हम तो हो गए बर्बाद, फसल हुई नहीं, मुआवजा भी मिलेगा नहीं

लखीमपुर खीरी Updated Tue, 14 Apr 2015 07:28 PM IST
We 're doomed , no crop , no compensation will
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बारिश और ओले गिरने की मार सबसे ज्यादा ठेके पर खेती करने वालों पर पड़ी है। खेतों में लहलहाती फसल ऐसे ढेर हो गई, जैसे उनकी किस्मत ही खराब हो। एक दिन पहले साफ मौसम और फिर बारिश, तेज हवाओं और ऊपर से ओले गिरने से उनका सबकुछ बर्बाद हो गया। गेहूं की बालियों में दाना नहीं रहा। इससे किसी को कर्ज चुकाने की चिंता सता रही है तो किसी को बच्चों की फीस और बेटी के हाथ पीले करने की। इस चिंता में उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा है तो कर्ज देने वाला महाजन भी उनके घर के चक्कर लगा रहा है। इससे तमाम किसान चिंता में बीमार हो रहे हैं। अमर उजाला टीम ने ऐसे किसानों की पीड़ा को जानने की कोशिश की तो तमाम केस सामने आ गए। किसानों का यही कहना है कि कुदरत के कहर से फसल हुई नहीं, मुआवजा उन्हें मिल नहीं सकता। ऐसे में वे पूरी तरह से बर्बाद हो गए हैं।
कैसे मिलेगा निवाला
निघासन। गांव झंडी निवासी किसान रमेश ने बताया कि बिसुआ भर जमीन नहीं है। मेहनत-मजदूरी करके परिवार वालों का भरण-पोषण करते हैं। रमेश ने बताया कि करीब चार बीघा गेहूं की फसल बोई थी। सारी फसल आंधी और पानी ने बर्बाद कर बच्चों के मुंह का निवाला छीन लिया। बूढ़े बीमार पिता संकटा, मासूम बच्चे शिवा, विक्रम और महक आदि का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा है।
आंधी पानी ने उजाड़ दी मड़इया
महादेव मुड़िया निवासी रामबिलास ने बताया कि बटाई पर बनाया गए खेत में गेहूं की फसल तो नहीं मिली। साथ ही आई तेज आंधी ने घर का आशियाना भी उजाड़ दिया। दिन में सूरज और रात में तारे इस आशियाने में लेटने के बाद दिखाई पड़ते है। अब बूढ़ी हड्डियों में दम भी नहीं बचा है, जिससे नन्हे मुन्हे बच्चे दयाराम, विनोद और रंजीत का भरण पोषण कर सकें। दयाराम और विनोद को पढ़ाने की उम्र में घर का खर्च चलाने के लिए मजदूरी कराना पड़ रहा है।
फसल की चिंता में अयोध्या ने पकड़ ली खाट
तिकुनियां। तहसील निघासन की ग्राम पंचायत सूरतनगर के मजरा गांव चौगुर्जी निवासी 70 साल के अयोध्याप्रसाद फसल बर्बाद होने से बेहाल हैं। उनकी साढ़े आठ बीघे मसूर की फसल पूरी तरह से चौपट हो गई है, जबकि उनके कंधों पर दो भाइयों और खुद के पांच बच्चों के पालन-पोषण का भार है। ऐसे में फसल बर्बाद होने की बात सोच-सोचकर वह बीमार हो गए हैं। वह खटिया पर पड़े रहते हैं। उन्होंने खाना-पीना भी छोड़ दिया है। हालांकि उनके परिवार वाले और दोस्त बराबर समझाते रहते हैं, लेकिन वह एक ही बात कहते हैं कि फसल तो बर्बाद हो गई, अब कर्जा कैसे अदा करेंगे। बच्चों को पेट कैसे भरेंगे।
ठेके पर बोया गेहूं, लागत तक नहीं निकली
बांकेगंज। ग्राम कोठीपुर निवासी भूमिहीन विनोद कुमार मजदूरी करके पत्नी और पांच बच्चों को पालते हैं। किसी तरह दो जून की रोटी का इंतजाम होता है। इस बार तीन बीघा खेत ठेके पर लिया था। उम्मीद थी कि 10 क्विंटल गेहूं की उपज होगी, लेकिन पांच क्विंटल ही हुई। उनका कहना है कि लागत तक नहीं मिली है, जबकि कर्ज लेकर खेत मालिक को पहले ही भुगतान कर दिया था। अब कर्जा और सिर पर चढ़ गया है।
उपज ठिकाने लगाने को थ्रेशर और कंबाइन मशीनों की मारामारी
बांकेगंज।
आसमान में छाए बादलों के कारण खेतों में कटाई और गहाई के लिए थ्रेसर और कंबाइन मशीन ढूंढे नहीं मिल रही हैं। बड़े किसान कंबाइन से गेहूं कटवाने के लिए मुंह मांगी कीमत देने को तैयार हैं, लेकिन जिले में कंबाइन की संख्या कम होने से काफी दिक्कत हो रही है। कुछ यही हाल थ्रेशरों का है। छोटे किसानों ने हाथों से फसल काट तो ली, लेकिन अभी वह खेतों और खलिहानों में पड़ी है। गेहूं मड़ाई के लिए थ्रेशरों पर लाइन लगी हुई है। इसके लिए किसानों को अपनी बारी का इंतजार करना पड़ रहा है। किसान कभी आसमान की ओर ताकता है तो कभी अपनी कटी फसल को निहारता है। इस दौरान हल्की बूंदे पड़ने पर मड़ाई के लिए खेतों में कटी पड़ी फसल के भीगने की सोच किसानों के दिलों की धड़कनें बढ़ने लगती है। क्षेत्रीय किसान विनोद सिंह, प्रेम सिंह, प्रमोद सिंह, किशोरी लाल आदि का कहना है कि कुदरत का आगे सब बेबस है। उनका कहना है कि खून-पसीना बहाकर खेतों में खड़ी लहलहाती फसलों की कटाई के बाद अन्न का दाना घर पहुंचने के बाद ही कुछ दिन ढंग की नींद आती है। 
एडीएम हरिकेश चौरसिया ने बताया कि ठेका पर खेती करने वाले को नियमानुसार किसान नहीं कहा जा सकता। सिर्फ दैवीय आपदा की स्थिति में किसान को ही मुआवजा देने का प्रावधान है, इसलिए ऐसे पीड़ितों को कोई मदद नहीं दी जा सकती।

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