जाती है, लेकिन तालाब के सूख जाने के कारण ग्रामीणों के समक्ष रोजगार का संकट खड़ा हो गया है। पशुओं को भी पीने के पानी के लिए परेशानी हो रही है। तालाब के सूखने से अन्य जलस्त्रोतों पर इसका असर है। इससे गांव के एक के बाद एक हैंडपंप जवाब देने लगे हैं। आने वाले दिनों में स्थिति और अधिक विकराल हो सकती है।
- चंदन सिंह
ग्राम प्रधान, जरया
वह तालाब से मछली पकड़कर और मुरार बेचकर परिवार का पालन पोषण कर लेते थे, लेकिन इस बार तालाब के सूख जाने से जैसे उनका सब कुछ छिन गया है। अब उनकी आय बंद हो गई। वह मजदूरी करके अपने परिवार का पालन पोषण करने को मजबूर हैं।
-भागचंद, ग्राम जरया।
उन्होंने जीवन में ऐसा जलसंकट पहली बार देखा है। गांव में स्थित तालाब पहली बार पूरी तरह से सूख गया। इस तालाब से खेतों की सिंचाई के साथ-साथ ग्रामीण अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे। मछली पालन से सौ से अधिक ग्रामीणों की आजीविका चलती थी। अब वह भुखमरी की कगार पर हैं। तालाब के सूखने से पशुओं को पीने के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध नहीं हो पा रहा। गांव में 35 हैंडपंपों में मात्र 15 चालू हालत में हैं। कुएं पहले ही सूख गए हैं। उन्होंने शासन को पत्र लिखकर आठ रीबोर और 10 नए हैंडपंपों की मांग की है। केंद्रीय मंत्री उमा भारती को पत्र लिखकर तालाब के गहरीकरण की मांग भी की है।
- ग्यासी कुशवाहा, ग्राम प्रधान, गुंदरापुर।
गड्ढे खोदकर की जा रही पानी की व्यवस्था
इंसान तो जैसे-तैसे पीने का पानी जुटा ही ले रहा है, लेकिन पशुओं की हालत सबसे अधिक खराब है। वह पीने के पानी के लिए भटक रहे हैं। खासकर अन्ना पशु। इनकी ओर किसी का ध्यान नहीं है। इसी को ध्यान में रखते हुए ग्राम समोगर के ग्रामीणों ने सूखे तालाब में जगह-जगह गड्ढेे खोदकर निजी नलकूप से उसमें पानी भरने की व्यवस्था की है, जिससे पशु अपनी प्यास बुझा सकें।