फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lalitpur News ›   खंडहर हो गया उपेक्षित किला व आल्हा-ऊदल की कचहरी

खंडहर हो गया उपेक्षित किला व आल्हा-ऊदल की कचहरी

Mon, 16 Jul 2018 01:34 AM IST
Updated Mon, 16 Jul 2018 01:34 AM IST
विज्ञापन
खंडहर हो गया उपेक्षित किला व आल्हा-ऊदल की कचहरी
खंडहर हो गए किला व आल्हा ऊदल की कचहरी
विज्ञापन

डोंगराखुर्द/ललितपुर। जिला प्रशासन व पर्यटन विभाग की अनदेखी की वजह से नाराहट क्षेत्र में विंध्यांचल पर्वत श्रंखला पर स्थित चंडी माता मंदिर के पास बना प्राचीन किला और आल्हा ऊदल की कचहरी के नाम से प्रसिद्ध स्थान रखरखाव के अभाव में खंडहर हो चुके हैं। यहां की बदहाली का आलम यह है कि बारिश में इस जगह जाने के लिए रास्ता तक बंद हो जाता है।
जनपद प्राचीन संपदाओं से भरा पड़ा है। ललितपुर जिले में पर्यटकों के लिए कई लुभावने स्थान मौजूद हैं, लेकिन प्रचार-प्रसार के अभाव और प्रशासनिक उपेक्षा के चलते यह बदहाली का शिकार होते जा रहे हैं। मुख्यालय से नाराहट कस्बा व मध्य प्रदेश में सीमा पर बसे अटा गांव से होते हुए करीब 44 किलोमीटर दूर सौ मीटर ऊंचाई पर स्थित विंध्यांचल पर्वत श्रंखला पर प्राचीन चंडीमाता मंदिर स्थापित हैं। यहां तक पहुंचने के लिए विंध्यांचल पहाड़ी के कच्चे रास्ते से होते हुए जाना पड़ता है। घने जंगलों के बीच इसी परिक्षेत्र में पश्चिम दिशा में आकर्षक नक्काशी युक्त पत्थरों से बना किला और उत्तर दिशा में ऊंचे चबूतरे के रूप में बनी आल्हा, ऊदल की कचहरी खंडहर हो चुकी है। जानकाराें का मानना है कि इस मंदिर पर नवरात्र और दीपावली को आल्हा ऊदल आते हैं और उनके घोड़ों की आवाजें सुनाई देती हैं। पास में ही एक किलानुमा भवन और विशाल चबूतरा बना हुआ है। जानकारों के मुताबिक कचहरी में आला-ऊदल क्षेत्रवासियों की समस्याओं को सुनकर उनका निस्तारण किया करते थे। किले के पास ही एक कुंड भी है। जिसका पहाड़ी के झरनों से रिसकर पानी आता है और पूरे साल ठंडा पानी राहगीरों को पीने के लिए मिलता है। ग्रामीणों का कहना है यह प्राचीन संपदाएं जिला प्रशासन, पर्यटक व पुरातत्व विभाग की अनदेखी की वजह से खंडहर हो चुकी है। उन्होंने बताया कि यह किला पूरी तरह से पत्थरों से बनाया गया था। जिसकी छत का बाहरी व भीतरी हिस्सा आज भी गोल पत्थरों के पिलर से सधा हुआ है।
विज्ञापन


बिजली व पानी का नहीं इंतजाम
विंध्यांचल पर्वत श्रंखला पर स्थित चंडी माता मंदिर जाने का रास्ता कंकरीला, पथरीला पहाड़ी की पगडंडी के रूप में बना हुुआ है। बेहतर रास्ता न होने की वजह से पर्यटकों को यहां पहुंचने में ही काफी दिक्कत होती है। श्रद्धालुओं के लिए यहां न तो पानी की व्यवस्था और न ही बिजली। इसके अलावा ठहरने के लिए कोई इंतजाम यहां नहीं है। बारिश के दिनों में तो हालात और भी बदतर हो जाते हैं। बारिश में तो यहां ट्रैक्टर भी पहुंचना मुश्किल हो जाता है।
विज्ञापन
विज्ञापन


ग्रामीणों ने कराई थी छत की मरम्मत
यह जगह पुुरातत्व विभाग के दस्तावेजों में धरोहर के रूप में दर्ज है, लेकिन विभाग की उदासीनता और व अनदेखी के चलते यहां का विकास कोसों दूर है। यहां का विकास नहीं होने से यह प्राचीन पर्यटन महत्व का स्थान अपनी पहचान खोता जाता है। यहां आसपास के स्थानीय लोगों ने एक मंदिर की छत की मरम्मत करवाना शुरू किया था, तो पुरातत्व विभाग द्वारा निर्माण पर रोक लगा दी गई थी। हालांकि करीब पंद्रह वर्ष पहले कुछ लोगों ने ही मंदिर की टूटी हुई छत का निर्माण कराया था।

मूर्तियों व पुरासंपदा का नहीं किया जा रहा संरक्षण
- प्राचीन क्षेत्र की प्रगति पुरातत्व विभाग की अनदेखी के कारण रुकी हुई है। यह मंदिर क्षेत्र का विख्यात मंदिर है। यहां अनेक प्राचीन मूर्तियां कई टुकड़ों में सैकड़ों की संख्या में बिखरी पड़ी हैं, जिनका संरक्षण पुरातत्व विभाग द्वारा नहीं किया जा रहा है, जिसके चलते यह मूर्तियां भी धीरे-धीरे गायब होती जा रही है।

विकास पर नहीं ध्यान
चंडी माता मंदिर के पास पहाड़ी की गुफा में काफी समय से रह रहा हूं। पुरातत्व विभाग द्वारा इस क्षेत्र के विकास की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। श्रद्धालुओं को आने के लिए पक्का मार्ग नहीं बना है और ठहरने के लिए कोई भी स्थान नहीं है।
रमलू बाबा, चंडी माता मंदिर।

निरीक्षण कराकर की जाएगी पहल
इस स्थान का निरीक्षण करवाकर पुरातत्व विभाग के सहयोग से पर्यटन विभाग संरक्षण करवाएगा। इसके लिए जल्द ही कोई सार्थक पहल शुरू की जाएगी।
आरके रावत, पर्यटन निदेशक, बुंदेलखंड क्षेत्र

पुरातत्व विभाग की सूची में नहीं
यह स्थान पुरातत्व विभाग में सूचीबद्घ नहीं है, इसकी जानकारी जुटाकर इसके संरक्षण के लिए शासन स्तर से पत्राचार किया जाएगा और आवश्यक उपाय किए जाएंगे।

एसके दुबे, क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी।

दुर्लभ स्थानों का संरक्षण जरूरी
जनपद में कई दुर्लभ स्थान हैं, जो पुरातत्व विभाग में शामिल नहीं हो सके हैं। ऐसे स्थानों को पुरातत्व विभाग में शामिल करते हुए उनका संरक्षण करना जरूरी है, ताकि उनका अस्तित्व नष्ट होने से बचाया जा सके। आल्हा-ऊदल का इतिहास भी ललितपुर में कई लेखों में सुनने को मिलता है। आल्हा-ऊदल की कचहरी व किला को भी पुरातत्व विभाग में शामिल कर उनके अंशों को अब भी संरक्षित किया जाना चाहिए। बिहारीलाल बबेले, पुरातत्व विशेषज्ञ।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed