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लचर सिस्टम से किसान कब बनेंगे खुशहाल
अमर उजाला ब्यूरो लखीमपुर खीरी।
Updated Fri, 04 Aug 2017 11:20 PM IST
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लैब
- फोटो : अमर उजाला
दशकों पुरानी लैब में जांच के अधूरे इंतजाम
धौरहरा, निघासन, मोहम्मदी और गोला की लैब ठप
आम किसानों तक नहीं पहुंच पा रहा मृदा हेल्थ कार्ड
प्रधानमंत्री मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के तहत खेत की मिट्टी के नमूनों की जांच कर किसानों को स्वास्थ्य कार्ड उपलब्ध कराए जाने हैं, लेकिन लचर सरकारी सिस्टम में किसान अपने खेत की मिट्टी का स्वास्थ्य कार्ड नहीं बनवा पा रहे हैं। वजह है कि चार तहसील मुख्यालयों धौरहरा, निघासन, मोहम्मदी और गोला में स्थापित मृदा परीक्षण प्रयोगशाला कई सालों से बंद पड़ी हैं। सिर्फ लखीमपुर मुख्यालय पर स्थित लैब में जांच की जा रही है, जिसकी क्षमता और संसाधन सीमित हैं। लिहाजा काम का अत्यधिक लोड होने से किसानों के नमूनों की जांच में महीनों का समय लग जाता है, तब तक किसान मृदा स्वास्थ्य कार्ड लेने की बात भूल जा रहे हैं।
छाउछ स्थित कृषि भवन में स्थापित लैब में मिट्टी के नमूने की जांच की जाती है। वर्ष 2017-18 में 70,634 नमूने की जांच करने का लक्ष्य निर्धारित है। इसके सापेक्ष अभी तक 74111 किसानों के खेत से 18122 नमूने लिए गए हैं। अभी इनकी जांच ही कराई जा रही है, जिसके चलते किसी भी किसान को मृदा स्वास्थ्य कार्ड का वितरण नहीं किया गया है। जबकि मृदा परीक्षण कर 10 दिन में हेल्थ कार्ड वितरित करने के निर्देश हैं। मृदा परीक्षण में खेत की मिट्टी का पीएच, नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश, जिंक, बोरीन, गंधक, कैल्शियम, मैग्रीशियम और कापर समेत 16 पोषक तत्वों की जांच की जानी है। लेकिन तहसील मुख्यालयों की लैब बंद होने से एकमात्र लैब में काम का बोझ बढ़ गया है। इसी का नतीजा है कि अभी चार माह बीत चुके हैं, लेकिन एक भी हेल्थ कार्ड किसान के हाथ में नहीं पहुंचा है। ऐसे में प्रधानमंत्री के विजन को झटका लगना तय है। क्योंकि सरकार आने वाले समय में मृदा परीक्षण के आधार पर ही किसानों को खाद की आपूर्ति सुनिश्चित करेगी। इसके लिए खाद दुकानों पर आधार कार्ड पर पीओएस मशीन के जरिए खाद बिक्री की जानी है।
1.33 लाख किसानों को मिले हेल्थ कार्ड
वर्ष 2015-16 में 58806 नमूनों की जांच का लक्ष्य मिला था, जिसके सापेक्ष 42993 नमूनों की जांच कराई गई। वर्ष 2016-17 में 1,00,677 नमूनों की जांच का लक्ष्य था, जिसके सापेक्ष 98274 नमूनों की जांच की गई। इस दौरान सूक्ष्म पोषक तत्वों की जांच के लिए 448 नमूने लखनऊ की लैब भेजे गए। इन दो सालों में कुल 1.33 लाख किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड देने का दावा विभाग कर रहा है। जबकि जिले में इस समय करीब 5.70 लाख किसान हैं। इस वर्ष सूक्ष्म पोषक तत्वों की जांच के लिए लैब स्थापित कर दी गई है।
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ढाई एकड़ के ग्रिड से एक नमूना
खेत से नमूने लेने के लिए मानक निर्धारित है, जिसके मुताबिक ढाई एकड़ के एक ग्रिड से एक नमूना लिया जाता है। नमूने लेने के दौरान वैज्ञानिक विधि का पालन करना जरूरी है, जिसमें ग्रिड के चारों कोनों से नमूने भरे जाते हैं। सूत्र बताते हैं कि इसमें भी लापरवाही बरती जा रही है। ग्रिड में एक ही स्थान से नमूना लेकर खानापूर्ति की जा रही है।
रिपोर्ट में फास्फेट की कमी का दावा
तराई इलाका होने के बावजूद मिट्टी का स्वास्थ्य खराब होने लगा है। हालिया नमूनों की जांच में बात सामने आई है कि फास्फेट की कमी हो गई, जिससे उत्पादन घट सकता है। लैब इंचार्ज बाबूराम के मुताबिक कई नमूनों की जांच में आर्गेनिक कार्बन की कमी पाई गई है, जिसके लिए अंधाधुंध रसायनिक खादों के इस्तेमाल को जिम्मेदार माना जा रहा है।
लक्ष्य के मुताबिक मृदा परीक्षण कराने पर जोर दिया जा रहा है। प्राविधिक सहायकों द्वारा नमूने एकत्र कराए जा रहे हैं। तहसील मुख्यालयों पर लैब में जांच नहीं हो रही है, जिसे चालू कराने के प्रयास किए जा रहे हैं। इसके बाद ही नमूनों की जांच में तेजी आएगी।
लालबहादुर यादव, उप कृषि निदेशक
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धौरहरा, निघासन, मोहम्मदी और गोला की लैब ठप
आम किसानों तक नहीं पहुंच पा रहा मृदा हेल्थ कार्ड
प्रधानमंत्री मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के तहत खेत की मिट्टी के नमूनों की जांच कर किसानों को स्वास्थ्य कार्ड उपलब्ध कराए जाने हैं, लेकिन लचर सरकारी सिस्टम में किसान अपने खेत की मिट्टी का स्वास्थ्य कार्ड नहीं बनवा पा रहे हैं। वजह है कि चार तहसील मुख्यालयों धौरहरा, निघासन, मोहम्मदी और गोला में स्थापित मृदा परीक्षण प्रयोगशाला कई सालों से बंद पड़ी हैं। सिर्फ लखीमपुर मुख्यालय पर स्थित लैब में जांच की जा रही है, जिसकी क्षमता और संसाधन सीमित हैं। लिहाजा काम का अत्यधिक लोड होने से किसानों के नमूनों की जांच में महीनों का समय लग जाता है, तब तक किसान मृदा स्वास्थ्य कार्ड लेने की बात भूल जा रहे हैं।
छाउछ स्थित कृषि भवन में स्थापित लैब में मिट्टी के नमूने की जांच की जाती है। वर्ष 2017-18 में 70,634 नमूने की जांच करने का लक्ष्य निर्धारित है। इसके सापेक्ष अभी तक 74111 किसानों के खेत से 18122 नमूने लिए गए हैं। अभी इनकी जांच ही कराई जा रही है, जिसके चलते किसी भी किसान को मृदा स्वास्थ्य कार्ड का वितरण नहीं किया गया है। जबकि मृदा परीक्षण कर 10 दिन में हेल्थ कार्ड वितरित करने के निर्देश हैं। मृदा परीक्षण में खेत की मिट्टी का पीएच, नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश, जिंक, बोरीन, गंधक, कैल्शियम, मैग्रीशियम और कापर समेत 16 पोषक तत्वों की जांच की जानी है। लेकिन तहसील मुख्यालयों की लैब बंद होने से एकमात्र लैब में काम का बोझ बढ़ गया है। इसी का नतीजा है कि अभी चार माह बीत चुके हैं, लेकिन एक भी हेल्थ कार्ड किसान के हाथ में नहीं पहुंचा है। ऐसे में प्रधानमंत्री के विजन को झटका लगना तय है। क्योंकि सरकार आने वाले समय में मृदा परीक्षण के आधार पर ही किसानों को खाद की आपूर्ति सुनिश्चित करेगी। इसके लिए खाद दुकानों पर आधार कार्ड पर पीओएस मशीन के जरिए खाद बिक्री की जानी है।
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1.33 लाख किसानों को मिले हेल्थ कार्ड
वर्ष 2015-16 में 58806 नमूनों की जांच का लक्ष्य मिला था, जिसके सापेक्ष 42993 नमूनों की जांच कराई गई। वर्ष 2016-17 में 1,00,677 नमूनों की जांच का लक्ष्य था, जिसके सापेक्ष 98274 नमूनों की जांच की गई। इस दौरान सूक्ष्म पोषक तत्वों की जांच के लिए 448 नमूने लखनऊ की लैब भेजे गए। इन दो सालों में कुल 1.33 लाख किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड देने का दावा विभाग कर रहा है। जबकि जिले में इस समय करीब 5.70 लाख किसान हैं। इस वर्ष सूक्ष्म पोषक तत्वों की जांच के लिए लैब स्थापित कर दी गई है।
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ढाई एकड़ के ग्रिड से एक नमूना
खेत से नमूने लेने के लिए मानक निर्धारित है, जिसके मुताबिक ढाई एकड़ के एक ग्रिड से एक नमूना लिया जाता है। नमूने लेने के दौरान वैज्ञानिक विधि का पालन करना जरूरी है, जिसमें ग्रिड के चारों कोनों से नमूने भरे जाते हैं। सूत्र बताते हैं कि इसमें भी लापरवाही बरती जा रही है। ग्रिड में एक ही स्थान से नमूना लेकर खानापूर्ति की जा रही है।
रिपोर्ट में फास्फेट की कमी का दावा
तराई इलाका होने के बावजूद मिट्टी का स्वास्थ्य खराब होने लगा है। हालिया नमूनों की जांच में बात सामने आई है कि फास्फेट की कमी हो गई, जिससे उत्पादन घट सकता है। लैब इंचार्ज बाबूराम के मुताबिक कई नमूनों की जांच में आर्गेनिक कार्बन की कमी पाई गई है, जिसके लिए अंधाधुंध रसायनिक खादों के इस्तेमाल को जिम्मेदार माना जा रहा है।
लक्ष्य के मुताबिक मृदा परीक्षण कराने पर जोर दिया जा रहा है। प्राविधिक सहायकों द्वारा नमूने एकत्र कराए जा रहे हैं। तहसील मुख्यालयों पर लैब में जांच नहीं हो रही है, जिसे चालू कराने के प्रयास किए जा रहे हैं। इसके बाद ही नमूनों की जांच में तेजी आएगी।
लालबहादुर यादव, उप कृषि निदेशक