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Lalitpur News: अधिवक्ता बोले- स्कूली पाठ्यक्रमों में लगातार बदलाव ठीक नहीं

Thu, 04 Apr 2024 01:27 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Thu, 04 Apr 2024 01:27 AM IST
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Advocate said- continuous changes in school curriculum is not good
संवाद न्यूज एजेंसी
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ललितपुर। स्कूली पाठ्यक्रमों में हर साल बदलाव किए जाने का अधिवक्ताओं ने तीखा विरोध किया है। उनका कहना है कि शिक्षा प्रत्येक बच्चे का मौलिक अधिकार है। किताबों में लगातार बदलाव के कारण कई माता-पिता अपने बच्चों की शिक्षा को लेकर असहाय और चिंतित हैं। अधिवक्ताओं ने कहा, माता-पिता के मौलिक अधिकार समाप्त होने से यह एक गंभीर मुद्दा है।
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शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) की धारा 3(1) के अनुसार सभी स्कूलों में स्कूल प्रबंधन समिति (एसएमसी) होनी चाहिए, जिसमें अभिभावक, शिक्षक और सरकारी प्रतिनिधि शामिल हों। यह समिति स्कूल के समग्र प्रबंधन के लिए जिम्मेदार है और पाठ्यक्रम के संबंध में निर्णय लेने की शक्ति रखती है। लेकिन, वास्तविकता यह है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में समिति की कोई भूमिका नहीं है।-अशोक कुमार रिछारिया
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संविधान के अनुसार माता-पिता को अपने बच्चे के लिए सर्वोत्तम शिक्षा का चयन करने का अधिकार है। अनुच्छेद 21ए 6-14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा की गारंटी देता है। इसमें स्पष्ट है कि अपने बच्चों की शिक्षा के लिए पाठ्यक्रम और शिक्षण विधियों को निर्धारित करने का अधिकार माता-पिता को है। लेकिन, स्कूल वाले मनमर्जी चलाते हैं, जो अभिभावकों के अधिकार का उल्लंघन है।-सुरेश खरे, पूर्व डीजीसी
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स्कूली पाठ्यक्रम बदलने से अभिभावकों पर वित्तीय बोझ बढ़ता है। प्रत्येक नए पाठ्यक्रम की शुरुआत के साथ माता-पिता को यह सुनिश्चित करने के लिए नई पाठ्यपुस्तकों, अध्ययन सामग्री और ट्यूशन में निवेश करना पड़ता है कि उनका बच्चा परिवर्तनों के साथ बना रहे। इससे न केवल उन पर वित्तीय दबाव पड़ता है, बल्कि छात्रों पर भी अनावश्यक तनाव बढ़ता है।-पुष्पेंद्र सिंह चौहान, पूर्व कनिष्ठ उपाध्यक्ष, बार एसोसिएशन।

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सरकार ने बच्चों की शिक्षा में माता-पिता की भागीदारी के महत्व को पहचाना है और इसके लिए कदम भी उठाए हैं। आरटीई में कहा गया है कि स्कूलों को निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में माता-पिता को शामिल करना चाहिए और उन्हें पाठ्यक्रम में किसी भी बदलाव के बारे में सूचित करना चाहिए। हालांकि, इन उपायों को प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया जा रहा है और माता-पिता के अधिकारों की उपेक्षा जारी है।-महेंद्र जैन, महामंत्री, बार एसोसिएशन।
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