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बालाबेहट में जीवन झरने पर है निर्भर

Sat, 09 Apr 2016 01:21 AM IST
Lalitpur
Lalitpur Updated Sat, 09 Apr 2016 01:21 AM IST
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Balabeht life dependent on Waterfall
बालाबेहट में जीवन झरने पर है निर्भर - फोटो : Amar Ujala
ललितपुर। विकास के तमाम दावे करने वाली सरकार व प्रशासन की सच्चाई मध्य प्रदेश की सीमा पर बसा बालाबेहट गांव बयां कर रहा है। 15 हजार की आबादी वाले गांव के तकरीबन छह हजार लोग पहाड़ों से बहकर आने वाले पानी पर निर्भर हैं। गांव के लोगों का कहना है कि उन्हें सरकार नहीं, बल्कि भगवान पानी मुहैया करा रहे हैं।
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 प्रशासन की ओर से गांव में 137 हैंडपंप पेयजल आपूर्ति के लिए लगाए गए हैं। वर्तमान में केवल दस हैंडपंप काम कर रहे हैं, जिनमें से तीन सरकारी कार्यालयों में लगे होने के कारण ग्रामीणों को उनका कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है। वहीं, तीन हैंडपंपों में से पानी निकालने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ती है। हकीकत में केवल चार हैंडपंप ही तरीके से काम कर रहे हैं। गांव वालों का मुख्य सहारा पहाड़ से रिसकर आने वाला पानी है। इस झरने पर दिन भर पानी भरने वालों की लाइन देखी जा सकती है। अमोनिया झरना के नाम से जाने वाले कुंड में पहाड़ से रिसकर आने वाले पानी को एकत्रित किया जाता है, फिर उसका उपयोग गांववाले करते हैं।
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गांव वालों ने बताया कि गर्मी बढ़ने के बाद से ही कुंड से लगातार पानी भरने पर वह सूख जाता है। एक से दो घंटे इंतजार करने के बाद कुंड भरता है, फिर दोबारा उसमें से पानी भरने का सिलसिला शुरू हो जाता है। यह कुंड गांव के बीचों बीच स्थित है, इस कारण से बड़ी आबादी को इससे राहत है। लेकिन, बालाबेहट ग्राम पंचायत से सलैया, डारा, रामनगर, कछयाहार व बजरंग गढ़ पांच मजरा (छोटे गांव) जुड़े हुए हैं। इन मजरों में रहने वालों को पानी के लिए एक से डेढ़ किमी दूर तक का सफर करना पड़ता है।
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 बजरंगगढ़ मजरा में आदिवासी सहरिया करीब दो सौ लोग निवास करते हैं, जिनके लिए केवल हैंडपंप लगा हुआ है, पिछले कई दिनों से यह हैंडपंप भी खराब पड़ा है, इससे यहां की महिलाओं को पानी के लिए डेढ़ किमी दूर चलकर हैंडपंप से पानी लाना मजबूरी बन गई है। गांव वालों को डर है कि अप्रैल की शुरुआत में गांव में इतने भयावह हालत हैं, तो मई व जून में तो स्थिति काबू से बाहर हो सकती है।

मासूमों के सिर पर पानी के बर्तन
बालाबेहट क्षेत्र में जहां कहीं भी पानी उपलब्ध है, वहां पर महिलाओं के साथ छोटे- छोटे बच्चे भी देखे जा सकते हैं। यह बच्चे वहां खेलने के लिए नहीं, बल्कि अपनी मां- बहनों के सहयोग कर सिर पर भारी बर्तन लेकर पानी घर ले जाते हैं। बालाबेहट गांव के मजरा कछयाहार में सड़क किनारे रहने वाले लोगों के लिए पेयजल का सहारा एक हैंडपंप ही था। पिछले दिनों हुए ग्राम पंचायत के चुनाव में किसी हारे हुए प्रत्याशी ने भड़ास निकालने के लिए हैंडपंप को ही उखाड़ दिया। प्रशासन को इसकी सूचना दी गई, जल्द ही नया हैडपंप लगवाने का आश्वासन दिया गया। लेकिन, आश्वासनों से प्यास नहीं बुझती है, इसलिए बोर के पाइप में एक छोटा सा बर्तन डालकर महिलाएं घंटों प्रयास कर पानी घर ले जाती हैं।

कुंए की मुडेर पर पानी के लिए दंगल
बिडंबना देखिए कि बालाबेहट के जिस मुहल्ले का नाम तालाबपुरा है, वहां रोज सवेरे से निवासियों में पानी के झगड़ा हो रहा है। बालाबेहट गांव में जल संस्थान की टंकी से पाइप के जरिए कुछ इलाकों में पेयजल की आपूर्ति होती है। मुहल्ला तालाबपुरा में भी पानी के लिए पाइप लाइन है, लेकिन केवल एक सामुदायिक नल से ही पानी की आपूर्ति होती है। इस नल पर झगड़े होने व पानी की बर्बादी होने के कारण पाइप लाइन को पचास फुट तक कुएं की मुंडेर से इसको जोड़ दिया गया है। रोज सुबह जब नल में पानी आता है, तो पचास फुट गहरे कुएं की मुंडेर पर पानी के लिए झगड़ा होता है। जिस महिला का पति आने में देर कर दे, तो वह केवल खाली पानी लिए इंतजार ही कर सकती है। मुहल्ले के बुजुर्ग हजारी कुशवाहा बताते हैं कि कुएं की मुंडेर पर पानी के लिए होने वाले झगड़े से अंदेशा है, कि किसी दिन कोई अनहोनी न हो जाए और कोई गहरे में कुएं में न गिर जाए।

मंत्री जी! घोषणा पर अमल भी कर दो
क्षेत्रीय सांसद व जल संसाधन मंत्री उमा भारती ने दो जनवरी को बालाबेहट गांव में एक चौपाल लगाई थी। उन्होंने गांव के मंदिरों में मत्था भी टेका था। गांव में जो झरना पेयजल का सहारा बना हुआ है, उसके उद्गम स्थल पर पाताल बाबा हनुमान मंदिर बना है। गांव वालों ने केंद्रीय मंत्री को पेयजल की समस्या व झरने की महत्ता के बारे में बताया था। मंदिर के पास निकले झरने के विकास को मंत्रीजी ने तपाक से 25 लाख रुपये देने की घोषणा कर दी थी। इस घोषणा से गांव वालों को लगा था कि झरने का विकास हो जाएगा और उनके पेयजल की समस्या का समाधान हो सकेगा। लेकिन, पुराने वित्तीय वर्ष की समाप्ति हो गई और नया वित्तीय वर्ष शुरु हो गया, लेकिन अभी घोषणा केवल घोषणा ही बनी हुई है। कई बार गांव वालों ने उमा भारती से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन संपर्क ही नहीं हो पाया।

प्रशासन जल्द उठाए कदम
ग्राम प्रधान प्रतिनिधि सतनाम सिंह तोमर बताते हैं कि बृहस्पतिवार को वह प्रशासन की ओर से आयोजित मीटिंग में हिस्सा लेने गए थे। वहां पर अधिकारियों को गांव में पेयजल की समस्या के बारे में बताया था। अधिकारियों ने ग्राम पंचायत के फंड की पेयजल की व्यवस्था के लिए उपयोग करने की सहमति दी है। प्रशासन का सहयोग अगर जल्द नहीं मिला तो गांव में भयावह स्थिति हो सकती है।

फिर बदनाम न हो जाए गांव
गांव के निवासी खलक सिंह ने बताया कि कुछ वर्ष पूर्व तक बालाबेहट गांव में पानी की समस्या व सड़कों का अभाव होने के कारण यहां पर लोग अपनी बेटियों की शादी करने से हिचकते थे। जो रिश्तेदार एक बार गांव आ जाता था, दोबारा आने से डरता था। पेयजल की जैसी स्थिति बन रही है, उसको देखकर डर लगता है कि कहीं गांव फिर से बदनाम न हो जाए।


आदिवासियों का बुरा हाल
गांव के निवासी माधव सिंह बताते हैं कि बालाबेहट गांव में आदिवासियों की बहुलता है। आदिवासी बस्तियों में पेयजल की ज्यादा किल्लत है। बस्तियों के हैंडपंप खराब हो चुके हैं। सहारिया महिलाओं को पानी के लिए एक से डेढ़ किमी दूर तक जाना पड़ रहा है। कई परिवार तो पोखरों का पानी पी रहे हैं, जिसके कारण उनके परिवार में बीमारियां पनप रही है।
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