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छोटे गांव से निकलकर हौसलों से भरी गूगल तक की उड़ान

Tue, 11 Feb 2020 12:05 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Tue, 11 Feb 2020 12:05 AM IST
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लखीमपुर खीरी। अगर इच्छाशक्ति मजबूत है तो तमाम विषम परिस्थितियों के बावजूद मंजिल एक न एक दिन मिल ही जाती है। बस जरूरत है मंजिल पाने के लिए मेहनत करने की। कुछ ऐसा ही कारनामा कर दिखाया है जिला मुख्यालय से करीब 15 किलोमीटर दूर बेहजम ब्लॉक के गांव गौरिया निवासी मुनीर खान ने। परिवार में पांच भाई और तीन बहनों में सबसे छोटे मुुनीर जब एक साल के थे तभी पिता का साया सिर से उठ गया था। जिसके चलते न तो कॉन्वेंट में पढ़ने को मिला और न ही अन्य कोई सुविधा। संसाधन और सुविधाओं के अभाव में मुनीर ने अपनी मंजिल को पाने का हौसला बनाए रखा, जिसका परिणाम यह रहा कि उसने गूगल में जॉब पाकर गांव और जिले का ही नहीं बल्कि देश प्रदेश के साथ विदेश में भी अपना नाम रोशन किया है।
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मुनीर खान ने बताया कि जब वह एक साल का थे तभी पिता की मौत हो गई थी। उसके बाद गांव के सरकारी स्कूल से कक्षा पांच और सिटी मांटेसरी स्कूल से बारहवीं की परीक्षा पास की। बचपन से ही कुछ अलग करने की सोच से स्कूल में लगने वाली विज्ञान प्रदर्शनी में कई मॉडल बनाकर पुरस्कार जीते। इस दौरान कूड़े से बिजली तैयार करने का मॉडल बनाने पर उन्हें 23 फरवरी 2013 को तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के हाथों युवा वैज्ञानिक सम्मान मिला। इसके बाद वर्ष 2015 में लखनऊ में बाल रत्न और युवा महोत्सव में पूर्व सीएम अखिलेश यादव से युवा रत्न मिला। केरल में ज्ञान स्कॉलर अवार्ड के लिए नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी की ओर से अमेरिका से आए प्रोफेसर डॉ. के सुमिथा ने वर्ष 2016 में सम्मानित किया। इंटर करने के बाद नैनीताल के बिड़ला इंस्टीट्यूट सें इलेक्ट्रानिक एंड कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग से बीटेक में प्रवेश लिया। जहां पानी की गुणवत्ता मापने के लिए वॉटर क्वालिटी मॉनिटरिंग और मृदा परीक्षण के लिए डिवाइस बनाई। पेरिस से इंटर्नशिप और लंदन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से रिसर्च प्रोजेक्ट पूरा करके मुनीर ने टॉमस्क स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ कंट्रोल सिस्टम एंड रेडियो इलेक्ट्रानिक रूस से बैलून टेक्नालॉजी (फाइव जी नेटर्वक सिस्टम) से इंटर्नशिप की। इसके बाद उत्तराखंड विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान देहरादून में रिसर्च एसोसिएट के पद पर कार्य किया। मुनीर का कहना है कि मृदा परीक्षण डिवाइस बनाने के लिए छह सदस्यीय टीम को 15 लाख रुपये की छात्रवृत्ति मिली। हौसलों की दम पर गूगल में नौकरी पाने के बाद भी मुनीर का आगे बढ़ना नहीं थमा। उन्होंने पीएचडी के लिए विश्व की टॉप 20 यूनिवर्सिटी की प्रवेश सूची में अपना नाम शामिल कराकर देश और जिले का नाम रोशन किया।
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