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नए अनाजों से किया हुआ यज्ञ ही होली का पर्व
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महरौनी। महर्षि दयानंद सरस्वती योग संस्थान आर्य समाज महरौनी ने वासंती नव सस्येष्टि यज्ञ होली का पर्व वैदिक रीति से मनाया गया।
आर्य समाज के प्रधान मुनि पुरुषोत्तम वानप्रस्थ ने कहा कि वासंती नव सस्येष्टि अर्थात बसंत ऋतु के नए अनाजों से किया हुआ यज्ञ ही होली का पर्व है। होली, होलिका का अपभ्रंश है। उन्होंने कहा कि तिनके की अग्नि में भुने हुए (अध पके) शमो-धान्य (फली वाले अन्न) को होलक कहते हैं। किसी भी अनाज की ऊपरी पर्त को होलिका कहते हैं। चने का पट पर (पर्त), मटर का पट पर (पर्त), गेहूं, जौ का गिदी से ऊपर वाला पर्त। इसी प्रकार चना, मटर, गेहूं व जौ की गिदी को प्रह्लाद कहते हैं। होलिका को माता इसलिए कहते हैं कि वह चना आदि का निर्माण करती (माता निर्माता भवति) है। यदि यह पर्त पर (होलिका) न हो तो चना, मटर रुपी प्रह्लाद का जन्म नहीं हो सकता। जब चना, मटर, गेहूं व जौ भुनते हैं तो वह पट पर या गेहूं, जौ की ऊपरी खोल पहले जलता है, इस प्रकार प्रह्लाद बच जाता है। उस समय प्रसन्नता से जय घोष करते हैं कि होलिका माता की जय अर्थात होलिका रुपी पट पर (पर्त) ने अपने को देकर प्रह्लाद (चना-मटर) को बचा लिया।
आर्य समाज के संरक्षक रूप सिंह शिक्षाविद व राजा भैया ने कहा कि अधजले अन्न को होलक कहते हैं। इसी कारण इस पर्व का नाम होलिकोत्सव है। बसंत ऋतु में नए अन्न से यज्ञ (येष्ट) करते हैं। इसलिए इस पर्व का नाम वासंती नव सस्येष्टि है।
शिक्षक रमेश सिंह परिहार व रामप्रताप सिंह ने कहा कि होली का दूसरा नाम नव संवतसर है। आर्यों की यह परंपरा रही है कि वह नवान्न को सर्वप्रथम अग्निदेव पितरों को समर्पित करते थे। तत्पश्चात स्वयं भोग करते थे। आर्य समाज के मंत्री शिक्षक लखन लाल आर्य ने संचालन करते हुए बताया कि हमारे यहां आर्यों में चातुरमास यज्ञ की परंपरा है। इन्हें नव संस्येष्टि यज्ञ कहते हैं। शिक्षक दूधलाल यादव, जयदेवी शुक्ला, फूल सिंह लोधी, राजेंद्र प्रजापति, विवेकानंद प्रजापति, राजेंद्र सिंह रज्जू, मुकेश नायक, सोनू पाठक, अमित नायक, कृष्णकांत नायक, सुम्मेर सिंह, काव्य आर्य, रोहन आर्य, कुलदीप प्रजापति, अभिषेक प्रजापति, अदिति सेन, ललित सेन, रवि प्रकाश दुबे, रागनी दुबे, संध्या शुक्ला आदि उपस्थत रहे। मुख्य यजमान कुलपहाड़ निवासी ऋषभ सेन रहे। आभार विवेकानंद प्रजापति ने जताया।
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आर्य समाज के प्रधान मुनि पुरुषोत्तम वानप्रस्थ ने कहा कि वासंती नव सस्येष्टि अर्थात बसंत ऋतु के नए अनाजों से किया हुआ यज्ञ ही होली का पर्व है। होली, होलिका का अपभ्रंश है। उन्होंने कहा कि तिनके की अग्नि में भुने हुए (अध पके) शमो-धान्य (फली वाले अन्न) को होलक कहते हैं। किसी भी अनाज की ऊपरी पर्त को होलिका कहते हैं। चने का पट पर (पर्त), मटर का पट पर (पर्त), गेहूं, जौ का गिदी से ऊपर वाला पर्त। इसी प्रकार चना, मटर, गेहूं व जौ की गिदी को प्रह्लाद कहते हैं। होलिका को माता इसलिए कहते हैं कि वह चना आदि का निर्माण करती (माता निर्माता भवति) है। यदि यह पर्त पर (होलिका) न हो तो चना, मटर रुपी प्रह्लाद का जन्म नहीं हो सकता। जब चना, मटर, गेहूं व जौ भुनते हैं तो वह पट पर या गेहूं, जौ की ऊपरी खोल पहले जलता है, इस प्रकार प्रह्लाद बच जाता है। उस समय प्रसन्नता से जय घोष करते हैं कि होलिका माता की जय अर्थात होलिका रुपी पट पर (पर्त) ने अपने को देकर प्रह्लाद (चना-मटर) को बचा लिया।
आर्य समाज के संरक्षक रूप सिंह शिक्षाविद व राजा भैया ने कहा कि अधजले अन्न को होलक कहते हैं। इसी कारण इस पर्व का नाम होलिकोत्सव है। बसंत ऋतु में नए अन्न से यज्ञ (येष्ट) करते हैं। इसलिए इस पर्व का नाम वासंती नव सस्येष्टि है।
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शिक्षक रमेश सिंह परिहार व रामप्रताप सिंह ने कहा कि होली का दूसरा नाम नव संवतसर है। आर्यों की यह परंपरा रही है कि वह नवान्न को सर्वप्रथम अग्निदेव पितरों को समर्पित करते थे। तत्पश्चात स्वयं भोग करते थे। आर्य समाज के मंत्री शिक्षक लखन लाल आर्य ने संचालन करते हुए बताया कि हमारे यहां आर्यों में चातुरमास यज्ञ की परंपरा है। इन्हें नव संस्येष्टि यज्ञ कहते हैं। शिक्षक दूधलाल यादव, जयदेवी शुक्ला, फूल सिंह लोधी, राजेंद्र प्रजापति, विवेकानंद प्रजापति, राजेंद्र सिंह रज्जू, मुकेश नायक, सोनू पाठक, अमित नायक, कृष्णकांत नायक, सुम्मेर सिंह, काव्य आर्य, रोहन आर्य, कुलदीप प्रजापति, अभिषेक प्रजापति, अदिति सेन, ललित सेन, रवि प्रकाश दुबे, रागनी दुबे, संध्या शुक्ला आदि उपस्थत रहे। मुख्य यजमान कुलपहाड़ निवासी ऋषभ सेन रहे। आभार विवेकानंद प्रजापति ने जताया।
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