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Lakhimpur Kheri News: श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है बांसी का क्लेश हरण मंदिर
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ग्राम बांसी स्थित प्राचीन क्लेश हरण मंदिर। संवाद
अलीगंज। क्षेत्र के गांव बांसी में बना प्राचीन क्लेश हरण मंदिर क्षेत्र के लोगों की आस्था का केंद्र है। यहां सावन में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। सैकड़ों लोग मंदिर के पास बने तीर्थ में स्नान करने के बाद भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करते हैं।
प्रत्येक माह की अमावस्या को मेला लगता है। छोटी काशी गोला जाने वाले कांवड़िया यहां रुककर तीर्थ स्नान, विश्राम, पूजा, जलपान आदि करने के बाद प्रस्थान करते हैं। सावन में सैकड़ों की संख्या में शिव भक्त आकर पूजन कर पुण्य लाभ अर्जित करते हैं। श्रद्धालुओं द्वारा विभिन्न प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान कराए जाते हैं।
मान्यता है कि 450 वर्ष पूर्व यहां पर शिवलिंग प्रकट हुआ था। बताते हैं कि तब जंगल में पशु चराते समय चरवाहे को छोटी सी मठिया दिखाई पड़ी थी। तत्कालीन रानी कुंवर साहिबा को पता लगा तो मठिया की साफ-सफाई कराई। वे स्वयं नियमित पहुंचकर पूजा पाठ करने लगीं। तीन किलोमीटर दूर सहसपुर गांव पंचायत से आकर कई महीनों तक पूजा पाठ करने के बाद रानी कुंवर साहिब के मन में विचार आया कि क्यों ना मठिया को खोदवाकर अपने यहां ले चलें तो यहां तक आना नहीं पड़ेगा।
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बताया जाता है कि दस दिन तक मजदूर मठिया के आसपास खोदते रहे, लेकिन मठिया का छोर कहीं नजर नहीं आया। मजदूरों ने हार मानकर खोदाई बंद कर दी। इस पर रानी कुंवर साहिब ने वहीं पर मंदिर निर्माण करा दिया। बाद में श्रद्धालुओं ने इसका जीर्णोद्धार कराया। (संवाद)
दूर-दूर तक है मंदिर की ख्याति
मंदिर के पुजारी रामशरण दास शुक्ल ने बताया कि इस शिवालय की ख्याति दूर-दूर तक फैली है। सावन में हजारों की संख्या में श्रद्धालु भगवान आशुतोष को जलाभिषेक करने आते हैं। यहां श्रद्धालु भगवान भोलेनाथ से जो भी मांगते हैं, उनकी मनोकामना अवश्य पूरी होती है। यह भी बताया कि उनसे पहले कई महंत मंदिर की सेवा में अपना जीवन लगा चुके हैं। इनमें प्रमुख रूप से महंत रमेशगिरि, भजन गिरि और दत्ता चिरई आदि के नाम शामिल हैं।
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प्रत्येक माह की अमावस्या को मेला लगता है। छोटी काशी गोला जाने वाले कांवड़िया यहां रुककर तीर्थ स्नान, विश्राम, पूजा, जलपान आदि करने के बाद प्रस्थान करते हैं। सावन में सैकड़ों की संख्या में शिव भक्त आकर पूजन कर पुण्य लाभ अर्जित करते हैं। श्रद्धालुओं द्वारा विभिन्न प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान कराए जाते हैं।
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मान्यता है कि 450 वर्ष पूर्व यहां पर शिवलिंग प्रकट हुआ था। बताते हैं कि तब जंगल में पशु चराते समय चरवाहे को छोटी सी मठिया दिखाई पड़ी थी। तत्कालीन रानी कुंवर साहिबा को पता लगा तो मठिया की साफ-सफाई कराई। वे स्वयं नियमित पहुंचकर पूजा पाठ करने लगीं। तीन किलोमीटर दूर सहसपुर गांव पंचायत से आकर कई महीनों तक पूजा पाठ करने के बाद रानी कुंवर साहिब के मन में विचार आया कि क्यों ना मठिया को खोदवाकर अपने यहां ले चलें तो यहां तक आना नहीं पड़ेगा।
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बताया जाता है कि दस दिन तक मजदूर मठिया के आसपास खोदते रहे, लेकिन मठिया का छोर कहीं नजर नहीं आया। मजदूरों ने हार मानकर खोदाई बंद कर दी। इस पर रानी कुंवर साहिब ने वहीं पर मंदिर निर्माण करा दिया। बाद में श्रद्धालुओं ने इसका जीर्णोद्धार कराया। (संवाद)
दूर-दूर तक है मंदिर की ख्याति
मंदिर के पुजारी रामशरण दास शुक्ल ने बताया कि इस शिवालय की ख्याति दूर-दूर तक फैली है। सावन में हजारों की संख्या में श्रद्धालु भगवान आशुतोष को जलाभिषेक करने आते हैं। यहां श्रद्धालु भगवान भोलेनाथ से जो भी मांगते हैं, उनकी मनोकामना अवश्य पूरी होती है। यह भी बताया कि उनसे पहले कई महंत मंदिर की सेवा में अपना जीवन लगा चुके हैं। इनमें प्रमुख रूप से महंत रमेशगिरि, भजन गिरि और दत्ता चिरई आदि के नाम शामिल हैं।

ग्राम बांसी स्थित प्राचीन क्लेश हरण मंदिर। संवाद