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इनके हाथ तो बिल्कुल खाली, फसल मिली न मुआवजा
लखीमपुर खीरी।
Updated Mon, 13 Apr 2015 08:46 PM IST
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बेमौसम बारिश से बर्बाद हुई फसलों से किसानों की जमीनों पर बटाई पर खेती-बाड़ी करने वाले भूमिहीनों पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा है। चैत्र मास में आसाढ़ और सावन जैसी हुई बारिश में फसलों को हुए नुकसान से उन्हें न ही अन्न मिला और न ही मुआवजा मिलने की उम्मीद है।
जिले के लगभग प्रत्येक गांव में मजदूर पेशा भूमिहीन लोग गांव के किसानों की जमीनों बटाई पर लेते हैं। वे पूरे परिवार के साथ मेहनत कर तैयार फसल से पूरे साल के अनाज की व्यवस्था कर लेते हैं। इस साल बेमौसम हुई बारिश से फसलें बर्बाद हो गईं। लागत मूल्य से भी कम उत्पादन होने पर उनके हाथ कुछ भी नहीं आया। लागत मिलने की बात जो जाने दें, जमीन मालिक को देने के बाद अन्न का एक दाना भी घर नहीं आया। भूमिहीन होने से सर्वे में मुआवजा मिलने की भी उन्हें कोई उम्मीद नहीं है।
आशीष को तो भूसा ही नसीब हुआ
बांकेगंज। ग्राम कोठीपुर निवासी भूमिहीन आशीष मजदूरी करके पत्नी और दो बच्चों को पालते हैं। किसी तरह दो जून की रोटी का इंतजाम होता है। इस बार तीन बीघा खेत बटाई पर लिया था। उम्मीद थी कि 10 क्विंटल गेहूं की उपज होगी तो बटाईदार को देने के बाद भी आराम से साल भर का इंतजाम हो जाएगा, लेकिन बेमौसम बारिश से चार क्विंटल ही उपज हुई, जो उसे बटाईदार को देनी पड़ गई। उसके हाथ सिर्फ भूसा लगा, जिसे बेचकर मिली धनराशि से ही उसे गुजारा करना पड़ेगा।
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मुन्ना की उम्मीदों पर भी फिर गया पानी
बांकेगंज। गांव गुलाबनगर निवासी भूमिहीन किसान मुन्ना खां के चार बच्चे हैं। वह बैटरी रिपेयरिंग करते हैं। उनका कहना है कि इससे दो जून की रोटी भी बमुश्किल नसीब होती है। इस बार हिम्मत करके पांच बीघा खेत बटाई पर लेकर गेंहू लगाया था। बेमौसम बारिश से बर्बाद हुई फसल कटाई के बाद उत्पादन में आई कमी से बटाईदार को देने के बाद उनके घर अन्न का एक दाना भी नहीं पहुंचा। जमीन नाम होने से फसल का मुआवजा मिलने की भी उम्मीद नहीं है। वह बताते हैं कि फसल अच्छी हो जाएगी इस साल गेहूं नहीं खरीदना पड़ेगा और अगले साल दस बीघे खेत बटाई पर लूंगा, लेकिन अब हिम्मत टूट गई है। इस तरह उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया।
बच्चों की फीस तक नहीं दे सका अनिल
निघासन। गांव डांगा निवासी अनिल का कहना है कि उसके तीन बच्चे कोमल, ललित और आयुष जूनियर और प्राइमरी में निजी स्कूलों में पढ़ते हैं। करीब एक एकड़ जमीन में गेहूं की फसल बटाई पर बोई थी। उम्मीद थी कि फसल अच्छी होगी तो बेचकर बच्चों की फीस जमा कर देगा, लेकिन सबकुछ बर्बाद हो गया। फसल चौपट होेने से फीस तो नहीं दे पा रहा है, फसल में लगी लागत से कर्ज जरूर हो गया है। गेहूं की फसल जाने से अब परिवार का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा है। वह कहता है कि उसे तो मुआवजे की भी उम्मीद नहीं है।
ठेका और बंटाई देने का समझौता किसान और उस व्यक्ति के बीच का है। सिर्फ दैवीय आपदा की स्थिति में किसान को ही मुआवजा देने का प्रावधान है।
-हरिकेश चौरसिया, एडीएम।
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जिले के लगभग प्रत्येक गांव में मजदूर पेशा भूमिहीन लोग गांव के किसानों की जमीनों बटाई पर लेते हैं। वे पूरे परिवार के साथ मेहनत कर तैयार फसल से पूरे साल के अनाज की व्यवस्था कर लेते हैं। इस साल बेमौसम हुई बारिश से फसलें बर्बाद हो गईं। लागत मूल्य से भी कम उत्पादन होने पर उनके हाथ कुछ भी नहीं आया। लागत मिलने की बात जो जाने दें, जमीन मालिक को देने के बाद अन्न का एक दाना भी घर नहीं आया। भूमिहीन होने से सर्वे में मुआवजा मिलने की भी उन्हें कोई उम्मीद नहीं है।
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आशीष को तो भूसा ही नसीब हुआ
बांकेगंज। ग्राम कोठीपुर निवासी भूमिहीन आशीष मजदूरी करके पत्नी और दो बच्चों को पालते हैं। किसी तरह दो जून की रोटी का इंतजाम होता है। इस बार तीन बीघा खेत बटाई पर लिया था। उम्मीद थी कि 10 क्विंटल गेहूं की उपज होगी तो बटाईदार को देने के बाद भी आराम से साल भर का इंतजाम हो जाएगा, लेकिन बेमौसम बारिश से चार क्विंटल ही उपज हुई, जो उसे बटाईदार को देनी पड़ गई। उसके हाथ सिर्फ भूसा लगा, जिसे बेचकर मिली धनराशि से ही उसे गुजारा करना पड़ेगा।
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मुन्ना की उम्मीदों पर भी फिर गया पानी
बांकेगंज। गांव गुलाबनगर निवासी भूमिहीन किसान मुन्ना खां के चार बच्चे हैं। वह बैटरी रिपेयरिंग करते हैं। उनका कहना है कि इससे दो जून की रोटी भी बमुश्किल नसीब होती है। इस बार हिम्मत करके पांच बीघा खेत बटाई पर लेकर गेंहू लगाया था। बेमौसम बारिश से बर्बाद हुई फसल कटाई के बाद उत्पादन में आई कमी से बटाईदार को देने के बाद उनके घर अन्न का एक दाना भी नहीं पहुंचा। जमीन नाम होने से फसल का मुआवजा मिलने की भी उम्मीद नहीं है। वह बताते हैं कि फसल अच्छी हो जाएगी इस साल गेहूं नहीं खरीदना पड़ेगा और अगले साल दस बीघे खेत बटाई पर लूंगा, लेकिन अब हिम्मत टूट गई है। इस तरह उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया।
बच्चों की फीस तक नहीं दे सका अनिल
निघासन। गांव डांगा निवासी अनिल का कहना है कि उसके तीन बच्चे कोमल, ललित और आयुष जूनियर और प्राइमरी में निजी स्कूलों में पढ़ते हैं। करीब एक एकड़ जमीन में गेहूं की फसल बटाई पर बोई थी। उम्मीद थी कि फसल अच्छी होगी तो बेचकर बच्चों की फीस जमा कर देगा, लेकिन सबकुछ बर्बाद हो गया। फसल चौपट होेने से फीस तो नहीं दे पा रहा है, फसल में लगी लागत से कर्ज जरूर हो गया है। गेहूं की फसल जाने से अब परिवार का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा है। वह कहता है कि उसे तो मुआवजे की भी उम्मीद नहीं है।
ठेका और बंटाई देने का समझौता किसान और उस व्यक्ति के बीच का है। सिर्फ दैवीय आपदा की स्थिति में किसान को ही मुआवजा देने का प्रावधान है।
-हरिकेश चौरसिया, एडीएम।