वैश्विक महामारी कोरोना वायरस के चलते मानव जीवन अस्त- व्यस्त हो गया है। सबसे ज्यादा प्रभावित ऐसे लोग हैं, जो रोज मेहनत- मजदूरी कर दो जून की रोटी की जुगाड़ करके अपनी उदरपूर्ति करते हैं। जो लोग मेहनत करके अपने परिवार का भरण- पोषण करते थे, आज भीख मांगने पर मजबूर हैं। महरौनी श्मशान घाट के सामने किसरदा में रहने वाले परमाल अपनी पत्नी शांतिबाई के साथ 10 वर्ष पूर्व मध्यप्रदेश के गंजबासौदा से मजदूरी की आस में आया था। ठीक- ठाक मजदूरी नहीं मिलने पर कचरे के ढेर से कबाड़ बीनकर अपने जीवन- यापन का जरिया बना लिया। इस काम में उसकी पत्नी और बच्चे भी हाथ बंटाने में जुट गए। सब लोग दिन भर कचरे के ढेर से कबाड़ इकट्ठा कर उसे बेचकर दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करके उदरपूर्ति आराम से हो जाती थी। लेकिन, पिछले एक माह से कोरोना महामारी के कारण लॉकडाउन ने इनकी कमर तोडक़र रख दी है। लॉकडाउन में दुकाने नहीं खुलने से कबाड़ नहीं बिक पा रहा है। इस वजह से यह परिवार इस समय भीख मांग कर पेट भरने को मजबूर है। खुले आसमान तले परिवार सहित गुजर- बसर करने वाला परमाल बताता है कि मजदूरी नहीं मिलने पर उसने कचरे के ढेर से कबाड़ बीनना पसंद किया, किंतु भीख मांगना मंजूर नहीं था। लेकिन, लॉकडाउन के कारण पेट की भूख मिटाने के लिए भीख मांगने पर मजबूर होना पड़ा। 25 दिन पूर्व एसडीएम ने उसे बीस किलोग्राम आटा और एक किलो दाल उपलब्ध कराई थी। लेकिन, पेट भरने के लिए अन्य चीजों की भी जरूरत होती है। इस वजह से घर-घर जाकर भीख मांगना पड़ रही है। बरसात के समय आसपास मकानों के छज्जों या टीन शेड के नीचे सर छिपा लेता है। खास बात यह है कि समाजसेवियों का ध्यान इस ओर नहीं जा रहा है। ------------- झोपड़ी तक मयस्सर नहीं कोई स्थायी जगह नहीं होने की वजह से परमाल व उसके परिवार को एक झोपड़ी तक भी मयस्सर नहीं हैं। इस वजह से वह खुले आसमान के नीचे गुजर- बसर करने को मजबूर हैं। बरसात के मौसम में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। ----------------- अंतिम आदमी तक योजना के दावों पर सवाल परमाल और उसके परिवार की गिनती समाज के अंतिम तबके में होती है, जिसके लिए सरकार विभिन्न योजनाओं का संचालन कर रही है। योजनाओं का लाभ समाज के अंतिम आदमी तक पहुंचाने का दावा किया जाता है, लेकिन हकीकत यह है कि योजनाओं का लाभ समाज के अंतिम आदमी तक नहीं पहुंच पा रहा है। परमाल का आज तक न तो राशनकार्ड बना और न आवास। आयुष्मान योजना का लाभ भी उस तक नहीं पहुंच पाया है। जबकि, वह महरौनी में पिछले दस वर्षों से रह रहा है।