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महात्मा गांधी से प्रभावित होकर आजादी के आंदोलन में कूदे थे बृजनंदन

Tue, 03 Aug 2021 01:00 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Tue, 03 Aug 2021 01:00 AM IST
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brijnandan sharma, freedom fighter
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पं. ब्रजनंदन शर्मा - फोटो : LALITPUR
ललितपुर। बुंदेलीधरा के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बृजनंदन शर्मा ने महात्मा गांधी से प्रभावित होकर विद्यालय छोड़कर आजादी के आंदोलन में कूद पड़े थे। वर्ष 1930 में प्रथम बार जेल गए, जिसमें उन्हें तीन माह की सजा हुई थी। सजा उनके इरादे को तनिक भी डिगा नहीं सकी। प्रत्येक आंदोलन में उन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी जताई। नतीजा यह हुआ कि उन्हें जेल कई बार जाना पड़ा।
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मोहल्ला सुभाषपुरा में रहने वाले नारायण दास तिवारी कामर्शियल इंस्पेक्टर के घर में बृजनंदन का जन्म हुआ था। महज 3 वर्ष की आयु में उनकी माता का देहांत हो गया था। जिस कारण बुआ ने उनका लालन-पालन किया। अपनी बुआ की छत्र-छाया में वह आगे बढ़ते रहे। चौदह वर्ष की उम्र में उनका झुकाव राजनीति की ओर हो गया। विद्यालय में ही अपने सहपाठियों का संगठन बनाकर नेतृत्व करने लगे। उन्हीं दिनों महात्मा गांधी ने विद्यार्थियों का आह्वान किया तो उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और 1929 में कांग्रेस के स्वयंसेवक बन गए।
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इस तरह वह गांधी जी के आह्वान पर आंदोलनों में सक्रियता से भाग लेते रहे। तत्कालीन डीवाई एसपी ब्रूम उनकी सक्रियता से चिढ़ गया था। जब भी वह गिरफ्तार होते थे, अंग्रेज अफसर उनकी पिटाई करता था और कहता था कि बोलो ‘रखनी जालिम सरकार या नहीं रखनी’। इस दौरान उनका एक ही उत्तर हुआ करता था कि नहीं रखनी जालिम सरकार। उन्होंने लखनऊ कैंप जेल, इलाहाबाद व आगरा की जेलों में यातनाएं झेलीं। बृजनंदन शर्मा का जेल में लाल बहादुर शास्त्री, बाबू संपूर्णानंद, सुंदरलाल कर्मवीर, कृष्णदत्त पालीवाल, सेठ अचल सिंह, रामचंद पालीवाल से संपर्क हुआ। आजादी के बाद वर्ष 1953 से 1958 तक नगर पालिका अध्यक्ष रहे। वह स्वतंत्रता संग्राम सेनानी संघ के जिलाध्यक्ष व स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मंत्री परिषद के मंत्री भी रहे। इसके अलावा नौ वर्ष तक जिला कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष पद भी संभाला।
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इतनी बार गए जेल
सन 1930 में प्रथम बार 3 माह की सजा हुई। सन 1931 में 6 माह की सजा हुई। सन 1932 में पुन: 4 माह की सजा और 50 रुपये का जुर्माना हुआ। इसी साल में उन्हें दुबारा 6 माह की सजा भुगतनी पड़ी। सन 1941 में 6 माह की सजा व 100 रुपये का जुर्माना। सन 1942 में एक वर्ष की सजा व 100 रुपये जुर्माना।
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