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Lalitpur News: सहरिया की राह में दस्तावेजों की दीवार

Tue, 06 Oct 2026 12:38 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Tue, 06 Oct 2026 12:38 AM IST
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A Wall of Documents in the Path of the Sahariyas
झांसी। अंत्योदय के जरिये समाज के सबसे कमजोर और वंचित परिवारों तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने के दावे के बीच बबीना ब्लॉक के सहरिया समुदाय की तस्वीर कई सवाल खड़े करती है। परमार्थ समाजसेवी संस्थान के सर्वेक्षण में सामने आया है कि बड़ी संख्या में सहरिया परिवार अब भी जरूरी दस्तावेजों और सरकारी योजनाओं की पहुंच से बाहर हैं।
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जिले के 16 गांवों के 403 सहरिया परिवारों पर किए गए सर्वेक्षण में सरकारी योजनाओं से दूरी के साथ भूमिहीनता, मजदूरी पर निर्भरता और रोजगार की तलाश में पलायन की तस्वीर सामने आई है। 84.6 फीसदी परिवारों की मुख्य आजीविका मजदूरी है, जबकि 65.8 फीसदी परिवार भूमिहीन हैं। स्थानीय स्तर पर स्थायी रोजगार का अभाव उन्हें गांव से बाहर जाने के लिए मजबूर कर रहा है।
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ज्यादातर परिवारों के पास परिवार पहचानपत्र नहीं

सर्वेक्षण में सरकारी दस्तावेजों की कमी सबसे बड़ी बाधाओं में सामने आई है। 81.9 फीसदी परिवारों के पास परिवार पहचानपत्र नहीं है, जबकि 74.2 फीसदी परिवार श्रम कार्ड से वंचित हैं। करीब आधे परिवारों का आयुष्मान और मनरेगा जॉब कार्ड से भी जुड़ाव नहीं हो पाया है। 50.4 फीसदी परिवारों के पास आयुष्मान कार्ड और 51.4 फीसदी के पास मनरेगा जॉब कार्ड नहीं है।
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सामाजिक सुरक्षा योजनाओं की स्थिति और गंभीर है। पात्र दिव्यांगजनों में 90 फीसदी को दिव्यांग पेंशन नहीं मिल रही है। 84.4 फीसदी पात्र वृद्धजन वृद्धावस्था पेंशन से वंचित हैं, जबकि 56.3 फीसदी पात्र विधवा महिलाओं को भी पेंशन का लाभ नहीं मिल रहा है। इससे स्पष्ट है कि समस्या केवल योजनाओं के होने की नहीं, बल्कि पात्र परिवारों तक उनकी पहुंच सुनिश्चित करने की भी है।

जमीन नहीं, मजदूरी ही सबसे बड़ा सहारा

सहरिया परिवारों की आर्थिक असुरक्षा में भूमिहीनता बड़ी वजह बनकर सामने आई है। 65.8 फीसदी परिवारों के पास अपनी जमीन नहीं है। सिर्फ 14.9 फीसदी परिवार कृषि को मुख्य आजीविका के रूप में अपनाते हैं, जबकि 84.6 फीसदी परिवार मजदूरी पर निर्भर हैं।
गांव में पर्याप्त काम नहीं मिलने पर 64.5 फीसदी परिवार आजीविका की तलाश में पलायन करते हैं। इनमें 39.9 फीसदी परिवार ऐसे हैं, जिनमें पूरा परिवार ही पलायन करता है। रोजगार की अस्थिरता का असर बच्चों की शिक्षा पर भी पड़ रहा है।

रोजगार की तलाश में छूट रही पढ़ाई

15 से 18 वर्ष आयु वर्ग के करीब 49 फीसदी बच्चे शिक्षा से बाहर हैं। बालकों में शिक्षा से वंचित होने का प्रतिशत बालिकाओं से अधिक पाया गया है। परिवार के साथ पलायन और कम उम्र में पढ़ाई छूटने के बीच सीधा संबंध दिखाई देता है।
सर्वेक्षण में 11 परिवारों में बाल विवाह और दो परिवारों में बाल श्रम के मामले सामने आए हैं। ये आंकड़े समुदाय के सामने मौजूद सामाजिक और आर्थिक असुरक्षा को भी रेखांकित करते हैं।

पक्के मकान बढ़े, पर आर्थिक सुरक्षा नहीं

आवास की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर मिली। 48.6 फीसदी परिवार पक्के मकानों में रहते हैं, जबकि 34.2 फीसदी परिवार अर्ध-पक्के और 17.1 फीसदी परिवार कच्चे मकानों में रह रहे हैं। जमीन नहीं होने, मजदूरी पर निर्भरता और रोजगार के लिए पलायन की मजबूरी के चलते परिवार आर्थिक रूप से असुरक्षित बने हुए हैं।वहीं सर्वेक्षण में केवल 0.31 फीसदी बच्चे कुपोषित पाए गए। यह समुदाय की स्थिति के कुछ क्षेत्रों में सुधार का संकेत भी देता है।
योजना से ज्यादा जरूरी उसकी पहुंच
परमार्थ संस्था के सचिव और जल-जन जोड़ो अभियान के राष्ट्रीय समन्वयक संजय सिंह के अनुसार सहरिया समुदाय के सामने समस्या केवल सरकारी योजनाओं की उपलब्धता की नहीं, बल्कि उन तक पहुंच की भी है। दस्तावेजीकरण और पात्र परिवारों को योजनाओं से जोड़ने की प्रक्रिया गांव स्तर पर अधिक सक्रिय बनाने की जरूरत है।



झांसी में एससी, ललितपुर में एसटी... दर्जे का अंतर क्यों?
झांसी जिले के करीब 100 गांवों में सहरिया समुदाय के परिवार रहते हैं और इनकी आबादी करीब सवा लाख बताई जाती है। झांसी मंडल के ही ललितपुर जिले में सहरिया समुदाय को अनुसूचित जनजाति (एसटी) की श्रेणी में रखा गया है, जबकि झांसी में इनकी गिनती अनुसूचित जाति (एससी) में होती है। यानी एक ही समुदाय के लिए जिला बदलते ही प्रशासनिक श्रेणी बदल जाती है। यह अंतर समुदाय के लिए लागू होने वाले प्रावधानों, रोजगार, राजनीतिक भागीदारी और सरकारी योजनाओं के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। इसी वजह से झांसी के सहरिया समुदाय को भी ललितपुर की तरह एसटी में शामिल करने की मांग उठती रही है।

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झांसी के सहरिया समुदाय को ललितपुर की तरह एसटी में शामिल करने को लेकर केंद्र और प्रदेश सरकार को पत्र लिखा जा चुका है। प्रदेश सरकार की टीम झांसी आकर सर्वे भी कर चुकी है। उम्मीद है कि झांसी के सहरिया समुदाय को अनुसूचित जनजाति में शामिल किए जाने संबंधी प्रस्ताव राज्य सरकार जल्द केंद्र को भेजेगी। - अनुराग शर्मा, भाजपा सांसद


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सहरिया समुदाय की आबादी वाले गांवों में स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास, पेंशन समेत सभी सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने के लिए टास्क फोर्स गठित की गई है। समुदाय के परिवारों को चिह्नित कर टीम घर-घर जाकर योजनाओं का लाभ दिलाने का काम कर रही है। बीडीओ और सीडीओ समय-समय पर टास्क फोर्स के काम की समीक्षा करेंगे। हर तीन महीने में जिला स्तर पर भी इसकी समीक्षा होगी। बबीना के बड़ोरा गांव में सहरिया समुदाय के लोगों के लिए कम्युनिटी सेंटर और आंगनबाड़ी केंद्र भी बनाया जा रहा है। - गौरांग राठी, जिलाधिकारी, झांसी
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